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वेल पत्री का पेड़ "
हम जब कभी कोई शुभ कार्य करते है तब हम अन्य
दूसरे देवताओं के साथ स्थान,
ग्राम,
एवं वन देवता का भी भी आवाहन कर उनको शुभ कार्य मे शामिल होने की प्रार्थना करते
है जो अपरोक्क्ष रूप से पेड़ों/ वृक्षों की ही पूजा हैं।
हमारे धार्मिक ग्रन्थों मे,
हमारी सांस्कृति मे वृक्षों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है जिनमे एक वृक्ष को लगाना, बड़ा करना सौ पुत्रों के समान कहा गया है जो वास्तव मे सही भी है।
वैज्ञानिक द्रष्टि से भी वृक्षों के विना मानव जीवन की कल्पना संभव नहीं हैं।
लेकिन आज के युग मे किसी पेड़ को लगाना तो आसान है पर लगा कर बड़ा करना कोई आसान काम नही हैं। जहाँ एक
ओर हम प्रत्येक धार्मिक कार्यों के समापन
पर शांति पाठ मंत्रों के उच्चारण से करते हुए उन
मंत्रों मे हम ईश्वर से विश्व मे
हर जगह शांति की प्रार्थना करते हुए
"रोषधयः शान्तिः, वनस्पतयः शांतिर्विश्वे देवाः" अर्थात हे प्रभु- औषधि,
वनस्पति, वन उपवन मे शान्ति कीजये और बही दूसरी ओर हम निरीह वृक्षों के साथ बलात्कार कर उन्हे वचपन मे ही रौंद कर नष्ट कर देते
है।
हम बात ऐसे लोगो की कर रहे है
जो अपने स्वार्थ और लाभ के लिए छोटे छोटे पेड़ो से फूल, पत्तियाँ, तनो के लिये उन पेड़ो को नोचते और तोड़ते है जिसे हमने अपने घर के सामने रोपे
गए पेड़ो की परवरिश के दौरान महसूस किया। हमारा ये मानना है जब वृक्ष पूर्ण रुपेण बड़ा हो जाए तो उसमे से अपनी आवश्यकता
अनुसार फल, फूल, पत्तियाँ, लकड़ी हम प्राप्त
करे, जैसा कि कबीर दास जी ने अपने दोहे मे कहा है :-
"वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर ।
परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर ॥
अर्थात
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