मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

डिस्किथ-गोम्पा-नुब्रा (लेह-लद्धाख)

 

"डिस्किथ-गोम्पा-नुब्रा (लेह-लद्धाख)"









नुब्रा के प्रवेश द्वार पर डिस्किट गाँव मे स्थित डिस्किट गोम्पा पर भगवान बुद्धा मैत्रेय के रूप मे एक पहाड़ी पर विराजमान मुद्रा मे है। 32 मीटर ऊंची उक्त रंग विरंगी आकर्षक, दर्शनीय  प्रतिमा एक प्राचीनतम तिब्बती बौद्ध मठ है। उक्त बौद्ध मठ श्योंक नदी के किनारे स्थित पहाड़ी पर पर्यटकों का आकर्षण का केंद्र है। खुले आसमान के नीचे विशाल प्रांगण मे पर्यटक प्रतिमा के साथ घाटी मे नदी किनारे हरे-भरे वृक्षों के बीच बौद्ध मतबलम्बियों बहुल "डिस्किथ गाँव" मे नज़र आते  छोटे छोटे मकान गाँव की आर्थिक समृद्धि की कहानी स्वतः ही व्यान करते है। यहाँ आवास हेतु होम स्टे और गेस्ट हाउस अच्छी संख्या मे उपलब्ध है। प्रतिमा के दाहिनी तरफ बहुमंज़िला सफ़ेद रंग इमारत मे लाल रंग के खिड़की, दरबाजे आकर्षक ढंग से नज़र आ रहे थे जो बौद्ध मठ के कार्यालय, छात्रावास, बौद्ध मठ के पठन पाठन के केंद्र हैं और जिसमे बौद्ध धर्म के अनुयायी शिक्षक और छात्र आदि निवासरत थे। बौद्ध प्रतिमा की परिक्रमा करते हुए उस  अविस्मरणीय मनोरम परिदृश्य को अपनी  यादों मे सँजोये बड़े बेमन से हम वहाँ से प्रस्थान हुए। मेरी हार्दिक इक्छा थी कि एक दिन का प्रवास उस गाँव मे करूँ पर जानकारी के अभाव मे अपने पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम मे परिवर्तन संभव न था।   

साफ सुथरे बौद्ध मठ के बाद हम लोगो का अगला पढ़ाव नुब्रा पहाड़ियों मे स्थित "रेत के टीले" थे। नुब्रा नदी के किनारे लगभग पाँच बजे हम सभी इन "sand dunes" अर्थात रेत बालू के टीले पर थे। पर्यटकों की अच्छी ख़ासी संख्या उस दिन यहाँ पर नज़र आ रही थी जिसका अनुमान नदी के मुहाने पर स्थित पार्किंग मे खड़ी सैकड़ों  गाड़ियों को देख कर भी लगाया जा सकता था। आसमान की ऊंचाई को छूती गगनचुंबी पर्वत चोटियाँ प्रकृतिक सौन्दर्य से समृद्ध शाली इस स्थान की स्पष्ट   दास्तां ब्याँ कर रही थी। इस दैवीय सौन्दर्य  मे विश्वप्रसिद्ध दो कूबढ़ वाले नुब्रा ऊंट नुब्रा नदी के  रेतीले मैदानों मे अपनी उपस्थिती दर्ज करा प्रकृति की खूबसूरती मे चार चाँद लगा रहे थे। ऐसा कहा जाता है कि दो कूबढ़ वाले ये सुंदर ऊंट दुनियाँ मे सिर्फ नुब्रा घाटी मे ही पाये जाते है। ये दो कूबढ़ वाले ऊंट  पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र था। ग्रुप के सभी सदस्य ऊंट पर बैठ कर सेल्फी लेने की दिली ईच्छा मन मे दबाये ऊंट पर सवार पर्यटकों को देख रहे थे। ऊंटों पर सवारी की  तीब्र  आकांक्षा और ईक्षा तो सवारी के लिये टिकटों की लंबी-लंबी लाइन देख कर पूरी होने की संभावना कम ही थी। क्योंकि घंटे दो घंटे की प्रतीक्षा सूची जो थी और एकाधा घंटे मे ही अंधेरा घिरने की संभावना जो थी।

यहाँ-वहाँ लोगो को ऊंट पर सवारी देख कर ही  मन को तसल्ली दी जा रही थी कि अचानक एक "बगैर पैसे के ऊंट" से मुलाक़ात हो गयी जो यूं ही रेत पर बैठ जुगाली कर जा रहा था। मैंने बचपन मे न्यूटन के गति का पहला नियम पढ़ा था जो कि इस बिना पैसे के ऊंट पर शत प्रतिशत लागू हो रहा था। जैसे गति के नियम के अनुसार "कोई स्थिर है तो स्थिर ही रहेगी और यदि चलायमान  रही है तो वह लगातार चलती रहेगी जब तक की उस पर कोई  बल प्रयोग न किया जाये। आप भी सोचते होंगे कि क्या फालतू की बकवास लेकर बैठ गये मिस्टर सहगल?? दरअसल इस नियम की व्याख्या मैंने कुछ यूं की कि यदि ऊंट बैठा है तो बैठा ही रहेगा या चल रहा है तो चलता ही रहेगा जब तक कि उसका मालिक उसे उठने-बैठने या रुकने  के लिये अपनी कूट भाषा (कोड-वर्ड) मे न कहे वह किसी के भी कहने पर न तो बैठेगा, न चलेगा!! इस बात की आजमाइश मैंने उसे हिला डुलाके देखा, हुट-उट्र, हुस्ट  आदि कह कर धकेला पर वह टस-से-मस नहीं हुआ!! फिर क्या था दोनों कूबढ़ के बीच पैर डाल कर मै बैठ गया और शानदार सेल्फी ली। मेरी देखा देखि सभी बारह सदस्यों ने उस बगैर पैसे के ऊंट पर बैठ कर अपनी-अपनी फोटो ली खिचवाई। आखिरी सदस्य उमा गुप्ता भाभी जी के फोटो निकलते ही उस ऊंट का मालिक न जाने  कहाँ से प्रकट हो गया और उसके एक इशारे से ऊंट उठ कर उसके साथ चला गया। इस तरह हम लोगो ने उस ऊंट को  बगैर पैसे के ऊंट के खिताब से अलंकृत कर दिया।         

अब तक रात्रि आगमन पर पूर्णिमा के चाँद की रोशनी मे चमकते ये टीले चाँदी के रेत की तरह प्रतीत हो रहे थे। "हंडर गाँव"  जहां "नुब्रा सराय" नमक होटल  के टेंटों मे हम लोगो के ठहरने की व्यवस्था थी। हम लोगो ने रात्रि विश्राम हेतु  होटल के लिये प्रस्थान किया।

घाटी मे बसे हंडर गाँव जो लगभग चारों चारों ओर पहाड़ों से घिरा है। गाँव के छोटे से बाज़ार मे आवश्यक वस्तुओं विशेषकर खाने पीने की वस्तुएँ सहज उपलब्ध थी।  प्रायः हंडर गाँव मे हर घर मे होम स्टे या टेंट के गेस्ट हाउस बने है जो पर्यटकों से होने वाली आय और गाँव की समृद्धि की शानदार कहानी कहते है। कैसे गाँव की पंचायत और गाँव के लोग मिलकर उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम दोहन कर पर्यटन उद्धयोग का  उपयोग साधारण जनता के हित मे कर सकते है ये इसका जीता जागता उदाहरण है।

विजय सहगल

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