रविवार, 21 अक्टूबर 2018

गैंग ऑफ होशियारपुर


"गैंग ऑफ होशियारपुर"



मैं कई महीनों से अपनी होशियारपुर शाखा मे हमारे साथ घटित अनुभव के बारे मे लिखने की सोच रहा था पर उसकी क्या या कैसे शुरुआत करे "रूप-रेखा" सूझ नहीं रही थी।  अचानक एक दिन एक कागज पर एक सुंदर श्लोक भावार्थ सहित मुझे हमारे एक मित्र पी पी शर्मा ने हमे दिखाया जो हमारी कॉलोनी मे ही रहते है। उक्त कागज पर लिखित श्लोक उनको  श्री जी. बी. सिंह द्वारा दिया गया था जो ग्वालियर संस्कृत कॉलेज के  सेवनिबृत्ति प्रधानाचार्य है । हमे बाद मे पता चला कि श्री सिंह का ये स्वभाव  है कि वे जब मिलने के लिए किसी के घर जाते है तो एक हस्तलिखित कोई श्लोक   या नीति वाक्य लिख कर मेजबान को भेट करते हैं।
कागज पर सुंदर हस्तलेखनी से भर्तहरि का श्लोक भावार्थ सहित निम्नानुसार है:-

एके सत्पुरुष: परार्थघटकाः स्वार्थम परित्यज्य ये
सामान्यास्तु  परार्थ  मुध्यमभृतः, स्वार्थाविरोधन ये,
तेsमी मानुष  राक्षसाः परिहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति  ये
ये निघ्नन्ति निर्थकं परहितं,ते के न  जानीमहे .             (भर्तृ हरि -नीति शतक  ६५)

अर्थात 

वे मनुष्य उत्तम कोटि के है जो स्वार्थ का परित्याग करके दूसरे की भलाई करते है.
अपना हित करते हुए जो दूसरे का भी हित करते हैवे मध्यम कोटि के मनुष्य कहलाते है.
जो मनुष्य स्वार्थ सिद्धि के लिए दूसरे का अहित करते हैवेमनुष्य के रूप में राक्षसहै.
किन्तु जो मनुष्य बिना किसी स्वार्थ के दूसरे  का अहित करते हैउन्हें क्या नाम दिया जाय हम नहीं जानते?

 इस घटना क्रम मे गैंग शब्द जैसी कोई बात नही है ये तो  यू ही फिल्म  "गैंग ऑफ वसेपुर" से बसीभूत शीर्षक में लिख दिया किन्तु घटनाक्रम मे होशियारपुर सही है।  मै उन दिनों रिटेल असेट ग्रुप (खुदरा अस्ति समूह) नोएडा  का निरिक्षण कर रहा था और रिहाइश दिल्ली के टैगोर गार्डेन से नोएडा मे शिफ्ट की थी। चूंकि अधिकतर समय प्रादेशिक निरीक्षालय कनॉट प्लेस न्यू दिल्ली मे बैठने के कारण नोएडा की शाखाओं मे परिचय न होने के कारण  मैंने  खुदरा अस्ति समूह, नोएडा के ऑफिस में कार्यरत प्रबन्धक  श्री प्रभात पाराशर से लॉकर की आवश्यकता के विषय में बताया, तो उन्होने तत्काल शाखा होशियारपुर के प्रबन्धक को लॉकर के  सन्दर्भ में चर्चा की। चूंकि  हमारे निवास होशियारपुर शाखा के पास था तो  उन्होने होशियारपुर शाखा प्रबंधक को हमारी लॉकर की  आवश्यकता पूर्ती  मे सहयोग  करने का निवेदन किया । हमारा  कुछ दिन बाद ही नॉएडा से परिवार सहित कुछ दिनो के लिए बहार जाने का कार्यक्रम था अतः कुछ मूल्यवान वस्तु आदि को लॉकर मे रखने के लिया पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के तहत हम  शाखा होशियारपुर मे लॉकर  लेने के लिया पहुंच गये। चूँकि उस दिन शनिवार को बेटे का अवकाश था और लॉकर बेटे के साथ मुझे संयुक्त नाम से लेना था।   मैंने शाखा पहुँच कर वरिष्ठ प्रबंधक महोदय को अपना परिचय देते हुए लॉकर  देने का निवेदन किया।

यद्यपि शाखा में बहुत भीड़-भाड़ ज्यादा नहीं थी फिरभी प्रबंधक महोदय ने कुछ अनमने ढंग से अन चाहे अंगान्तुक की तरह  हमें चार बजे के बाद आने के लिए बोला। चूंकि मैं बेटे के साथ  ज्वेल्लेरी आदि सामान लॉकर मे रखने के उद्देश्य  लेकर ही शाखा मे आया था। अतः अपने इस आशय को स्पष्ट कर उनसे सारी औपचारिकताएं करने का पुनः निवेदन किया। तब उन्होने मुझे बेमन से शाखा-हाल  में बैठने को कहा।  मैंने उन्हें लॉकर रजिस्टर, लीज़  रजिस्टर आदि स्वयं भर  कर सहयोग करने के लिये आश्वस्त किया और ऐसा हमने किया भी. यध्यापि शाखा प्रबन्धक का व्यवहार उस समय तक एक स्टाफ के नाते कुछ अजीब या यूं कहे  ठीक ठाक नही था। सावधि जमा, रेंट आदि की समस्त औपचारिकताओं मे कुछ ज्यादा ही समय लग रहा था तब मैंने प्रबन्धक महोदय से एक सहयोग करने का पुनः निवेदन किया कि पहले आप मुझे लॉकर दे दे ताकि सामान आदि रखने के बाद मैं अन्य औपचारकिताओं पूरी  कर लूँ। लेकिन उन्होने प्रिक्रिया  पूर्ण करने तक धैर्य रखने को कहा। हाल मे बैठे अन्य स्टाफ का रवैया सहयोगात्मक रहा और उन्होने हमे और बेटे को समुचित आदर देते हुए बैठाला एवं चाय-पानी के बारे मे पूंछा।  जब प्रबन्धक महोदय ने मुझे लॉकर जारी किया तो लॉकर कैबिनेट के सबसे निचली लाइन का लॉकर दिया। हमने उनसे लाकर कुछ मध्यम उचाई तक देने का निवेदन ताकि बहुत अधिक झुकना न पड़े क्योंकि उन दिनों मेरें गॉलब्लेडर में स्टोन  के कारण  ऑपरेशन हुआ था जिसका जिक्र मैंने शाखा प्रबन्धक से भी किया। परन्तू   उन्होंने हमें बताया की शाखा में मात्र दो लॉकर ही खाली है। सबसे नीचे की लाइन और उसके ऊपर की लाइन में ही लाकर की उपलब्धता है और अन्य कोई लॉकर शाखा मे खाली नही है। इस पूरी प्रिक्रिया के दौरान उनका व्यवहार कुछ अनमने मन का रहा. चूँकि मध्यम उचाई पर लाकर को ऑपरेट करने में थोड़ा आसानी रहती है लेकिन मजबूरी थी लॉकर सबसे नीची दो लाइन में ही था मैंने निचली लाइन का लॉकर ले लिया और अपना सामान रख कर अन्य औपचारिकताओं के लिये स्ट्रॉंग रूम से बाहर आ गया। सावधि बनने, आइ. डी.  ट्रान्सफर करने के बाद जब मैंने उन्हे पूंछा कि कोई अन्य औपचारिकता तो नही रह गई? तो उन्होने स्टैम्प पेपर के लिये 150/- रूपय नगद देने को कहा और स्वयं ही विवरण देते हुए  बताया कि स्टैम्प पेपर 50/- रूपय का लगेगा और 100/- रूपय चपरासी को आने जाने का कन्वेएंस चार्ज लगेगा। मुझे 150/- रूपय देने
की  कोई दिक्कत या ऐतराज नही था परन्तू उनके 150/- रूपय के विवरण सुन कर काफी हैरानी हुई, उस विवरण को सुन कर मेरा बेटा धीरे से मुस्कराया और उसने 150/- रूपय प्रबन्धक महोदय को दे दिये। बेटे की उस तीखे कटाक्ष भरी मुस्कराहट से आज भी मैं नही उबर पाया हूँ। मैं उक्त विवरण सुन कर सन्न था और इस सम्मानीय बैंक मे अपनी 38  साल की सेवाओं  पर एक प्रश्न चिन्ह लगा महसूस कर रहा था। यह व्यवहार यदि शाखा मे मैं अकेला होता तो कोई बात न होती परन्तू बेटे की उपस्थिती मे शाखा प्रबन्धक के इस व्यवहार को देख कर अब हमारी हिम्मत शायद अपने बैंक की किसी भी अन्य शाखा मे कम से कम परिवार के साथ जाने की नही होगी। 

घटना के दूसरे दिन जब मैं पुनः अपने कार्य पर खुदरा अस्ति समूह सैक्टर 62 नोएडा मे पहुंचा तो श्री पाराशर ने मुझसे शाखा होशियारपुर मे  लॉकर जारी करने के बारे मे पूंछा,  मैंने उन्हे घटित सारा घटना  विवरण बताया। उन्होने जब ये विवरण सुना तो कुछ क्रोधित होते हुए शाखा होशियारपुर की लॉकर रिपोर्ट निकाली मुझे भी ये जान कर हैरानी हुई कि  उस शाखा मे 28 लॉकर खाली थे!! उन्होने शाखा प्रबन्धक के इस व्यवहार के लिये उन्हे फोन करना चाहा परन्तू मैंने ही उन्हे ऐसा करने को मना कर दिया मेरा मानना था "कि सोते हुए व्यक्ति को तो जगाना आसान है पर जागे हुए व्यक्ति को जगाना मुश्किल ही नही असंभव है"। लेकिन लॉकर होते हुए भी इच्छित लॉकर न देना और 150/- रूपय का विवरण देने  पर प्रबन्धक महोदय के इस व्यवहार के लिये मुझे आज भी टीस व हैरानी है। 

इस घटना के 6 माह बाद से आज तक भी मैं समझ नहीं पाया कि उन "सज्जन" प्रबन्धक महोदय ने हमारे अनुरोध के बावजूद उपर की पंक्ति मे  लॉकर की उपलब्धता होते हुए भी सबसे नीचे की पंक्ति मे लॉकर क्यों दिया !!??
हालांकि आश्चर्य और संतोष इस बात का  ज्यादा  है कि ऋषि भर्तहरि ने ऐसे व्यक्तियीं की पहचान हजरों साल पहले कैसे करली !!!
अंत मे अब मैं इस बात का निर्णय अपने सम्माननीय पाठकों पर छोड़ता ही कि वे उन प्रबन्धक महोदय को उपर्युक्त श्लोक की किस कोटि मे रखेंगे? आपके ऑप्शन है श्लोक की लाइन क्रमांक 1, लाइन क्रमांक 2, लाइन क्रमांक 3 अथवा लाइन क्रमांक 4 और आपका समय शुरू होता है
"अब" ॥

विजय सहगल  

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

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