“गरुण रथ मंदिर, (विट्ठल मंदिर), हम्पी (कर्नाटक)”
“गरुण रथ मंदिर,
हम्पी (कर्नाटक)”
10 सितम्बर
2026 को मुझे हम्पी जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हम्पी कर्नाटक राज्य के
विजय नगर जिले में तुंगभद्रा नदी के किनारे वसा एक एतिहासिक कस्बा है जो देवराय
द्वितीय (1422-46 ई.) द्वारा अपने विजय
नगर शैली के बनवाये कलात्मक मंदिर और अपने
पुराने वैभव और संस्कृति को समेटे एक समृद्ध शाली शहर है। राजा कृष्णदेव राय (सं 1509-29)
ने अपने शासन काल में इन मंदिरों में बड़े महत्वपूर्ण परिवर्तन करायें थे। इन
मंदिरों की इसी एश्वर्य और भव्य धरोहर के चलते संयुक्त राष्ट्र द्वारा इसे विश्व
धरोहर के रूप दर्जा दिया गया हैं। यूं तो हम्पी को भगवान राम के त्रेता युग से
जुड़े प्रसंग में भगवान हनुमान के किष्किन्धा पर्वत से भी याद किया जाता है। यहीं
पर मारुति नंदन हनुमान की जन्मस्थली भी है। माता शबरी से जुड़े प्रसंग पंपा सरोवर भी इसी
क्षेत्र में है जहाँ भगवान श्रीराम ने माता शबरी के आश्रम में आथित्य स्वीकार कर
प्रेम से पगे जूठे बेर ग्रहण किये थे। 14वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य की
राजधानी हुआ करता था और हम्पी का वैभव लगभग 40-50 किमी क्षेत्र में फैला है।
निर्विवाद रूप से हम्पी में फैले पुरातत्व कालीन अवशेषों में गरुण भगवान को
समर्पित रथ मंदिर जो विजय विट्ठल मंदिर का हिस्सा है अपने वैभव, समृद्ध विरासत, भव्यता और उसकी चमक सभी
स्थलों से सर्वोपरि है। यही कारण है कि पुरातत्व विभाग ने इस स्थल तक पहुँचने के
लिए वाहन स्थल और बाजार से दूर एकांत में रक्खा है जहाँ पहुँचने के लिए इलेक्ट्रिक
वाहनों की शासन द्वारा व्यवस्था की गई है ताकि हर तरह की गंदगी और प्रदूषण से इस
विश्वधरोहर स्थल को बदूर रख कर बचाया जा सके।
बैसे तो हम्पी
ट्रेन मार्ग से कर्नाटक राज्य के होसपेट रेल स्टेशन से 13 किमी दूर है और बेंगलुरू
से लगभग 350 किमी दूर है लेकिन इस छोटे ग्रामीण कस्बे में रुकने के लिए राज्य सरकार के पर्यटन विभाग के होटल के साथ
अन्य छोटे बड़े होटल भी है और दक्षिण भारतीय खाने की सुविधा ऊपलब्ध है लेकिन होसपेट
एक बड़ा शहर होने के कारण बहुत से लोग होसपेट में रुकना पसंद करते हैं लेकिन अपने
चारपाहिया वाहन से यात्रा के कारण स्थानीय आवागमन की सुविधा की दृष्टि से भी मैंने
हम्पी में ही रुकने को प्राथमिकता दी थी। बैट्री कार से लगभग एक किमी की यात्रा के
बाद जब हम विट्ठल मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचे तो ऊंची ऊंची दीवारों से घिरे
विट्ठल मंदिर की भव्यता और वैभव के दर्शन नहीं होते लेकिन जैसे ही प्रवेश द्वार के
माध्यम से मंदिर प्रांगण में प्रवेश किया तो विजय नगर साम्राज्य की समृद्धशाली
स्थापत्य के दर्शन हुए। पूरा मंदिर एक ओर जहाँ भगवान विष्णु के विट्ठल रूप को
समर्पित है और वहीं भगवान गरुण के रूप में स्थापित पत्थरों की बारीक नक्काशी से
बने रथ की भव्यता देखते ही बनती है। चार गोल पत्थरों से बने नक्काशी दार पहियों से
निर्मित रथ की भव्यता और उसके मध्य में बने छिद्र में लगी धुरी पर भी बारीक
कलात्मक बेलबूटे ऐसे लगते है मानों लकड़ी का धुरा चारों पहियों को मजबूती से एक
दूसरे को जोड़कर रक्खे हों। इन पहियों के
धुरों पर बने रथ का चौकोर नक्काशी दार चबूतरा जगन्नाथ पुरी के रथ के विशालाकार की
याद दिला रहा था। ऐसा कहा जाता है कि राजा कृष्णदेव राय ने, उड़ीसा में युद्ध के
दौरान कोणार्क के सूर्य मंदिर के रथ से प्रेरित होकर इस गरुण मंदिर रथ का निर्माण कराया था। चबूतरे पर पाषाण स्तंभों
का आलंबन लिए बना मंदिर अति सुन्दर प्रतीत लग रहा था। मंदिर के आगे पीछे बने द्वार
और दायें बाएं दो छोटी खिड़कियां मंदिर की भव्यता में चार चाँद लगा रही थी। चबूतरे
पर देव, किन्नर और यक्ष की प्रतिमाओं को बनाया गया है साथ ही एक जगह सिंह गर्जना
करते सिंह की प्रतिमा भी उकेरी गई है। रथ के आगे बने दो हाथी बने थे मानों एरावत
के आदेश मिलते ही रथ को खींच कर आगे बढ़ने को आतुर हों। पूरा रथ एकदम जीवंत मुद्रा में
चलने के लिए तैयार प्रतीत लग रहा था। इस रथ के रेखा चित्र को भारतीय मुद्रा के 50 रुपये के नोट
पर भी उकेरा गया है। इस रथ को एकटक देखते रहने की लालसा को मै बहुत देर तक पूरी
करता रहा। एक पल के लिए भी निगाहें हटाने
का मन नहीं कर रहा था। इसक गरुड़ मंदिर की तस्वीरों को लेने की दीवानगी पागल करने
जैसी हो रही थी। हर पल को कैद करने का जुनून रथ के चारों ओर घूम कर देखने को मजबूर
कर रहा था। मन भरकर देखने और फोटो लेने के बाद फिर अन्य भवनों, मंडपों को देखने के
लिए आगे बढ़।
रथ के पीछे एवं बाएं
तथा दायें भी विशाल मंडप बने थे। जिन पर अलग अलग नक्काशी और अद्भुत विशेषता लिए
हूएं थे जिनका विवरण आगले अंक में प्रस्तुत करेंगे।
विजय सहगल






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