"मुचकुंड
- धौलपुर"
ग्वालियर से दिल्ली जाते आते समय धौलपुर से
सैकड़ो बार निकलना हुआ पर भ्रमण करना नहीं हो पाया। लेकिन
11 अगस्त को गुड़गाँव की यात्रा के दौरान मैंने धौलपुर भ्रमण का कार्यक्रम बना ही
लिया। धौलपुर, राजस्थान का एक मध्यम श्रेणी का एतिहासिक शहर है जो श्रीनगर-कन्याकुमारी
के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 44 पर, उत्तर प्रदेश और
मध्य प्रदेश के बीच मे, चंबल नदी के दक्षिण किनारे पर वसा
है। धौलपुर मे इस पर्यटन और धार्मिक स्थल मुचकुंड के अलावा,
चंबल नदी के बीहड़ों से घिरा शेरगढ़ फोर्ट, शाही बावड़ी, चंबल सफारी, गुरुद्वारा शेर शिकार साहिब, निहार टावर या घंटाघर, वन बिहार सेंचुरी और धौलपुर पैलेस और लाइब्ररी की इमारत भी देखने
लायक है। मुख्य पर्यटन स्थल घूमने के लिए 2-3 घंटे का समय मान कर मैंने धौलपुर नगर
की सीमा के शुरू होते ही अपनी कार को राष्ट्रीय
राजमार्ग क्रमांक 44 को छोड़ कर बायीं ओर मुचकुंड की ओर मोड़ दिया। राज मार्ग से
मुश्किल से 2-3 किमी की दूर पर मुचकुंड तक कुछ अच्छा कुछ,
कच्चा मार्ग तय कर मै मुचकुंड पहुँच गया। जब तक कुंड के सामने नहीं पहुँच गये, तब तक बाहर से मुचकुंड की
दिव्यता और भव्यता का आभास नहीं हुआ। लेकिन जब प्रवेश द्वार के अंदर प्रवेश किया
तो विशाल जल राशि से परिपूर्ण मुचकुंड का वैभव और गौरव देखते ही बनता था।
प्राकृतिक
और धार्मिक दृष्टि से मुचकुंड के बारे मे एक दिलचस्व पौराणिक कथा है, जिसके
कारण भगवान श्री कृष्ण को युद्ध भूमि से युद्ध छोड़ कर भागना पड़ा और इस तरह भगवान
श्री कृष्ण का नाम "रणछोड़" पड़ा।
किवदंती है कि भगवान श्री राम की 24वीं पीढ़ी के वंशज राजा मुचकुंड ने हजारों
वर्ष पूर्व इस स्थान पर साधू-संतों की रक्षार्थ अपनी सेवाएँ दी थी। थक जाने पर वे
पास की पहाड़ी पर स्थित एक गुफा मे सो गए। तब देवताओं ने उन्हे वरदान दिया कि जो भी
राजा की नींद मे विघ्न डालेगा, वो तत्काल ही भस्म हो जाएगा। कालांतर मे भगवान शिव से अजेय और किसी भी
अस्त्र-शस्त्र से न मारे जाने का आशीर्वाद और वरदान प्राप्त,
राजा काल यवन (काली यवन), श्री कृष्ण अपनी पूर्व नियोजित
रणनीति के तहत एक युद्ध से भाग कर इस गुफा मे पहुंचे। काली यवन, श्री कृष्ण को कायर समझ उनके पीछे पीछे इस गुफा मे पहुंचा। कृष्ण ने अपना
पीताम्बर (पीला वस्त्र) राजा मुचकुंड को ऊपर डाल कर गुफा के अंधेरे मे छुप गए। काल
यवन ने राजा मुचकुंड को श्री कृष्ण समझ अहंकार से राजा को लात मारी। जैसे ही राजा
मुचकुंड की नींद मे विघ्न पड़ा, राजा मुचकुंड को देवताओं से
मिले वरदान ने उनकी आँखों की क्रोधाग्नि ने
काली यवन को भस्म कर दिया। इस तरह श्री
कृष्ण ने म्लेछ राजा काली यवन का अंत बिना अस्त्र शस्त्र के करवाया और स्वयं युद्ध
से पलायन करने के कारण "रणछोड़"
कहलाए। इस प्रकार यह यज कुंड एक प्रमुख तीर्थ मुचकुंड कहलाया। भगवान श्री
कृष्ण से जुड़े पौराणिक प्रसंग के कारण इस कुंड का बहुत ज्यादा महत्व है। ऐसा कहा
जाता है कि इस कुंड मे स्नान करने से 68 कुंडों के स्नान का फल प्राप्त होता है।
इस मुचकुंड को तीरथों का भांजा भी कहते हैं।
प्रवेश
द्वार से पूर्व लाल पत्थर की सपाट ऊंची दीवार पर बने खूबसूरत अर्धगोलकर झरोखे ने
मन मोह लिया। साधारण से बने दोमंजिला लाल पत्थरों के भवन जिसमे कोई भी खिड़की या
दरवाजे नहीं दिखे तो लगा कि ये इस स्थल का बाहरी भाग होगा और अंदर कुंड के घाट पर
पहुँचने पर मेरा अनुमान सच निकला क्योंकि ये राजशाही के काल के बने मंदिरों के भवन
थे जिन्हे घाट की ओर के मुख्य प्रवेश द्वारों पर शानदार वास्तु, सुंदर
नक्काशी से बनाया गया था। इस कुंड की एक विशेषता है कि इस के चारों ओर 108 प्राचीन
मंदिरों की श्रंखला से बनाया गया है। सभी मंदिर अति प्राचीन और राजस्थानी वास्तु
कला से परिपूर्ण राजशाही का अनुभव करा रहे
थे। प्रवेश द्वार के समीप ही भगवान शिव, भगवान कृष्ण और
भगवान जगन्नाथ के मंदिर भी प्राचीन मंदिर और उसके पूर्व बने विशाल आँगन तथा उस के
बीच मे बने तुलसी चौबारे हमारी सनातन परंपरा के गवाह थे जहां एक स्वाबलम्बी और
आदर्श परिवार की कल्पना को साकार रूप दिया गया था। हर मंदिर मे प्रातः आरती और
प्रसाद का भोग भगवान को समर्पित कर, नित्य कर्म के बाद
पुरोहित विधिविधान मे उपयोग लाये वर्तनों की साफ सफाई करते नज़र आए। हर मंदिर का
वास्तु राजमहलों की तरह था। मंदिर की हर देहरी पर अर्धवलयाकार कोणों, उनपर उकेरी सुंदर आयताकार, वर्ग और गोलर्धों की
सुंदर ज्योमिति चित्रों, से उकेरा गया था। हर मंदिर की देहरी
नक्काशी दार पत्थरों के स्तम्भ पर टिकी
थी। मंदिर के बाहर बने लंबे-चौड़े पक्के लाल पत्थरों के घाट के कुछ दूरी पर पानी के
6-8 वोटों मे बड़े बड़े बिजली के लैम्प और तेज रोशनी के मास्क रक्खे तो जो शायद
रात्रि के समय घाटों को प्रकाशित करने या लाइट एवं ध्वनि कार्यक्रमों मे उपयोग मे
लाई जाती होंगे। प्रवेश द्वार के दाहिनी तरफ दो मंज़िला एक सुंदर भवन दिखलाई दिया
जिसमे बनी अर्धगोलाकार दल्लानों को बारीक
नक्काशीदार पत्थरों की जाली से सजाया गया था। तालाब के बीच बने एक छोटे से टापू पर
सफ़ेद बगुले और काली बतखों को आराम से धूप मे बैठे देखना सुकून दायक दृश्य था। मुच कुंड के चारों ओर राजस्थानी लाल पत्थर से
बने पक्के घाटों की छटा देखते ही बनती है। जब शांत कुंड के जल मे घाटों की परछाई
दिखाई देती है तो कुंड की सुंदरता मे चार चाँद लग जाते हैं। मुच कुंड के समीप ही ऐतिहासिक
गुरद्वारा शेरशिकार साहिब है यहाँ गुरु हरगोविंद सिंह जी ने एक खूखार शेर का शिकार
कर ग्रामीणों को कष्टों से मुक्ति दिलाई थी।
लगभग
एक किमी॰ लंबी परधि वाले इस कुंड को पैदल ही घूमने की प्रबल इच्छा तो थी लेकिन कुछ
सूर्य प्रकाश से निकलती ऊष्मा और समयाभाव के कारण यह इच्छा पूर्ण न हो सकी। लेकिन
सूर्योदय के पूर्व यदि इस कुंड की परिक्रमा लगाई जाय तो निश्चित ही अद्भुत अनुभव
प्राप्त होगा यही अभिलाषा मन मे लिए हम अगले पढ़ाव की ओर बढ़ लिए। अपने सीमित समय मे
मुच कुंड के बाद हम राज पैलेस गये चूंकि इस इमारत या महल को अब हैरिटेज होटल मे
बदल दिया गया है इसलिए सामान्य लोगों के लिए इस को देख पाना निषेध था। हम उसके और
आगे घंटाघर को देखने गये जो एक साधारण इमारत थी लेकिन कभी इसका अपना वैभव चरम पर
रहा होगा। कुछ और आगे ही एक सुंदर लेकिन छोटा महल नुमा भवन जो वर्तमान मे
पुस्तकालय है, देखी कुछ चित्रों और फोटोग्राफी के बाद बापस राज मार्ग क्रमांक 44 पर आकर गुड़गाँव की ओर प्रस्थान कर गये।
विजय
सहगल










