"मेकाहारा"
बो स्याह, भयाबह काली रात मुझे आज भी याद हैं। उन दिनो मैं
रायपुर मे था। बर्ष और माह ठीक से याद नहीं शायद 1998-99 रहा होगा। हमारे मित्र
देवांगन का रात मे लगभग 9 बजे फोन आया कि उनकी शाखा के गार्ड श्री दास को ब्रेन
हैमरेज़ हुआ है मैकाहारा (मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल, रायपुर)
मे एड्मिट हैं। रायपुर मे उन दिनो तीन शाखाएं थी, मुख्य
शाखा-जी॰ ई॰ रोड, मेडिकल कॉलेज काउंटर,
क्लेकटोरेट काउंटर,।
रायपुर स्टाफ की एक बड़ी खूबी थी
(अब भी हैं) बह थी आपसी भाई चारा, एक दूसरे के दुख:-दर्द मे
सभी का साथ मे खड़ा होना। न केवल रायपुर पूरे मध्य प्रदेश (उस समय रायपुर मध्य
प्रदेश मे था, आज का छत्तीसगढ़ भी उसी परंपरा का निर्वहन कर
रहा हैं) मे ऐसा आपसी सद्भाव सेंट्रल जोन
कमेटी, अधिकारी-कर्मचारी यूनियन के कारण संभव हुआ था जो शायद
ही कही देखने को मिलता हो। देवांगन जी ने
बताया रात मे लगभग 7 बजे शाखा को बंद करते समय श्री दास बेहोश हो कर बहीं गिर गये
थे। उन्हे ब्लड प्रैशर की शिकायत थी। उसी हालत मे उन्होने खुद बी॰पी॰ की दबाई लेने की कोशिश भी की जो बह अपने पास रखते थे परन्तू कोई लाभ न
होने के कारण उनको हॉस्पिटल मे एड्मिट कराया गया जो शाखा के बहुत नजदीक था। चूंकि
वहाँ पर अपनी शाखा थी हॉस्पिटल का सारा स्टाफ मेडिकल कॉलेज शाखा के स्टाफ को अच्छी
तरह जानता था तुरंत ही एड्मिशन की
औपचारिकता पश्चात उपचार उपलब्ध
हो कर इलाज शुरू हो गया। धीरे-धीरे मेरे सहित मुख्य शाखा से मजूमदार जी, मेडिकल काउंटर से निनावे, निखाड़े, हिरेंज जी और अन्य अनेक स्टाफ हॉस्पिटल पहुँच गये। ब्रेन हैमरेज के कारण
मुह-नाक से काफी रक्त बह गया था। रक्त की आवश्यकता थी। मेरे सहित 2-3 और स्टाफ ने तुरंत ही रक्त उपलब्ध करा दिया।
हम सभी लगातार दास जी के पास ही खड़े थे और उनके शीघ्र स्वस्थ की कामना कर रहे थे। परंतु
दुर्भाग्यवश इतनी सब देखभाल के बाबजूद भी दास जी को नहीं बचाया जा सका और उनका
देहावसान रात लगभग 1 बजे हो गया। हम सभी
स्टाफ काफी गमगीन हो गये। पर होनी को कौन टाल सकता था? सभी
बुझे और दुखी मन से उनके परिवार से बात कर
उनके पार्थिव शरीर के अन्त्येष्टि के बारे मे चर्चा कर कार्यक्रम बनाने लगे। दास
जी का ग्रहनगर रायपुर से 40-50 कि॰मी॰ दूर राजिम मे था। सभी स्टाफ सदस्यों ने जिनकी संख्या 15-20 से उपर रही होगी काफी दुखी मन से
आपस मे चर्चा के बाद यह तय किया कि
सुबह लगभग छः बजे हॉस्पिटल से ही सीधे श्री दास जी के पार्थिव देह को एम्ब्युलेन्स से उनके ग्रहनगर
राजिम ले जाया जायेगा जहां उनका अंतिम
संस्कार किया जायेगा। इस बार्तालाप, सलाह मशविरा मे हम लोगो
को 1 घंटा और लगा होगा। लगभग रात के 2-2.5 का वक्त होगा। उन दिनो मोबाइल का चलन
शुरू नहीं हुआ था, पेजर का चलन था। हम लोगो ने तय किया कि सभी अपने-अपने घरों मे
जाकर आगे के कार्यक्रम की सूचना परिवार को दें एवं आवश्यक कार्यों को तुरंत निपटा कर
बापस हॉस्पिटल मे ही एकत्रित हो जायें ताकि सभी एक साथ मिलकर राजिम स्थित
ग्रहनगर मे श्री दास जी की अन्त्येष्टि मे
शामिल हो सके। हम सभी स्टाफ बात करते हुए मेडिकल कॉलेज काउंटर की तरफ बढ़ लिये जहां
हम लोग प्रायः अपने वाहन आदि खड़े करते थे। क्योंकि मेडिकल कॉलेज परिसर मे स्टैंड
के अलावा अन्यत्र पार्किंग निषेध थी इसलिये हम सभी स्टाफ जब कभी भी मेडिकल कॉलेज
काउंटर जाते थे तो काउंटर के सामने ही अपने स्कूटर, कार आदि
पार्क करते थे जो अंदर पीछे की तरफ था। वहाँ पर ही मेडिकल कॉलेज के अन्य स्टाफ भी
अपने वाहन खड़े करते थे। जब मैं अपनी कार मे बैठा और कार को स्टार्ट किया तो मैंने
महसूस किया की कार का स्टाइरिंग मोड़ने मे
काफी दिक्कत हो रही हैं। जब मै कार के इंजिन को
बंद कर नीचे उतरा तो देखा ड्राईवर सीट बाले अगले पहिये मे बिलकुल हवा नहीं
हैं मैं समझ गया गाड़ी पंचर हैं। यह देख कर हमारे कुछ साथी मेरी सहायता के लिये रुक
गये। कार की डिक्की से स्टेपनी निकाल कर मैंने
पहिये बदलने की प्रिक्रिया शुरू ही की थी कि देवांगन जी बोले सर इस का तो
अगला दूसरा पहिये मे भी बिलकुल हवा नहीं हैं शायद दूसरा पहिया भी पंचर हैं? अब मेरा माथा ठनका ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि दोनों पहिये एक साथ पंचर
हों? मुझे कुछ साजिश की शंका होने लगी। हम लोग सारी रात से
हॉस्पिटल मे परेशान थे अब ये नई समस्या का सामना या यों कहे समाधान का रास्ता
खोजने के लिए कार की डिक्की से पहिया बदलने हेतु टूल्स निकालने लगे। अचानक एक मेडिकल स्टूडेंट जिसने बेहद शराब पी
रखी थी अपने कुछ साथियों के साथ आया और यहाँ गाड़ी खड़ी करने पर एतराज करने लगा। हम
लोगो ने जब बैंक स्टाफ होने का परिचय दिया इसके बाबजूद भी लगातार बह ऊल-जलूल कुछ
भी बोले चला जा रहा था। हम लोगो ने अपने साथ हुए हादसे का भी उल्लेख किया पर
बेकार। तब मुझे सहसा याद आया यह मेडिकल
छात्र अपने कुछ साथियों के साथ सारी रात हॉस्पिटल के वार्डो मे शराब पीकर हल्ला-गुल्ला
मचा रहा था। कुछ चौकीदार, गार्ड के साथ इसने मारपीट भी की
थी। जिसकी आवाज़े लगातार हम लोगो ने सुनी थी। शराब पीकर बोतल-गिलास, खिड़कियों के शीशे तोड़ने की आवाजे
भी हमने सुनी थी और इस गुंडागर्दी पर आपस
मे चर्चा भी की थी, पर हमे कभी ऐसा नहीं लगा की इतने पढे
लिखे वर्ग का छात्र कार के पहियों की हवा निकालने की इतनी नीच ध्रष्टता करेगा? हम लोग अपने स्टाफ के इलाज हेतु वैसे ही परेशान थे और उसके देहांत के बाद
तो और भी दुखी थे इसलिये इस उद्दंड छात्र के पूरे हॉस्पिटल मे किये जा रहे
उद्दंडता की तरफ हमारा ध्यान होते हुए भी नजरंदाज किया था। किन्तु अब उसके इस
व्यवहार से हमारा शक पक्का था कि हमारी
कार के अगले दोनों पहियों की हवा इसी दुष्ट छात्र ने ही जान कर निकाली हैं। हम
जैसे तैसे एक पहिये को खोल कार का पहिया बदल रहे थे, हाथ मे
पहिये खोलने का "पाना" (औज़ार) था, क्रोध तो बहुत
आया पर एक और नई समस्या को आमंत्रित करन उचित नहीं समझा। एक पहिया बदलने के बाद
हमने दूसरे पहिये मे हवा न होने के बाबजूद कार को धीरे धीरे चला कार वहाँ से हटा
कार दूसरी जगह जहां कुछ चहल पहल थी कार को ले जाना उचित समझा। अब समस्या थी दूसरे
पहिये को बदलने की। बगैर एक और पहिये मे हवा भरे दूसरे पहिये को बदल पाना संभव
नहीं था। रात के 3 बजे हवा भरने बाले भी उपलब्ध नहीं थे। रात मे शास्त्री चौक, घड़ी चौक, जी॰ई॰ रोड, मेडिकल
कॉलेज के आस-पास घोर सन्नाटा पसरा था। एक
पहिये की अदला-बदली मे ही काफी थकान हो गई थी। अपने साथी के स्कूटर पर सवार होकर
हम स्टेपनी लिये हुए काफी भटके पर रात मे पंचर बाला कोई नहीं मिला जिससे पहिये मे
हवा डलवाई जा सके । फिर किसी ने बताया स्टेशन के पास एक पंचर बाला बैठता हैं जो 24
घंटे पंचर/हवा भरने का काम करता हैं। हम
लोग भागे भागे स्टेशन पहुंचे, सौभाग्य से उसकी दुकान खुली थी
तब हमने दूसरे पहिये मे भी हवा भरवा कर टूल्स की मदद से उस अगले दूसरे पहिये को भी बदला। सारी रात से श्री दास जी के इलाज़ और देहांत के पश्चात उनके
शव को लेकर हम सभी मानसिक रूप से परेशान
होकर थक चुके थे इस कार की घटना ने हम लोगो को शारीरिक रूप से भी काफी थका कर
परेशानी को और दुगना कर दिया था। मैं हैरान था कि कैसे एक मेडिकल स्टूडेंट जो कि समाज मे एक अलग आदर सम्मान रखते हैं इतनी
नीचता और धूर्तता कर सकता है जिसके कारण हमलोगो को को इतनी परेशानी का सामना करना पड़ा। हम लोग उस
दिन किसी तरह राजिम पहुँच कर श्री दास जी अंतिम यात्रा मे शामिल हुए अंतेयष्ठि
पश्चात उनके शोकाकुल परिवार को इस अपूर्णिय क्षति मे धैर्य धारण करने की शक्ति
हेतु ईश्वर से प्रार्थना की।
दोपहर बाद जब हम लोग बापस रायपुर पहुंचे तो मुख्य
ब्रांच के प्रबन्धक वी॰के॰ शर्मा एवं अन्य स्टाफ से विचार विमर्श कर उस छात्र के
विरुद्ध उक्त घटना की मैंने मोदहा पारा, पुलिस स्टेशन
रायपुर मे एफ़॰आई॰आर॰ दर्ज कराई। एक शिकायती पत्र मेडिकल कॉलेज के डीन को भी दिया।
उक्त शिकायती पत्र पर डीन श्री मुखर्जी ने कार्यवाही करते हुए उस छात्र के कृत की
तीव्र निंदा की और उस छात्र के निलंबन पर
अपने स्टाफ के साथ विचार विमर्श किया। मेडिकल कॉलेज के सभी प्रोफेसर एवं स्टाफ इस
घटना से एक मत होकर नाराज़ थे। सभी की राय
थी उसका कार्य वास्तव मे निंदनीय है पर निलंबन से उस छात्र का जो कि फ़ाइनल ईयर का
छात्र था, भविष्य
बर्वाद हो जायेगा। इस को द्रष्टिगत रखते
हुए उससे अपने अपराध के लिये माफी मांगने को कहा। उस छात्र ने हम सभी से अपने कृत
के लिये माफी मांगी। बही दूसरी ओर पुलिस ने भी अपनी जांच शुरू कर दी थी अतः उक्त
मेडिकल स्टूडेंट ने व्यक्तिगत तौर मे हमारे कोलेक्ट्रे काउंटर पर आकार पुनः हम से
माफी मांगी अतः हमने अपने साथियों से विचार विमर्श कर चेतावनी देते हुए माफ कर अपनी
पुलिस शिकायत बापस ले ली।
यध्यपि इस घटना को घटे लाभग 20-22 साल हो गये
परन्तू उस मेडिकल डॉक्टर के इतने गैर जिम्मेदारान और उग्र व्यवहार पर हम आज भी
चिन्तित है कि क्यों कर उसने हमारे साथ हद दर्जे की नीच और बचकानी हरकत की? उम्मीद हैं वह आज जहाँ भी हो उक्त
व्यवहार को छोड़ कर एक शालीन मेडिकल डॉक्टर के रूप मे प्रैक्टिस कर जनता की सेवा कर
रहा होगा।
विजय सहगल
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