मंगलवार, 9 अक्टूबर 2018

वेल पत्री का पेड़


" वेल पत्री का पेड़ "

हम जब कभी कोई शुभ कार्य करते है तब हम अन्य दूसरे देवताओं के साथ स्थान, ग्राम, एवं वन देवता का भी भी आवाहन कर उनको शुभ कार्य मे शामिल होने की प्रार्थना करते है जो अपरोक्क्ष रूप से पेड़ों/ वृक्षों  की ही पूजा हैं।
हमारे धार्मिक ग्रन्थों मे, हमारी सांस्कृति मे वृक्षों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है जिनमे एक वृक्ष को लगाना, बड़ा करना सौ पुत्रों के समान कहा गया है जो वास्तव मे सही भी है। वैज्ञानिक द्रष्टि से भी वृक्षों के विना मानव जीवन की कल्पना संभव नहीं हैं। लेकिन आज के युग मे किसी पेड़ को लगाना तो आसान है पर  लगा कर बड़ा करना कोई आसान काम नही हैं। जहाँ एक ओर हम  प्रत्येक धार्मिक कार्यों के समापन पर शांति पाठ मंत्रों के उच्चारण से करते हुए  उन  मंत्रों  मे हम ईश्वर से विश्व मे हर जगह शांति की प्रार्थना करते हुए  "रोषधयः शान्तिः, वनस्पतयः शांतिर्विश्वे देवाः"  अर्थात हे प्रभु- औषधि, वनस्पति, वन उपवन मे शान्ति कीजये  और बही दूसरी ओर हम निरीह वृक्षों के साथ बलात्कार कर उन्हे वचपन मे ही रौंद कर नष्ट कर देते है।
हम बात ऐसे लोगो की कर रहे है जो अपने स्वार्थ और लाभ के लिए छोटे छोटे पेड़ो से फूल, पत्तियाँ, तनो के लिये उन पेड़ो को नोचते और तोड़ते है जिसे हमने अपने घर के सामने रोपे गए पेड़ो की परवरिश के दौरान महसूस किया। हमारा ये मानना है जब वृक्ष  पूर्ण रुपेण बड़ा हो जाए तो उसमे से अपनी आवश्यकता अनुसार फल, फूल, पत्तियाँ, लकड़ी हम प्राप्त करे, जैसा कि कबीर दास जी ने अपने दोहे मे कहा है :-
"वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर । 
परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर ॥
अर्थात  Top of Form
 वृक्ष अपने फल स्वयं नही खाते, नदी अपना पानी स्वयं नही पीती  इसी तरह साधु पुरुष स्वयं अपने लिये नही जीते बल्कि  वह तो समाज के कल्याण के लिये अपना जीवन जीते है।
विशेष कर हम भारतीय जो जन्म से ही पेड़ों, वृक्षों, वनस्पतियों को देवताओं के रूप मे पूजते है लेकिन वास्तविक जीवन मे यदि किसी पेड़ से हमे धार्मिक या स्वास्थ से जुड़ा कोई भी लाभ या स्वार्थ नज़र आता है तो कुछ लोग  उस पेड़ को नष्ट करने या नुकसान पहुचाने मे  एक भी  क्षण  नहीं गवाते। किसी के घर की बाउंड्री  वाल से दीख रहे फूलों को तोड़ने के पूर्व किसी पूर्व  से अनुमति लिये बिना उन्हे हम ऐसे तोड़ लेते है जैसे उनपर उनका  जन्मजात अधिकार है। यदि फूल/पत्ती  सार्वजनिक जगहों, पार्को या बगीचों मे लगी  हों तो जैसे उनको तोड़ना उनका जन्मजात ही नही कानूनी अधिकार भी है। अगर किसी ने उनके तोड़ने पर सवाल कर दिया तो भगवान या स्वास्थ का वास्ता दे कर अपने फूल तोड़ने के क्रत को न्यायिक ठहराने का प्रयास करेंगे। इस प्रवर्ति से पीढ़ित फूलों के पौधों की समस्त प्रजाति शामिल है।  धतूरे के फूल से गुलाब के फूलों तक, गूढहल से लेकर गेंदे तक सभी फूल इसमे शामिल है। जहाँ तक पेड़ों की बात है सभी फलदार पेड़ों के अलावा  सबसे ज्यादा पीढ़ित नीम, आम, और वेलपत्री और थोड़ा कम पीढ़ितों मे  बबूल का पेड़ है।

हमारे घर के सामने एक छोटा सा उजाड़ मैदान था। नौकरी के दौरान बाहर रहने के कारण जब मैं सन 2000 मे ग्वालियर आया तो हम और हमारे पड़ौसी रावत जी, पांडे जी, बुंदेला जी, नागर और सोनी जी ने मिल कर उस उजाड़ मैदान मे और हरियाली लगाने का निर्णय लिया। हम लोगो ने पौध शाला से कुछ पेड़ जैसे  अमलतास, शहतूत, कठहल, अशोक, सौजना, करंजी, हरसिंगार एवं वेलपत्री के लाकर उस मैदान मे लगाये। इन वृक्षों का रोपना कोई आज की तरह का राजनैतिक  वृक्षा रोपण  कार्यक्रम नही था। हम सभी की अब गहन  ज़िम्मेदारी थी की इन छोटे छोटे पौधो की परवरिश कर इन को वृक्ष बनाये। इन की रक्षा करना एक सबसे बड़ा चैलेंजे था क्योंकि मैदान चारों तरफ से खुला था। सभी ने मिलकर मैदान की बाउंड्री पर कुछ बड़ी-बड़ी लकड़ियाँ लगा कर उन पर कँटीले तार बांध कर फेंसिंग की, दूसरी जगह से "राजनैतिक वृक्षारोपड़" (ऐसे वृक्षारोपण जहाँ वृक्ष लगाये, फोटो खींची, समाचार पत्रों  मे छपाई और वृक्षारोपण की ईतीश्री हुई) के कुछ समय बाद न तो वृक्ष बचा और न ही ट्री गार्ड बचा, टूटा हुआ ट्री गार्ड यहाँ वहाँ लुढ़कता हुआ एक "सफल राजनैतिक वृक्षारोपण" की  एक असफल वास्तविक कहानी कहता हैं। ऐसे बचे खुचे, टूटे फूटे ट्री गार्ड हम लोगो ने जहाँ-तहाँ  से मिल कर उन्हे  एकत्रित किया  और उनको  पेड़ो की सुरक्षा  पर लगाया। आये दिन भैंसों के झुंड फेंसिंग को तोड़ देते, ट्री गार्ड को गिरा देते या बकरियों का समूह पेड़ो को खा लेता या नष्ट कर देता। यदि हममे से किसी ने देख लिया तो उन्हे दूर कर कही हांक देते कभी डंडे से मारते तो भैसों/बकरियों के मालिक से झगड़ा होता। हम लोग बार बार अपनी बाउंड्री बाल फेंसिंग  और ट्री गार्ड को  दुरुस्त कर पौधों की रक्षा करते। चूंकि हमारा  घर मैदान के बीच मे होने के कारण पौधों को पानी देने की ज़िम्मेदारी हमारी थी। वृक्षा रोपण के दौरान भी हम कुछ कुछ प्रयोग करते थे, जैसे छोटे पेड़ की कुछ पत्तियाँ तोड़ कर गाय, बकरी, भैसों को खिलाते। जिन पत्तियों को ये जानवर खा लेते उन पेड़ो की सुरक्षा हम लोग ट्री गार्ड कंटीली झड़ियों आदि लगा कर  करते और जिन पत्तियों को जानवर नही खाते उन पर तोड़ा कम सुरक्षा का ध्यान करते। इस अनुभव के आधार पर मैं  कह सकता हूँ कि करंजी, अमलतास का पेड़ जिन्हे जानवर नही खाते, लगाना, उनकी परवरिश करना थोड़ा आसान था। बहीं वेल-पत्री के पेड़ को जानवरों से कम आदमियों से ज्यादा खतरा है और नीम के पेड़ को जानवर और आदमियों से समान खतरा है ।   कुछ स्वास्थ के प्रति जागरूक मूर्ख  इंसान नीम की नर्म और छोटी कोपलों को तोड़ कर वैध्यजी या बाबा जी  की सलाह पर उन पत्तियों का सेवन करने के लिए  दो-तीन फुट लंबे पेड़ से उन नन्ही  कोपलों को तोड़ने मे कोई संकोंच नही करते जिन्हे अभी तोड़ना पेड़ की हत्या करने के बराबर हैं।  हमने ऐसे दरिंदों को देखा है जो नीम की दातौन तोड़ने के लिये नीम के छोटे -छोटे पेड़ों की मुख्य शाखा को तोड़ कर दातुन की तरह इस्तेमाल करते हुए अपनी भद्दी सूरत लेकर मॉर्निंग वॉक करते हुए दातौन से दाँत साफ करते।  इनका बल और पौरुष बड़े-बड़े वृक्षों से दातुन तोड़ने मे या नर्म कोपलों को तोड़ने मे जबाब दे जाता है क्योंकि उन की टहनियाँ उनकी पहुँच से दूर होती है।
हम लोगो द्वारा लगाये गये वेल पत्री के पेड़ को छोड़कर लगाये गये अन्य पेड़ आज पूर्ण वृक्ष बन गए है जिनकी संख्या लगभग 20-22 से ऊपर होगी।  पर वेल पत्री का पेड़ इन मानव रूपी दानवों से आज भी संघर्ष कर रहा है। वेल पत्री का पेड़ आज भी अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहा है। आज लगभग 18 साल बाद भी उस वेल पत्री का पेड़ के साथ हर साल सावन के महीने मे तथाकथित कुछ शिव भक्त,  साधारण तयः हर दिन और विशेष तयः सोमवार को,  समूहिक चीरहरण करते है। मुझे याद है जब उक्त वेल पत्री के पेड़ को रोपे हुए लगभग एक साल भी नही हुआ था हमे इन्सानो से उसे बचाने मे काफी संघर्ष करना पड़ा था। एक बार एक उम्रदराज महिला ने उसकी पहुँच के अंदर करीब 100 से ज्यादा  पत्तियाँ तोड़ ली जब मैंने देखा तो उनसे कहा माताजी पौधे को बड़ा तो हो जाने दीजिये सभी आप की तरह इतनी पत्तियाँ तोड़ लेगा तो पेड़ मर ही जायेगा? उन्होने कहा कि भगवान को चढ़ाने के लिये वेल पत्री ली है। हमने कहा चढ़ना है तो 2-4 पत्तियाँ चढ़ा ले लेकिन  108 पत्तियों को इस तरह तोड़ने से तो पेड़ कभी बड़ा ही नही होगा। इतना सुनते ही क्रोध मे उन्होने हमे अधार्मिक बताकर  सारी पत्तियाँ हमारे घर के दरवाजे पर फैंक दी और मुझे बहुत बुरा-भला कह कर कोसते हुए   चली गई। एक सज्जन बड़े धार्मिक भाव का प्रदर्शन करते हुए वेल पत्री तोड़ने लगे जब मैंने उन्हे टोका तो पूजा मे भगवान का वास्ता देकर अपने आपको सही ठहराने का प्रयास करने लगे।    मुझे मजबूरी बश उन्हे कहना पड़ा कि बाजार मे कुछ पैसे खर्च कर वेल पत्री लेलें मुफ्त मे पुण्य क्यों कमाना चाहते है बैसे भी पेड़ अभी पूर्णतयः बड़ा नही है? हमे उनके कोप का भाजन बनना पड़ा। पार्क मे हमलोगो ने एक छोटा शिव मंदिर बनाया हुआ है अतः कुछ लोगो से हमे कहना पड़ा कि ये वेल पत्री सिर्फ यहाँ इसी  मंदिर मे चढ़ाने के लिये ही है कही और भगवान या मंदिर के लिये नही।
आये दिन होने बाली इस कलह से मैं काफी व्यथित होने लगा। कुछ लोगो ने तो पेड़ काटने की धमकियाँ भी दी। हमे कई बार वेल पत्री के पेड़ के लगाने के निर्णय पर बड़ा  पछतावा भी होने लगा। इन सभी घटनाओं से दुखी होकर और स्थानीय लोगो के व्यवहार के कारण आज इस लेख के माध्यम से मैं  एक प्रयश्चित 18 सालों बाद कर रहा हूँ कि मैंने घर के सामने उस मैदान  पर रोपे अन्य पेड़ों के साथ लगाये उस एक  कठहल रूपी पेड़ की भ्रूण हत्या की।   यध्यापि कठहल का वह  पेड़ एक साल मे  बहुत ज्यादा बड़ा नही हुआ था पर  मुझे पूर्ण विश्वास था कि मैं कठहल के उस पेड़ को  भी अन्य पेड़ों के साथ बड़ा कर लूँगा। परन्तू लोगो के  ऐसे  व्यवहार ने हमे चिंतित कर दिया  कि पेड़ के बड़े होने पर उस पर आने बाले "फल" झगड़ो का कारण बनेगे हमने बहुत ही कठोर निर्णय लेते हुए उस पेड़ को एक दिन बड़े बे मन से उखाड़ दिया, लेकिन वेल पत्री के पेड़ के साथ लगभग 18 साल बाद भी  हो रहे व्यवहार को देख कर हमे लगता है कि हमारा निर्णय कड़वा जरूर था पर ठीक था।    यध्यापि मैं भी बड़ा धार्मिक हूँ जब तक 10 वर्ष मैं  ग्वालियर प्रवास पर  रहा,  मंदिर को प्रातः सबसे पहले झाड़ू लगा कर साफ करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा  रहा,  पर आज तक मैंने इसी कारण मैदान मे बने शिव मंदिर मे वेल पत्री नही चढ़ाई कि पूर्ण वृक्ष बन जाने पर ही वेल पत्री और  वेल का फल  चढ़ाऊँगा। इसी उधेड़ बुन मे मैं ऐसा उपाय खोजने लगा ताकि तथाकथित शिव भक्त इस वेल पत्री के पेड़ से घ्रणा करने लगे और और पेड़ पर की जा रही हिंसा के बगैर पेड़  बड़ा हो जाए।
इसी क्रम मे मैंने पेड़ की पत्तियों पर गोवर-मिट्टी का कीचड़ को घोल बना कर छिड़क दिया किन्तु भक्तगढ़  उसे धोकर घर ले जाते और पुण्य लाभ कर ईहलोक और परलोक का सुधार करते । मैंने एक छोटा लकड़ी का  साँप जो बाजार मे बिक रहा था उसको पेड़ पर लटकाया पर चोरी पकड़ी गई और वह साँप भी कोई वेल पत्री के साथ ले गया। मैं लगातार प्रयास करता रहा, मैंने पेड़ पर पुराने जूते-चप्पल और पुराने  गंदे कपड़े पेड़ पर लटकाये पर उसका भी कोई बहुत ज्यादा असर नही पड़ा। पेड़ के नीचे काँटों के झाड़ डाले ताकि लोग पेड़ के पास तक  न पहुँच सके पर लोगो ने झाड़ो को किनारे कर वेल-पत्री तक पाहुचने का  रास्ता बना लिया। एक आखरी प्रयास के रूप मे मैंने जो घिनोना प्रयास किया उसे करने मे हमे खुद भी खराब लग रहा था किन्तु मजबूरी थी इसे भी आज़माना था क्योंकि हमारे सारे प्रयास वेल-पत्री के पेड़ को बचाने मे असफल रहे थे। चूंकि ये उस देश मे एक वृक्ष के अस्तित्व की लड़ाई थी जिसमे हम वनो, वृक्षों को देवता मानते है पर कुछ न समझ,  मूढ   लोग हमारी सांस्कृति और सभ्यता पर कुठराघात करते है।
 इस प्रयास के अंतर्गत हमने महिलाओं द्वारा उपयोग किये जाने बाले एक नए सेनेट्री नेपकिन  पैड को लाल मिट्टी से रंग कर उसमे शक्कर छिड़क कर उस वेल पत्री के पेड़ पर टांग दिया जिसका तत्काल प्रभाव देखने को मिला। पेड़ पर टंगे लाल रंग के पैड पर जिसपर अनेकों मखियाँ भिन-भिना रही थी, मैंने देखा जो व्यक्ति/महिलायें वेल पत्री के पेड़ से वेल पत्री तोड़ने आये और वे रुमाल  से नाक ढक कर उल्टे पाव बापस लौट गए और इस घिनोनी हरकत करने बाले को तमाम लानत मलानत करते रहे, मैं स्वयं मन ही मन खुश होकर उन की हाँ मे हाँ मिलकर ऐसी हरकत करने बाले व्यक्ति को कोसता रहा।   उस गंदे पैड को देख कर उनके चेहरे पर घ्रणा के भाव स्पष्ट देखे जा सकते थे। किसी भी व्यक्ति ने उस पैड को पेड़ से हटाने, छूने का तो दूर लकड़ी आदि से हटाने का प्रयास भी नही किया और न ही पैड की चर्चा आपस मे या किसी दीगर आदमी से की।  उक्त पैड महीनों पेड़ पर टंगा रहा और महीनों वेल-पत्री का पेड़ उन अदयालू लोगो के कहर से अपनी रक्षा कर सका। परन्तू 11 साल बाद मेरे ग्वालियर से भोपाल/नई दिल्ली  स्थानांतरण के बाद वो वेलपत्री का पेड़ पुनः  अपनी पुरानी स्थिति  मे है।  लोग आज भी उस निरीह द्रोपदी रूपी पेड़ की पत्तियाँ टहनियों को  तोड़ कर उसका चीर हरण कर रहे है  और वह वेल पत्री का पेड़  अपने बजूद की लड़ाई लड़ कर अपने  अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहा है!!    


विजय सहगल

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