"भोजनालय"
मेरा मानना हैं किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, प्रांत, लिंग भेद के आधार पर उत्पीड़न या अपमान करना मानवता के
प्रति अपराध हैं। पीड़ा देने वाले की मानसिकता उसके परिवार समाज/धर्म से मिली मानसिकता को दर्शाता है। पर पीढ़ित को
मिले अपमान का दंश और पीड़ा देने बाले
व्यक्ति के व्यवहार और कार्य को भुक्तभोगी सारी ज़िंदगी नहीं भूलता। जब अपमान, उत्पीड़न किसी जाति, धर्म,
प्रांत या देश के व्यक्तियों द्वारा लगातार मानवता के विरुद्ध किया जाता हैं तो
वही उस देश या समाज/धर्म का चरित्र वन
जाता हैं। सारी दुनियाँ मे लोग उस देश, समाज, धर्म को उसी कसौटी पर रख कर कसते हैं।
मैं अपने माता-पिता और परिवार के साथ उन दिनों (दिसम्बर
1996) एल॰एफ़॰सी॰ भ्रमण पर गुजरात गया हुआ था। 10-12 दिन की यात्रा का कार्यक्रम
था। गुजरात मे बड़ौदा, जाम नगर,
जूना गढ़, दुवारका, भेट दुवारका, सोमनाथ और अहमदाबाद मे जाने का
कार्यक्रम था। दिसम्बर माह मे यध्यपि सारे गुजरात मे छुट्टियाँ रहति हैं काफी भीड़
हर स्टेशन पर थी फिर भी यात्रा बहुत अच्छी चल रही थी। हमारा आखिरी पढ़ाव अहमदाबाद
था। हम लोगो ने गांधी नगर, अक्षर धाम मंदिर के शानदार दर्शन
किए। सोमनाथ दर्शन अद्भुत थे। एक दिन हम
लोगो का अहमदाबाद मे शॉपिंग करने मे व्यस्त रहे। हम लोग पूर्णतयः शाकाहारी हैं
अंडा आदि भी परिवार मे नहीं खाते इस तरह की चर्चा हम लोग एक दुकान पर कर रहे थे।
किसी शुद्ध शाकाहारी होटल की जानकारी उस दुकानदार से चाही। उसने अपनी जानकारी के
अनुसार एक अच्छा साफ सुथरा एवं शुद्ध शाकाहारी स्वदेशी भोजनालय की जानकारी हमे
दी जो वही पास मे था। हम सभी लोग
दोपहर मे उस भोजनालय का पता पूछते हुए पहुचे। कपड़ा बाज़ार मे ही उक्त भोजनालय पहली मंजिल पर था। सही जगह का नाम तो नहीं मालूम
पर कोई पुरानी बिल्डिंग थी। सीढ़ियाँ लकड़ी की बनी हुई थी। हम लोग सीढ़ियाँ चढ़ कर उस भोजनालय मे पहुंचे। भोजनालय साफ सुथरा था लेकिन कुर्सी मेज आदि नहीं थी। यह जन
कर हमे और भी अच्छा लगा कि पूर्णतयः भारतीय परिवेश मे भोजन करने की व्यवस्था हैं।
होटल के कर्मचारियों ने लंबी विछी पट्टी पर हम सब को बैठाया। उन लोगो ने हम सभी के
सामने पत्तल परोस दी। हम लोगो ने उन लोगो से अपने पूर्ण शाकाहारी भोजन ग्रहण करने
की इक्क्षा से उन कर्मचारियों को अवगत
कराया जो भारतीय परिवेश मे धोती पहने हुए
थे। अचानक उनमे दो लोगो ने आपस मे चर्चा
की और मुझसे मेरी जाति पूंछी। मैं थोड़ा चौंका फिर भी मैंने बताया मैं सहगल हूँ
खत्री जाति से हूँ, यू॰पी॰
का रहने बाला हूँ। मेरे को घोर आश्चर्य हुआ जब उसने हम सभी को भोजन कराने
से माना कर दिया। जब मैंने ऐसा करने की बजह पूंछी तो उसने मुझे कहा कि आपलोगो को
भोजन नहीं कराया जा सकता? मैंने कहा हम लोग पूर्णतयः
शाकाहारी भोजन करते हैं। आपके भोजनालय का
पता एक दुकानदार ने दिया था और आपके भोजनालय की काफी प्रशंसा भी की थी आपका जो भी
भोजन का शुल्क है हम भुगतान करेंगे, हम मुफ्त मे भोजन ग्रहण
नहीं कर रहे? लेकिन उन कर्मचारियों ने साफ-साफ भोजन कराने से
मना कर सामने विछी हुई पत्तलों को उठा लिया। तब मैंने कुछ ज़ोर देकर कहा कि आपको
पत्तल आदि देने के पूर्व पूंछताक्ष करनी चाहिए थी? आपका यह
व्यवहार निंदनीय हैं। परदेश का मामला था
माता-पिता और पत्नी के अलावा दोनों छोटे बच्चे साथ थे, बहस
करना उचित नहीं लगा। बुरा तो बहुत लगा कि
स्वंत्रता के 49 साल बाद भी इस तरह जाति, धर्म का भेद भाव आज भी हिदुस्तान मे जारी हैं। हम
लोगो ने बापस आकार एक अन्य भोजनालय मे भोजन किया किन्तु पूरी गुजरात के शानदार
यात्रा के अंत मे इस घटना के अपमान और भेद-भाव से मिले घाव को मैं आज तक नहीं भूला हूँ।
विजय सहगल
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