रविवार, 31 अक्टूबर 2021

तुरतुक गाँव (लद्धाख)

 

"तुरतुक गाँव (लद्धाख)"







19 सितम्बर 2021 को हमारे ग्रुप के कार्यक्रम भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित गाँव थाँग एवं  तुरतुक को  देखने का था। हमारे टेम्पो ट्रेक्स के सारथी श्री पुंचुक थे जो 17 तारीख को हम लोगो के लेह पहुँचने के साथ ही हमारे गाइड एवं मार्ग दर्शक थे।

19 सितम्बर की सुबह थी, सुबह नींद जल्दी खुल गयी सोचा प्रातः भ्रमण के साथ बाहर गाँव की रूपरेखा देखी जाये साथ मे कहीं किसी खोमचे पर चाय आदि का रसास्वादन भी कर लेंगे।   प्रातः सुबह 5.30 बजे जब मै भ्रमण के लिए हंडर गाँव स्थित नुब्रा घाटी मे निकला तो ठंड तो इतनी विशेष नहीं थी पर गाँव की सड़कों मे वाहनों की इक्का दुक्का आवाजही के अतरिक्त कोई मनुष्य नज़र नहीं आया। मै दिल्ली या अन्य मैदानी क्षेत्रों की तरह चाय की तलाश मे किसी खोमचे या ठेले की तलाश कर रहा था पर कुछ परिंदों की आवाज के सिवा नीरव शांति छाई हुई थी। सुनसान गलियों मे उद्देश्यहीन विचरण करते हुए मुझे ऊंचे ऊंचे पहाड़ो की चोटियों पर सूरज की किरणे पर्वतों को स्वर्ण स्नान कराती नज़र आयी। हमने एक घर के सामने एक त्रिकोणीय लकड़ी मे गेरुई रंग मे रंगी  गोलाकार पत्थर को रक्खे देखा और नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ गया। आगे फिर इसी तरह की आकृति को देख मै ने बापस आकार उस घर के बाहर की तस्वीर  मोबाइल से निकाली। मुझे लगा मध्य भारत की तरह ही शायद यहाँ भी नीबू-मिर्ची की तरह कोई टोटका होता होगा पर जबाब देने के लिए घरों के बाहर कोई दिखा नहीं। शायद हमारे  सुधि पाठक इसका कोई सार्थक उत्तर खोजेने मे हमारी  मदद करेंगे?

नुब्रा घाटी मे प्रातः भ्रमण के दौरान मैंने एक और  खूबी देखी, पहाड़ों का साफ पानी छोटी-छोटी नहरों की तरह  पूरे गाँव मे  घरों के बाहर मे बह रहा था। ऐसा प्रतीत होता है मानों यहाँ की म्यूनिसिपल बोर्ड या पंचायत ने मैदानी इलाके मे नल से जल पहुँचने की तरह पूरे गाँव मे नहरों का जाल बिच्छा लोगो के घरों मे पानी पहुंचाने की व्यवस्था कर दी हो।  इस जल को ही लोग निस्तार के लिए छोटी छोटी कैपलरी के माध्यम से पानी को एकत्रित कर इस्तेमाल करते हों? पूरे गाँव मे होम स्टे, गेस्ट हाउस मे उपस्थित दो पहिये और चार पहिये वाहनों की संख्या दर्शा रही थी कि पर्यटकों की अच्छी ख़ासी संख्या उस दिन हंडर गाँव मे थी। लेकिन प्रातः छह बजे, गाँव का निस्तब्ध मौन बता रहा था कि पर्यटक गहरी थकान के बाद चैन की नींद ले रहे थे  ताकि पाकिस्तान की सीमा से लगे "थाँग" एवं "तुरतुक" गाँव के भ्रमण के लिये आज ऊर्जा एकत्रित की जा सके।

भ्रमण के दौरान चाय के लिए खोमचे के खोजने के असफल प्रयास के बाद   मै भी चाय के बिना हंडर गाँव  स्थित  अपने गेस्ट हाउस मे आ गया। ऐसा प्रतीत होता है कि गाँव की आर्थिक समृद्धि ग्रामवासियों को सुबह चाय बनाने जैसे  श्रम साध्य कार्य करने की इजाजत न देती हो। हम भी   नुब्रा घाटी के आखिरी गाँव "तुरतुक" के भ्रमण हेतु स्नान ध्यान करने के लिए अपने टेंट मे आ गये।              

आज का दिन बड़ा थका देने वाला होना था। हंडर से "थाँग" एवं "तुरतुक"  गाँव एवं बापसी कुल लगभग 340 किमी॰ की यात्रा टेम्पो ट्रेक्स जो होने वाली थी। सभी लोग कुछ अलसाये से उठ आठ बजे तक तैयार होकर होटल के रेस्टुरेंट मे नाश्ते के लिए एकत्रित हो चुके थे। महाराष्ट्र के मुंबई और पुणे के भी कुछ पर्यटकों से अभिवादन पश्चात संक्षिप्त परिचाय हुआ। नाश्ता उत्तर भारतीय परंपरा के अनुसार छोले पूड़ी, पोहा, आमलेट आदि स्वल्पाहार का मिश्रण था जो सभी को प्रिय लगा। लगभग साढ़े-आठ बजे हम लोगो ने तुरतुक गाँव की यात्रा के लिए प्रस्थान किया। गाँव मे ही कुछ सेव, केले एवं पानी का इंतजाम किया क्योंकि रास्ते मे बहुत अच्छी व्यवस्था नहीं मिलने के संकेत हमारे सारथी श्री पुंचुक ने पहले ही दे दिये था। पक्के रास्ते पर सरपट दौड़ती टेम्पो ट्रेक्स की गति सड़कों की दशा व्याँ कर रही थी। पक्की डम्मर रोड देख दिल बाग-बाग था कि देश के सीमावर्ती इलाकों मे इतना सुंदर और पक्का सड़क ढाँचा देश की प्रगति की कहानी कह रहा था। यध्यपि सीमा पर ढांचागत सड़कों के विकास को देख नाम लेने से बचने के बावजूद अपने को मोदी सरकार की तारीफ करने से न रोक सका। हंडर गाँव से बाहर निकलते ही मीलों दूर तक जगह जगह सैनिक छावनी और सीमा तक पहुँचने के साज़ों सामान को देख सेना और सैनिकों के प्रति नतमस्तक हो गया जो विपरीत परिस्थितियों मे हम देशवासियों को  चैन की नींद देने के लिए  अपनी रातों की नींद को कुर्बान कर रहे थे।       

दूर दूर उजड़े वीरान पहाड़ों के बींच कोलतार की डम्मर रोड ऐसी प्रतीत हो रही थी मानों रेगिस्तान के सीने को चीर कर बहती कोई काले पानी की जलधारा मजबूती के साथ बह रही हो।  रास्ते मे दूर दूर तक बीरने मे रेगिस्तान नज़र आ रहा था। पेड़-पौधों या हरी घास से रहित   ऊंची ऊंची चोटियों के बीच सड़क के साथ साथ कल कल बह रही श्योंक नदी रेगिस्तान मे अति सुंदर नखलिस्तान की तस्वीर पेश कर रही थी। सीमावर्ती गाँव थाँग से 4-5 किमी पहले सेना की चौकी पर आने वाले सभी वाहनों के कागज एवं यात्रियों की फोटो पहचान पत्र जाँचे गये और रजिस्टर मे प्रविष्टि के बाद आगे जाने दिया। थाँग गाँव से लगभग 1 किमी दूर भारत पाकिस्तान बार्डर  पर  देश को विभाजित करने वाली लोहे की काँटेदार दीवार भारत-पाक सीमा को स्पष्ट विभाजित करती दिखाई दे रही थी। भारत की तरफ तिरंगे झंडे के साथ लगातार पर्यटक की आवक जावक थी पर पाकिस्तान की तरफ से इस तरह के कोई निशान दिखाई नहीं दिये। थाँग गाँव के उसी स्थान पर कुछ स्वल्पाहार ग्रहण कर बापस हम लोग तुरतुक गाँव आये।  गाँव की तलहटी मे श्योंक नदी का पानी पत्थरों से टकरा कर बहुत ही सुंदर दृश्य पेश कर रहा था। तलहटी के उपर गाँव वसा हुआ था। छोटे-छोटे बच्चे पर्यटकों से आइस क्रीम की चाह मे पर्यटकों के आगे पीछे घूम रहे थे। घनी बसाहट के वीच गाँव मे पर्यटकों के भोजन और आहार हेतु एक रेस्टोरेन्ट भी अपनी सेवाएँ दे रहा था। जहां हमारे ग्रुप सदस्यों ने भोजन ग्रहण किया। गाँव मे पर्यटकों के आकर्षण का कोई स्थान आदि तुरतुक मे नहीं दिखाई दिया। पर तलहटी मे नदी की बहती धाराएँ बहुत ही मनोहारी चित्र प्रस्तुत कर रही थी।  

इसी  थाँग एवं तुरतुक गाँव को 1947 मे जिस पाकिस्तान ने धोखा  देकर अपने साथ मिला लिया था उसी तुरतुक ग्राम को सन 1971 के भारत पाक युद्ध मे हमारे देश की सेनाओं ने लेह स्काउट के साथ मिलकर पुनः बापस अपने कब्जे मे ले लिया। बाल्टिस्तान के अधिकतर वाल्टी रहवासी इस गाँव के निवासी है। पूरी 160 किमी॰ लंबी सड़क के एक ओर जहां ऊंची पहाड़ की चोटियाँ है वही साथ साथ श्योंक नदी की तीव्र वेग से बहती साफ सुंदर जलधार है। लेह लद्धाख की जीवन रेखा श्योंक और नुब्रा नदियां लेह को  धन-धान्य से सींचती हुयी कालांतर मे अभिन्न भारत के पाकिस्तान  सूबे को समृद्ध करती है और स्पष्ट संदेश देती है कि बेशक 1947 मे हमारे राजनैतिक रहनुमाओं ने देश को खंडित कर विभाजित कर दिया है पर आज भी पाकिस्तान कब्जे वाले कश्मीर सहित पूरे पाकिस्तान को भारत का अभिन्न  अंग मान बहने वाली "श्योंक" और "नुब्रा" नदियों  की धाराएँ अधिकार सहित देश की अभिवाज्य धरा पर बहती है और जिस तरह हमारी बहादुर सेना और सुरक्षा बालों ने 1971 के युद्ध मे कश्मीर के इस तुरतुक गाँव को बापस पाकिस्तान  छीना था शीघ्र ही पूरे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को बापस ले लेंगी।   

हंडर गाँव, नुब्रा घाटी  की बापसी हेतु हम लोग चार बजे बापस आये। थक कर बुरा हाल था और उपर से हमारे टेम्पो ट्रेक्स के ड्राईवर पुंचुक ने बताया बस खराब है और आगे नहीं जा सकती। अब तो सभी की हालत खराब थी। पर पुंचुक ने अन्य साथी बस ड्राईवर से बात कर हम 12 लोगो को दो बसों मे समायोजित कराया तब जा कर एक-डेढ़ घंटे इंतज़ार के बाद हम लोगो को हंडर गाँव पहुंचते-पहुँचते रात के आठ बज चुके थे। रात्री भोजन आदि कर कल पेंगोंक झील जाने हेतु हम लोग अपने-अपने टेंट्स मे चले गये।

विजय सहगल