रविवार, 18 नवंबर 2018

मित्र अनिल समधिया


"अनिल समाधिया होने का अर्थ" 

वैसे तो हमारे मित्र अनेक है परन्तू अनिल जैसे मित्र की बात कुछ और है। अनिल तुम्हें शायद याद होगा हमारी मित्रता की शुरुआत 1973-74 मे हुई थी जब हम लोग 8वी पास कर सरस्वती पाठशाला इंटर कॉलेज मे दाखिल हुए थे। हम लोगो का घर भी नज़दीक था। हमारे माता-पिता एक दूसरे से परिचित तो थे किन्तू पारवारिक प्रगाढ़ता हम लोगो की मित्रता के बाद ही हुई। परन्तू मित्रता की नीव एक अजीव किस्से से हुई इसे हम दोनों के अलावा हमारे बड़े भाई साहब श्री शरद सहगल के अलावा शायद कोई नहीं जनता। उन दिनो झाँसी मे एक सर्कस लगा हुआ था। अनिल के पिताजी नगर पालिका मे हुआ करते थे। तुमने हमे उस सर्कस का एक पास दिया था जो दो लोगो के लिये था। हमारी ईक्षा सर्कस देखने की थी हमने भाई साहब से जिद कर साथ चलने के लिये मनाया। अनिल की राइटिंग का कोई जबाब नहीं था उससे अच्छी राइटिंग हमने अपने जानने बालो मे आजतक नहीं देखी। हुआ यू था तुमने एक सफ़ेद कार्ड पर हू-व-हू पास की नकल कर अपने हाथ से लिख कर हमे दी थी। ये स्पष्ट था कि वह छपा हुआ पास नहीं था वह हाथ से लिखी हुई पास कि नकल थी। परन्तू हमे न जाने क्यों दूर दूर तक उसके बारे मे कोई शंका नहीं थी। जब हमने वो पास सर्कस के मैनेजर को दिया तो वह दक्षिण भारतीय शक्स तो गुस्से से लाल पीला होने लगा और धमकी देने लगा की ये फर्जी पास है। जब भाई साहब ने देखा तो सारा माजरा समझते देर नहीं लगी। वह प्रथम द्रष्ट्या पास की हाथ से लिखी नकल थी। ख़ैर उन्होने स्थिति को सम्हाला एवं टिकिट खरीद कर सर्कस को देखा। अगले दिन हमने अनिल को उस घटना के बारे मे शिकायत की तो तुमने आश्चर्य मिश्रित भावनाओ से बताया की अरे तुम उस पास को सचमुच असली समझे थे वह तो हमने यू ही मज़ाक मे तुम्हें लिख कर दे दिया था वो तो देखने मे ही अलग दिख रहा था तुम उस पास को ले कर सर्कस भी चले गये? मैंने जब कहा "हाँ हमे भी वह मज़ाक लगा था पर वो पास तुम्हने हमे दिया था हमे उस पास पर नहीं तुम पर विश्वास था"। हम तो उस विश्वाश को लेकर सर्कस मे गए थे । तमाम अफसोस के पश्चात उस घटना के वाद हम दोनों की मित्रता की एक नई शुरूआत हुई। तुम्ह्ने उस घटना के बाद हमारी मित्रता मे ताउम्र अब तक विश्वास मे रत्ती भर कमी नहीं आने दी। दिन व दिन एक दूसरे के परिवारों मे हम दोनो एक परिवार के सदस्य के रूप जाने जाने लगे। धीरे धीरे हम लोग विध्यालय से महाविध्यलय पहुंचे हमरी मित्रता भी समय की गति के साथ आगे बढ़ती रही। एक विशेष बात जो हम दोनों के बीच रही की दोनों परिवार की जो सवसे नजदीकी रिश्ते थे जैसे -मामा, बुआ, बहिन-बहिनोई, भतीजे-भतीजी, भांजे-भांजी, भाई, मौसी एक दूसरे के इन नजदीकी रिशतेदारों को जानते ही नहीं थे बल्कि उन सभी के यहाँ हम लोगो का आना जाना आज भी वादस्तूर जारी है। हमे अब भी याद है प्रदीप भाईसहब ने हमे ओरग्निक कैमिस्ट्रि की Tution दी थी और तबके बाद से हम लोगो का लगभग प्रायः एक दूसरे के घर आना जारी रहा, घर मे अम्मा पिताजी से हमे पुत्रवत स्नेह हमेशा मिला।। चान्स की बात थी की हम दोनों की सर्विस भी लखनऊ मे पोस्टिंग के साथ हुई। लखनऊ मे ही स्व. राजेन्द्र अग्निहोत्री परिवार से मुलाक़ात हुई एक और परिवार हमारे परिवार मे घर के सदस्यों की तरह शामिल हो गया । यहाँ तक की हम लोग एक दूसरे के ससुराल के सदस्यों से गहरे से जुड़े रहे। अनिल तुम्ह्ने हमेशा एक सच्चे दोस्त की तरह हमारा हर मुश्किल की घड़ी मे साथ दिया और संकट के समय समाधान होने तक साथ खड़े रहे। तुम्हें याद है लखनऊ मे जब एक बार खाने मे कुछ रोटियाँ कम पड़ी थी, पटैरिया जी दस तंदूरी रोटी लाने होटल गये थे और उसने दस तंदूरी मुर्गे पैक कर दिये थे जब उसे 450/- रुपये मांगे तब कही बताया की रोटियाँ चाहिए। इस तरह की अनेक घटनाए हमारे जेहन मे आज भी ताजा है। श्रीमद भगवत गीता मे मित्र की मध्यस्थ शब्द के रूप मे बहुत सुंदर व्यख्या की है "दोनों पक्षों का हित चाहने वाला" उक्त शब्द को तुमने बहिन नीलम के रिश्ता कराते समय चिरथार्थ किया। हम जब भी तुम्हारे घर जाते और घर पर उस समय कोई रिश्तेदार या मित्र होता तो पिताजी हमारा परिचय अपने उन रिशतेदारों या परिवार मित्रों के समक्ष अनिल के क्लोज़ मित्र के रूप मे कराते तो हमे फ़क्र का एहसास होता। रायपुर से जगन्नाथ पुरी तक की शानदार, यादगार यात्रा मारुति 800 से करने का व्रतांत सिद्धार्थ, साक्षी, सौम्या और जया को आज भी याद होगा। अक्सर हम उस यात्रा को याद कर लेते है। हम सभी तुम्हारे शीघ्रा स्वस्थ होने की कामना करते है ताकि हम लोगो ने जो वादा सेवानिव्रती के पश्चात वद्रीनाथ, केदारनाथ यात्रा के लिये किया था उसे पूरा कर सके।
अनिलतुम्हारे  जन्मदिन पर तुम्हे बहुत बहुत शुभकामनाये।
तुम्हारा मित्र।

विजय सहगल

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