गुरुवार, 14 अक्टूबर 2021

एक विलुप्त-दशहरा

 

"एक विलुप्त-दशहरा"






यूं तो देश मे दशहरा अलग अलग रीति रिवाज से अलग अलग प्रान्तों मे मनाया जाता है। लेकिन बचपन से मैंने एक अलग ही तरह के दशहरे को देखा और लगातार अपने युवाकाल मे अनेकों वर्षों तक शामिल होने का सौभाग्य मिला है। ये अनूठी परंपरा समाज मे गरीब-अमीर से परे सबके लिए समान थी और बिना किसी आर्थिक आडंबर के समाज के सभी परिवारों की पहुँच मे थी।

ऐसे ही 1980-90 के दशक तक  झाँसी के खत्री समाज मे दशहरा मिलन समारोह प्रति वर्ष कुछ अलग ढंग से मनाया जाता रहा था। जिसकी प्रशंसा समाज के अन्य गणमान्य व्यक्ति भी करते थे। झाँसी शहर पुराने समय मे किले की चारदीवारी के अंदर ही वसा था। अधिकतर खत्री परिवार किले की परकोटा के अंदर ही कुछ मुख्य स्थानों  मे  छह-आठ-10  परिवार के समूह मे रहते थे। इन स्थानों  मे मानिक चौक, गंज, खत्रियाना, टंकी, पारेश्वर मुहल्ला मुख्य थे पर अन्य स्थानों  पर भी इक्का-दुक्का परिवार रहते थे।   इस तरह लगभग 70-80 परिवार जिनमे अधिकतर  व्यवसाय मे रत थे  तथा कुछ परिवार पेशे से वकील और डॉक्टर भी थे जो समाज एवं शहर  मे गणमान्य स्थान रखते थे।  यध्यपि मै जब  दस-ग्यारह साल की उम्र का था तब  शायद मै पहली बार समाज के दशहरा मिलन कार्यक्रम मे शामिल हुआ था। मै नहीं जानता ये दशहरे की परंपरा हमारे पूर्वजों ने कब शुरू की थी क्योंकि परंपरागत रूप से हम इसे अपने होश सम्हालने से देखते आये थे।  मेरे पापा बताया करते थे कि उन्हे भी नहीं मालूम कि इस अनूठे दशहरे की परंपरा कब से चल रही है। वे भी ऐसे ही अपने बड़ों का अनुसरण करते शामिल होते रहे थे। मेरा अनुमान है कि दशहरे की ये परंपरा निश्चित ही सौ वर्ष से भी ज्यादा पुरानी रही होगी।    

दशहरे के त्योहार को लोग बेशक अपने-अपने तरीके से भिन्न-भिन्न रीति रिवाजों से मनाते थे पर हर समारोह और कार्यक्रम मे "पान" आवश्यक रूप से शामिल रहता। झाँसी शहर मे स्थित खत्री समाज के हर घर से कम-से-कम एक व्यक्ति बड़ा बाज़ार स्थित गोपाल जी के मंदिर मे आवश्यक रूप से 7-8 बजे तक एकत्रित होते थे। उन दिनों समाज के कुछ बुजुर्ग स्व॰ श्री रामदास कंचन (जो मंत्री जी के नाम से विख्यात थे), नगर के बड़े व्ययसाई स्व॰ मोती लाल सहगल, स्व॰ देवेंद्र शिवानी, एडवोकेट, श्री राम रतन जी साहनी ( 94-95 वर्ष के एक मात्र जीवित समाज के गौरव) उन दिनों समाज के हर घर मे जाने की मार्ग नक्शा तैयार करते थे। मार्ग निर्धारण मे पहले उन घरों-परिवारों  मे जाने का कार्यक्रम तय किया जाता था जिनके यहाँ पिछले दशहरे से इस दशहरे की बीच कोई व्यक्ति दिवंगत हो गया हो। इस तरह गोपालजी के मंदिर से 60-70 लोगो का समूह जिसे आपसी बोलचाल मे सभी लोग "पंच" (पंच परमेश्वर) कहते, वह  पहले उन घरों मे पहुंचते जहां पिछले दशहरे से अब तक कोई दिवंगत होता था।  दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उस परिवार के यहाँ से दशहरे के प्रतीक पान का एक-एक  सादा पत्ता (बगैर मसाले या चूना कत्था के, जैसा चित्र मे दिखाया गया है) उपस्थित समाज के सभी पंचों द्वारा  ग्रहण किया जाता। समाज के मंत्री जी स्व॰ श्री राम दास जी  अपनी विशेष वक्तृत्व  शैली मे  उन सभी परिवारों को ढांढस बँधाते  जिनके प्रियजन पिछले एक साल के दौरान दिवंगत हुए थे। मै मंत्री जी की बोलने की उस शैली का बड़ा कायल था।

जब सभी दिवंगतों के घर जा, दिवंगतों को श्रद्धांजलि का कार्यक्रम हो जाता  तब क्रमशः समाज के जिस-जिस  सदस्य का घर रास्ते मे पड़ते, तो समाज के सभी  70-80 "पंचों" का समूह उनके घर पहुँच कर उस सदस्य को दशहरे की बधाई देता  एवं दशहरे के प्रतीक सादा पान के पत्ते  को ग्रहण करता। इस तरह शहर के सभी खत्री बंधुओं के घरों मे जा कर दशहरे की एक दूसरे को बधाई दी जाती। इस पूरे नगर भ्रमण मे लगभग 5-6  किमी॰ के परिक्रमा पथ पर  चलना तो हो  ही जाता था और इस मेल जोल एवं भ्रमण मे लगभग 2 से तीन घंटे तो लग ही जाते थे। जो बुजुर्ग चलने मे असमर्थ होते वह अपने-अपने घरों मे ही बैठ पंचों के आने का इंतज़ार करते। बापसी पर लोग पुनः गोपालजी के मंदिर मे एकत्रित होते जहां मंत्री जी उपस्थित युवा, बच्चों और बुजुर्गों का धन्यवाद ज्ञपित कर दशहरे त्योहार के कार्यक्रम के समाप्ती की घोषणा करते। ये ही क्रम हर बर्ष दोहराया जाता था। 1980-90 के दशक तक ये दशहेरा त्योहार झाँसी के खत्री समाज द्वारा अनवरत रूप से मनाया जाता रहा।  

इस दशहेरा पर्व को मनाने की पृष्ठभूमि मे बहु आयामी  संदेश समाज के बीच प्रसारित होता था। जो सबसे बड़ा संदेश इस दशहरा मिलन कार्यक्रम से जाता वह यह था कि हर  परिवार समाज मे सम्मान-स्वाभिमान और बराबरी महसूस करता था। हर छोटे-बड़े  परिवार के मन मे ये भावना रहती कि उनके सुख-दुःख मे समाज के सभी लोग सांझीदार है। एक मनोवैज्ञानिक भावना हर परिवार मे रहती कि समाज के सभी लोग एक-जुट हो बराबर है। दूसरा संदेश भी बड़ा स्पष्ट था कि दशहरे का प्रतीक पान का सादा पत्ता ही लेने-देने का रिवाज था, क्योंकि पान के पत्ते मे चूना-कत्था या मसाले लगे पान 60-70 लोगो  की संख्या मे हर घर मे  खाना खिलना असंभव भी था और खर्चीला भी। उन दिनों 1-2 रुपए मे एक सैकड़े सादे पान आसानी से उपलब्ध हो जाते थे। इस तरह गरीब-अमीर पर आर्थिक बोझे को नगण्य करने के लिए ही शायद इस तरह सादा पान के पत्ते को  आदान-प्रदान का चलन  हमारे पूर्वजों ने बड़े सोच समझ कर रक्खा हो?

समाज के सभी घरों मे पैदल भ्रमण जहां एक ओर तो नयी और पुरानी पीढ़ी का आपस मे नाम और शक्ल-सूरत से परिचय भी करा देता था तथा समाज के सदस्यों के घरों की भौगोलिक स्थिति से भी अवगत करा देता था ताकि लोग किसी भी  सदस्य के सुख-संताप मे तुरंत ही उसके  घर पहुँच सके। चाय-पान, फल-फूल भेंट जैसी औपचारिकता एवं आडंबर को इस प्रथा से दूर रक्खा गया ताकि कम समय मे सभी के घर पहुँचने के लक्ष्य को पाया जा सके। 

घरों के बुजुर्ग और असक्त महिलाए, बच्चे और अन्य सदस्य घर के बाहर देर रात तक जाग कर, घरो के बाहर प्रकाश की व्यवस्था करते, चबूतरों पर चादर बिछा और रंगोली बना "पंचों" के स्वागत  हेतु  उनका इंतजार करते  ताकि साल के इस पावन त्योहार मे सभी एक दूसरे का यथोचित सम्मान, अभिवादन, चरण वंदन  कर मिल-जुल कर एक दूसरे का कुशल क्षेम पूंछ और जान सके। प्रतीक्षा के दौरान दीगर समाज और अड़ौस-पड़ौस के अन्य शुभचिंतक और मित्र गण भी घरों के बाहर बैठे लोगो को दशहरे का स्नेह वंदन कर एक दूसरे को बधाई देते। इस तरह समाज का दशहरा-मिलन कार्यक्रम एक सच्ची-भावना से  एक घर के प्रत्येक  सदस्य का  परिचय समाज के सभी घरों और उनके सदस्यों से परिचय  करा देता  था जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाये कम थी। बेशक अपनी नौकरी या पेशेगत व्यस्तता के चलते लोग साल भर न मिल पाते हों पर दशहरे पर वे आपस मे अवश्य मिल लेते थे।            

उन दिनों सही मायने मे दशहरा त्योहार  खत्री झाँसी मे वास्तविक समाजवाद का प्रतीक था। परंतु शहर के विस्तार और स्थानीय परिवारों के आवासीय परिगमन के कारण,  समाज के आत्मकेंद्रित और संकुचित दृष्टिकोण के कारण एवं तथाकथित विकास,  समय के बदलाब, आपसी भाई चारे एवं समयाभाव ने वर्षों से प्रचलित उक्त दशहरा मिलन की प्रथा को खत्री समाज के लोग जारी न रख सके। समय के साथ आवश्यक संशोधनों को भी स्वीकार न किया जा सका  और इस तरह दशकों से जारी एक अच्छी सामाजिक  दशहेरा मिलन प्रथा झाँसी-खत्री समाज  से सदा-सदा के लिये विलुप्त हो गयी।

दशहरा के इस पावन पवित्र पर्व पर अपने सुधि पाठकों एवं स्नेहीजनों को हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई।    

विजय सहगल

1 टिप्पणी:

N K Dhawan ने कहा…

आपने बहुत सुंदर ढंग से अपने गृह नगर की खत्रियों द्वारा मनायीं जाने वालीं गौरवशाली परम्परा का वर्णन किया । वास्तव में इस परम्परा की आज भी बहुत आवश्यकता है । आपकी लेखन शैली बहुत ही प्रभावशाली है ।