हे! त्रेता के राम! सुनो
कष्ट कठिन, अविराम,सुनो
दशमुख फिर से आन खड़ा.
संकट में फिर जनकसुता
पहले थे दस शीश,
भुजाएं बीस,
नाभि में अमृत थोड़ा था
वरदान मृत्यु का तोड़ा था
वेद ऋचा फिर से गूंजे
ऐसा कुछ वरदान बुनो
हे! त्रेता के राम! सुनो!!
कलियुग के ये सिर विहीन
लंकेश हुआ है आत्म हीन
देश का करते मर्दन मान
तौहीन देश की, समझें शान
मन-वाणी, विष से सराबोर!!
सत्ता पाने का निषिद्ध शोर
आँखों में इनकी कौंध रहा.
प्रजातंत्र को रौंद रहा
राम दूत हनुमान गुनो
हे! त्रेता के राम! सुनो!!
त्रेता रण की जो ठगनी थी
जड़ मूल, दशानन भगिनी थी
लक्ष्मण रेखा, फिर टूटी है
फिर शूर्पनखा जो रूठी है
राम अनुज तुम से है आस
इस दुष्टा का करो विनाश
मातृभूमि गुण गान चुनो
हे! त्रेता के राम! सुनो!!
फिर आज, बिछी शकुनि बिसात
गोरे राजा की शह औ मात
द्रोणा चुप, पितामह मौन
दुष्ट दु:शासन, बोले कौन
हाथी, घोड़े और ऊंट पिटे
पैदल, कदम दर कदम मिटे
धृतराष्ट्र राजा थे तब थे,
अभी राज गांधारी है
लोक लाज सब पीछे छूटी
पुत्र मोह, की मारी है
हे! राधा के श्याम सुनो!
हे! त्रेता के राम! सुनो!!
विजय सहगल
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