हीराकुंड एक्सप्रेस
कोई भी संस्थान बुरा नहीं होता अपितु उस मे कार्यरत
कर्मचारियों की संस्थान के प्रति निष्ठा
और कार्य के प्रति उनके समर्पण ही उस
संस्थान को बुरा या अच्छा बनाते हैं फिर वो संस्थान रेल्वे हो, बैंक या कोई अन्य सरकारी, अर्ध सरकारी या गैर सरकारी संस्थान हो। स्थानीय
निकाय, राज्य सरकारों के कार्यालय, रेल
एवं अन्य ऐसे कार्यालय जिनका वास्ता आम आदमी से पड़ता है, कुछ लोगो की कार्य प्रणाली के कारण ही जनता की
निगाहों मे नेक नियत से नही देखे जाते। ऐसा नही है कि इन संस्थानो मे या अन्य दीगर
संस्थानो मे अच्छे लोग नहीं होते अधिकतर संख्या
मे अच्छे लोगो की बदौलत ही देश के सभी संस्थान या विभाग सही तरीके से कार्य
कर रहे है। ट्रेन मे आरक्षण, नगर पालिका मे टैक्स जमा, विजली विभाग मे बिल जमा, कानून व्यवस्था के समय पुलिस विभाग या अस्पताल मे नर्स और डॉक्टर की
भूमिका के कारण ये विभाग अच्छे या बुरे कहे जाते हैं। मैं पिछले लगभग आठ सालों से विभिन्न प्रादेशिक
निरीक्षालयों मे कार्यरत रहा। इस विभाग मे कार्यरत विभाग प्रमुखों श्री चरंजीव चावला जी, श्री आर॰ बी॰
जैन, श्री गुगलानी, श्री आर्या जी जैसे
सकारात्मक सोच वाले अधिकारियों की कार्य प्रणाली को मैंने नजदीक से देखा हैं। उनकी
सकारात्मक सोच ने विभाग और बैंक की
प्रतिष्ठा को ऊँचा उठाया है। निश्चित ही इन जैसे अच्छे एवं व्रहद सोच बाले बहुत से
अधिकारी-कर्मचारी बैंक मे अन्य जगहों मे पदस्थापित होंगे जिनके कारण संस्थान नई
ऊचाइयों को छू कर तरक्की की राह पर अग्रसर हैं, किन्तु मैं शायद
उन्हे नही जानता या उनके साथ मैंने कार्य
नही किया। बहीं दूसरी ओर मैंने देखा है कि
इस विभाग के हमारे कुछ साथियों ने अपने
निजी महत्वाकांक्षा या झूठी मान प्रतिष्ठा के कारण अपनी विभिन्न रिपोर्ट के माध्यम
से अपने ही साथियों के कैरियर को दांव पर लगा दिया। ऐसे
करने बाले लोग योग्य तो थे पर नकारात्मक सोच के कारण उन्होने न केवल कार्यरत
अधिकारियों के लिये परेशानी उत्पन्न की बल्कि संस्थान का भी अहित किया।
रेल
विभाग की ऐसी ही एक घटना मुझे याद है जब मैं रायपुर कलेक्टरेट शाखा मे जॉइनिंग के बाद पहली बार अपने घर झाँसी
जा रहा था। शायद जुलाई-अगस्त 1996 की घटना हैं। मेरा रिज़र्वेशन हीराकुंड एक्सप्रेस
से "चापा" स्टेशन से था। गाड़ी लगभग 2 घंटे की देरी से चापा पहुँची। ए॰सी॰
कोच अंदर से जुड़ा न होने के कारण मैं उस डिब्बे मे नहीं पहुँच सका। अगला स्टेशन
बिलासपुर था जहाँ ट्रेन लगभग 40 मिनिट रुकती है। जब मैं बिलासपुर मे अपने उस कोच
मे पहुँचा और टिकिट चैकर के माध्यम से अपनी सीट को ख़ोजा तो टिकिट चैकर ने बताया की
आपका रिज़र्वेशन चापा स्टेशन पर न आने के कारण निरस्त कर दिया गया हैं। मैं भौचक्का
होकर टिकिट चैकर के चेहरे को देखने लगा!! टिकिट
चैकर ने अपने निजी स्वार्थ के कारण मेरे कन्फ़र्म टिकिट को निरस्त करने मे अति
तत्परता दिखाई। अपने आपको संयत कर मैंने नम्रता पूर्वक टिकिट चैकर से निवेदन किया
कि ऐसा कैसे कर सकते है आप?, मेरा कन्फ़र्म रिज़र्वेशन है लगभग
800 कि॰ मी॰ की दूरी तय कर कैसे मैं 13-14 घंटे यात्रा पूरी करूंगा? परन्तू उस निर्दयी टिकिट चैकर ने कहा आप चापा स्टेशन पर नही आये इसलिये
आपका टिकिट कैन्सल कर दिया गया हैं। मैंने पूरी विनम्रता के साथ जब कहा कि चापा
स्टेशन पर गाड़ी मात्र 2-3 मिनिट ही रुकी थी डिब्बे की सही लोकेशन भी प्रदर्शित नही
की गयी, ए॰सी॰ का डिब्बा पीछे लगा होने के कारण अंदर से
कनैक्ट भी नही था हम चाह कर भी डिब्बे मे नही पहुँच सकते थे?
बैसे भी अगले 1-2 स्टोपेच तक तो नियमानुसार आपको इंतजार करना चाहिये और अगले
स्टोपेच बिलासपुर मे मैं आ ही गया हूँ।
परन्तू उक्त "जिम्मेदार"!! टिकिट चैकर ने कहा ऐसा कोई नियम नहीं
हैं आपके चापा पर न आने के कारण टिकिट निरस्त किया गया हैं।
मैंने
पुनः अपने आपको नियंत्रित करते हुए इतना अवश्य कहा महोदय मैं आपकी शिकायत गार्ड से
करने जा रहा हूँ। उसने बड़ी सहजता से कहा आपको जो करना हो कर लो। मैं परेशान होकर आख़री डिब्बे मे स्थित गार्ड के डिब्बे की ओर पहुँचा और मैंने अपने आपको असहाय महशूस करते हुए गार्ड
साहब से अपनी व्यथा सुनाकर शिकायत लिखने हेतु "शिकायत पुस्तिका" की मांग
की? गार्ड साहब ने कहा शिकायत की किताब स्टेशन मास्टर के पास हैं वहाँ जाकर आप
शिकायत करे। उनका जबाब सुनकर ऐसा लगा पूरा बिलासपुर रेल मण्डल नकारा और अपनी
ड्यूटि के प्रति घोर लापरवाह और यात्रीयों के प्रति निष्ठुर,
अदयालू है। इस दौड़ भाग मे हमारी सांस फूल गई मैंने कहा गार्ड साहब क्यों मज़ाक कर
रहे हैं, अब यदि मैं स्टेशन मास्टर के पास शिकायत करने दूसरे
प्लेटफॉर्म पर जाऊंगा तब तक ट्रेन छूट जायेगी और मैं यहीं बिलासपुर मे रह जाऊंगा, मैं आया तो था टिकिट चैकर की शिकायत करने पर अब टिकिट चैकर के साथ मुझे आपकी
भी शिकायत करनी पड़ेगी। क्रोधित होते हुए बड़ी उपेक्षा से गार्ड ने कहा जरूर कर दीजये। अब मेरी हताशा, निराशा, और क्रोध चरम पर था। पुनः भाग कर मैं अपने
कोच पर बापस आया और टिकिट चैकर से कहा " टिकिट चैकर महोदय ये ट्रेन 2 घंटे
देरी से हैं इसको मैं चैन खींच कर और 2 घंटे यही रोकूँगा, जिसकी
ज़िम्मेदारी आपकी होगी। उसने इस चेतावनी को नजरंदाज़ किया। इतना कह कर मैं कोच के
अंदर पहुँचा और कैबिन मे स्थित चैन के लाल हैंडल को खींचा, पीछे
पीछे आ रहे उस टिकिट चैकर ने हमारे आक्रोश को भाँपते हुए कुछ बचाव की मुद्रा मे आते
हुए कहा मैंने आपकी सीट निरस्त नहीं की मेरी ड्यूटि तो बिलासपुर से है आपकी सीट तो
पिछले टिकिट चैकर ने कैन्सल की है जो यहाँ तक ट्रेन ले कर आया। मैंने क्रोधित होकर
कहा गाड़ी यही खड़ी रहेगी, आज तेरी नौकरी जायेगी या पिछले
टिकिट चैकर की जो तेरा ही भाई बंधु है, भलाई इसी मे हैं कि
तू मुझे बर्थ दे, बर्ना या तो तू मरेगा या तेरा टिकिट चैकर
साथी। उसको मेरा "तू" "तेरी" शब्द शायद बुरे लगे थे। बह बोला
आप बात किस लहजे मे बात कर रहे है? मैंने भी उसी लय मे कहा
"एक मालिक जैसे अपने नौकर से बोलता है"। मैं यात्री के रूप मे मालिक हूँ तू सेवक के
रूप मे मेरा नौकर है, जब मैं नम्रता से बात कर रहा था तो
तेरे समझ मे नही आया अब बोलने का लहजा तुम्हें खराब लग रहा है। अब बह पूरी तरह
अपनी बचाव की मुद्रा मे था। उसने कहा लेकिन थोड़ा नम्रता पूर्वक तो बोल सकते है। मैंने कहा इंग्लिश मे तुम्हें पब्लिक सरवेंट कहे तो कुछ
नहीं पर हिन्दी मे नौकर कहा तो बुरा लगता है? दुर्भाग्य से चैन का लाल हैंडल टूट कर मेरे हाथ
मे आ गया। अतः मैं दूसरे कैबिन मे "चैन पुल" करने बढ़ा तो टिकिट चैकर ने
कहा मैं कोशिश करता हूँ आपको सीट देने की। मैंने चलते चलते कहा कोशिश नहीं मुझे
सीट नंबर बता नहीं तो मैं पुनः चैन पुल करता हूँ। अब टिकिट चैकर महोदय समर्पण की
मुद्रा मे आ चुके थे उन्होने कहा आप 41 नंबर बर्थ ले लीजये। मैंने कहा हाँ अब
मुझे अच्छा लगा,
जब तक आपको मैंने नम्रता पूर्वक कहा आपको
समझ ही नही आया?? मैंने अपनी सीट पर अपना सामान जमाया
और दौड़-भाग, लगातार
वहसा-वहसी से मैं काफी थक गया था रात भी
बहुत हो गई थी इसलिये मैं शीघ्र ही नींद के आगोश मे सो गया। सुबह कब हो गयी पता ही
नही चला। पिछले किसी स्टेशन पर टिकिट
चैकर ड्यूटि समाप्त कर ट्रेन से उतर चुके थे। सागर के
आसपास जब मैं सोकर उठा तो हमारे सामने बाली सीट पर जो सज्जन बैठे थे उन्होने बताया
कि बिलासपुर मे रात मे उस टिकिट चैकर ने हमे दो सीट देने का वादा किया था किन्तु
आपकी बातचीत और कहा-सुनी के कारण उस टिकिट चैकर ने मुझ से कहा कि अब आपको एक ही
बर्थ दे पायेंगे, क्योंकि एक बर्थ मुझे देनी पड़ेगी।
इस तरह इस संघर्ष यात्रा कि समाप्ती झाँसी पहुँचने पर हुई।
मेरा
मानना हैं यध्यपि परिस्थितियाँ काफी बदली हैं फिर भी एक आम आदमी को सुखी, कानून सम्मत जीवन जीने के लिये हिंदुस्तान मे व्यवस्था से आज भी काफी
संघर्ष करना पड़ता हैं आपका कानून सम्मत
अधिकार होते हुए भी व्यवस्था चलाने बाले तथाकथित "सरवेंट" कैसे आपके
कानूनी अधिकार का अपहरण कर व्यवस्था को अंगूठा दिखा कर अपनी ताकत का अहसास कराते
हैं। लेकिन इस जीवन रूपी संघर्ष यात्रा मे आवश्यक नही कि आप हर बार चैन के
"लाल हैंडल" को खींच कर इन "संगठित गुंडों" को परास्त कर अपना सफर पूरा कर सकें??
विजय सहगल


2 टिप्पणियां:
जय हो, टिकट चैकर को ट्रेन रोकने वाली गतिविधि असर दिखा गयी।
यहां उसे लिखित में जवाब देना पडता।
तदि आपको नियम पता नहीं रहता तो वो यात्रा बहुत मुश्किल से बीतती
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