इतिहास
इस बात का गवाह है कि दीवार हमेशा झगड़े, वैमनस्य या मनमुटाव का कारण रही है। जब जब दीवार बनी है
उसने आदमी से आदमी को अलग ही नही किया बल्कि मतभेदों,
विवादों के साथ दो व्यक्तियों, दो सभ्यताओं, दो देशों, दो समाजों और दो धर्मो को भी आपस मे
बांटा हैं फिर चाहे वो दीवार चीन की रही
हो, जर्मनी, या घर, पड़ोस मे खींची दीवार हो। लेकिन इस मामले मे मैं बहुत खुश नसीब हूँ कि
मेरे साथ ठीक इस के विपरीत हुआ है।
जब
मैंने ग्वालियर मे मकान खरीद तो बो एक रो-हाउस था जिसका निर्माण म.प्र. हाउसिंग
बोर्ड ग्वालियर दुवारा किया गया था। मिरर
इमेज की तरह दो घरों की एक संयुक्त दीवार
थी। दो तरफ की तो बाउंड्री बाल बगल और
पीछे बाले मकानों के साथ लगी थी किन्तु एक तरफ पूरे मकान की दीवार कॉमन थी जो
हमारे पड़ौसी के मकान से लगी हुई थी। सिंगल स्टोरी के मकान तक तो ठीक रहा पर जब अतिरिक्त गृह ऋण सुविधा आई तो मैंने अपने मकान के उपर एक नई मंजिल बनाने का विचार बनाया और मकान निर्माण का कार्य शुरू किया। पर जब कॉमन
दीवार के निर्माण का काम शुरू हुआ तो एक नई समस्या खड़ी हो गई। दोनों मकानों की कॉमन दीवार जो हमारे पड़ोसी के मकान
से लगी थी 14 इंच चौड़ी थी। उस दीवार का निर्माण 9 इंच लंबाई की ईट और और 4 इंच चौड़ाई की ईटों को रख कर बनाया गया
था और आधा-आधा इंच का प्लास्टर दीवार के दोनों ओर किया गया था इस तरह वो कॉमन
दीवार 14 इंच की थी। उसी समय हमे मकान निर्माण के दौरान दीवार के
निर्माण का ज्योमिति भी समझ मे आई, ईट की लंबाई-
चौड़ाई 9"X4" इंच के कारण कोई भी दीवार या तो 4 इंच की होगी या 9 इंच की या 9 और 4
इंच के जोड़ या गुणक मे होगी। इस तरह उस संयुक्त 14 इंच की दीवार मे 7 इंच
दीवार हमारे हिस्से मे थी और 7 इंच हमारे पड़ोसी के हिस्से मे। चूकि ईट की लंबाई 9
इंच होती है तो प्रथम मंजिल की दीवार बनाने मे सारी ईंटों को दो इंच तोड़ना पड़ता जिससे दीवार
कमजोर और एक सीध या बराबरी से नही बनती। इस दुविधा मे एक - दो दिन निकाल गए। इस के लिये दो रास्ते थे। नंबर एक या तो उस 14 इंच की दीवार पर हर ईट को 2 इंच तोड़ कर दीवार बनाये जो कि कमजोर और बराबर न होने
के कारण संभव नही थी। दूसरा रास्ता था कि हम पूरी ऊंचाई तक दीवार 14 इंच तक बनाये
और उसके बाद 7 इंच की जगह अपने पड़ौसी रावत जी के लिये खाली छोड़ शेष 7 इंच का उपयोग
हम अपने मकान निर्माण के लिये करे पर उस अतिरिक्त निर्माण की लागत को हमे वहन करना पड़ता। चूंकि दीवार निर्माण
मे इस समय हमारा स्वार्थ था क्यों कर कोई दूसरा इस निर्माण के व्यय का सहभागी बने? हमने
घर मे बात-चीत कर अपने पड़ौसी से इस संबंध मे बात करने का निश्चय किया।
पर
कहते हैं न कि वो लोग भाग्यशाली होते है जिनको अच्छे पड़ौसी मिलते है। इस मामले मे
वास्तव मैं बहुत सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे श्री यू. एस. रावत जी जैसे अच्छे पड़ौसी
मिले। वे सीमा सुरक्षा बल से कममांडेंट के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। सेना मे रहते
हुए उन्होने 1965 व 1971 की लड़ाई देश के लिए लड़ी थी। उन्हे इस बहादुरी के लिए "गालण्ट्री" पुरुस्कार मिला था। जब हमने अपनी दुविधा अपने
पड़ौसी श्री यू. एस. रावत जी से की और उन्हे दीवार निर्माण मे आ रही समस्या के बारे
मे बताया। मुझे जान कर सुखद आश्चर्य हुआ कि जिस दीवार के निर्माण के लिए हम दो दिन
से चिन्तित था उस समस्या को उन्होने मिनटों मे सुलझा दिया। उन्होने हमसे पूरी
दीवार के निर्माण मे आ रही लागत की गणना करने को कहा और निर्माण की लागत का आधा
खर्चे का चैक मुझे दे दिया। उन दिनों उस कॉमन दीवार का खर्च 6-7 हजार रूपय था। आज
16-17 साल तक भी उन्होने उस दीवार का उपयोग नही किया। पिछले दिनों लिखे "गैंग ऑफ होशियारपुर " मे उल्लेखित
ऋषि भर्तृ हरि -नीति शतक श्लोक
६५" एक बार फिर हमारे दिमाक मे कौंध
गया जिसकी प्रथम लाइन मे उत्तम कोटि के
मनुष्य की परिभाषा इस तरह कही गई है "वे मनुष्य उत्तम कोटि के है जो
अपना स्वार्थ का परित्याग कर दूसरे कि भलाई करते है" वास्तव मे उन्होने वगैर
अपने किसी स्वार्थ के उस दीवार का आधा खर्च वहन किया जो उनके महान व्यक्तित्व को
परिचायक है। इस घटना के
लगभग 16-17 साल बाद भी जब हम उस घटना को याद करते है तो हमारा सिर रावत
जी जैसे व्यक्ति के प्रति श्रद्धा से झुक जाता है। श्रीमती रावत एवं उनके
दोनों पुत्र श्री भास्कर एवं डा. श्री रवि आज हमारे परिवार के सदस्य जैसे है। इस घटना
के बारे मे हमारे बच्चे भी शायद नही जानते होंगे। हमे नही
लगता इस घटना या उस दीवार के निर्माण पर किये खर्च का आधा हिस्सा उनके द्वारा वहन करने के बारे
मे रावत जी ने अपने परिवार या बच्चों को
बताया होगा। अतः इस घटना के बारे मे यहाँ लिख दिया ताकि" सनद रहे और वक्त पर काम
आवे"। श्री यू.
एस. रावत जी यध्यपि आज इस दुनियाँ मे नही है परन्तू हम उस दिवंगत महान
आत्मा को आदर सहित अपने अन्तःकरण से नमन करते है।
विजय सहगल

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें