"पेंगोंग त्सो लेक"
20 सितम्बर 2021 के दिन हमारे समूह को
पेंगोंक लेह के लिये प्रस्थान करना था। दुनियाँ की सबसे ऊंची खारे समुद्र की झील
पेंगोंक जिसकी नुब्रा घाटी से दूरी लगभग 274 किमी॰ थी जिसको लगभग आठ घंटे के
लक्षित समय मे पूरा करना था। बस के चालक पुंचुक की जगह अब रिंछिन थे। आज की यात्रा
भी पिछले दिनों से कठिन और दुरूह होने वाली थी। बस चालक ने बताया कि यात्रा का कुछ
रास्ता अति दुर्गम और पत्थरीला है। नुब्रा घाटी के गगनचुंबी उघारे पर्वतों को अपनी
यादों मे सँजोये हम लोग सुबह के नाश्ते के
बाद पेंगोंक झील के लिये आगे बढ़े। पर्वतों
की ऊंचाई वाली बीमारी के विरुद्ध ली जाने वाली
दबा डायमोक्स की कुछ अतरिक्त
गोलियां स्टॉक मे जमा की ताकि इस दुर्गम ऊंचाई के डर और रूग्णता से निजात मिल सके।
रास्ता लंबा और कठिन भी था। दूर-दूर तक ठंडे रेगिस्तान मे जहां तक निगाह जाती ऊंचे
ऊंचे निर्जन पहाड़ नज़र आते मानों वनस्पति विहीन होने को अभिशप्त हों?
सारे रास्ते मे कहीं कोई आवास नज़र आये-न-आये
पर सेना की चैकसी पूरी चाक-चौबन्द थी। सैनिक वाहन सारे रास्ते आते जाते नज़र आते।
कुछ जगह तो अल्पाहार और लघु शंका आदि की व्यवस्था स्थानीय लोगो द्वारा सैनिकों के
सहयोग मे ही उपलब्ध करायी जा रही थी। ऐसे ही "तंगत्से" स्थान पर एक छोटे
पर पर्यटकों की भीड़ वाले रेस्टुरेंट मे हल्का फुल्का लंच लिया क्योंकि अभी लगभग 3
घंटे की रास्ता शेष थी।
अब हम लोग श्योंक नामक गाँव मे पुलिस जाँच
चौकी पर कुछ देर के लिये रुके तो ड्राईवर ने बताया कि यहाँ से एक रास्ता पेंगोंक
त्सो झील को एवं दूसरा रास्ता दौलत बेग ओल्दी के गलवान घाटी की ओर जाता है जो चीन
की वास्तविक नियंत्रण रेखा के नजदीक है। गलवान घाटी का नाम सुनते ही पूरे शरीर मे
रोंगटे खड़े कर देने वाले रोमांच का अनुभव हो उठा और सहसा ही भारतीय सेना के उन बीस वीर सपूतों की याद हो आयी जिन्होने कर्नल संतोष बाबू
के नेतृत्व मे 15 जून 2020 को देश की रक्षा हेतु अपने प्राणों की आहुति दी थी।
गलवान घाटी के उन बीस वीर सैनिकों की तस्वीरे आँखों के सामने आ गयी
जिन्होने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान किया थी। शहीद भूमि तक तो
सुरक्षा कारणों से पहुँचना संभव न था पर एक मिनिट उस रास्ते की ओर मुंह करके उन
बहादुर सपूतों को अपनी मौन एवं विनम्र श्रद्धांजली अर्पित कर उस पथ को नमन किया जो
गलवान घाटी की ओर जाता था। उन शहीदों को
श्रद्धांजलि रूप मे दिनांक 6 जुलाई 2020
लिखित भावांजलि का लिंक आज पुनः आप लोगो
के साथ सांझा कर रहा हूँ - https://sahgalvk.blogspot.com/2020/07/blog-post_6.html
अब हमारी अगली मंजिल श्योंक गाँव से 57
किमी॰ पेंगोंक झील थी जहां हम लोगो का एक रात्री प्रवास था। 134 किमी॰ लंबी इस झील
का लगभग 33% अर्थात लगभग 45 किमी॰ हिस्सा
हिंदुस्तान के कब्जे मे है बाकी शेष 66% अर्थात लगभग 87 किमी॰ हिस्सा चीन के पास
है। पूर्वी लेह-लद्धख को पश्चिमी तिब्बत से जोड़ने वाली इस खारी झील का पूरा हिस्सा
सर्दियों के चरम पर जम जाता है। ऐसी चर्चा थी कि ये समुद्री जल से भी खारे पानी की झील है इस शंका को दूर करने हेतु जैसे
ही मैंने झील के पानी का स्वाद लेने हेतु चुल्लू से पानी लिया तो मुझे इसका खारा
पन समुद्री जल से काफी कम लगा लेकिन तेज चलती हवा और ठंडक ने हथेली को ठंडक से
सुन्न कर दिया तुरंत ही रुमाल से पानी को पोंछने पर राहत लगी। तेज ठंडी हवाओं ने
टोपी, मफ़लर ग्लब्स पहनने को मजबूर कर दिया। लेकिन झील के
प्राकृतिक सौन्दर्य ने उपस्थित सभी
सदस्यों का मन मोह लिया। समुद्र की सी उफनाती
लहरों का जिनका आवेग समुद्र से काफी कम था हिलोरे
ले रही थी, लेकिन निस्तब्ध वातावरण
मे लहरों की आवाज को स्पष्ट सुना जा सकता था। हमारे ग्रुप के सभी सदस्यों ने अपनी उपस्थिती को
व्यक्तिगत और समूहिक रूप से विभिन्न कोणों और दृष्टिकोणो से अपने अपने मोबाइल फोन
के कैमरों मे कैद किया।
झील के पानी के बदलते रंग ईश्वर जनित इस
चित्रकारी के त्रिदर्शीय आयाम के दर्शन करा रहे थे। पानी की शतप्रतिशत पारदर्शिता इस बात का
संकेत थी कि झील एवं यहाँ का पर्यावरण पूर्णतयः प्रदूषण मुक्त है। दिल्ली जैसे
शहरों मे रह रहे लोगो के लिए प्रदूषण मुक्त वातावरण किसी सपने से कम न था। हिलोरे लेते पानी के नीचे के एक-एक कण और पत्थर
के टुकड़ों को पूर्णतः स्पष्ट देखा जा सकता था। तमाम कोशिशों और प्रयासों के बावजूद
किसी जलचर मछ्ली के दर्शन नहीं हुए। वनस्पति
एवं जंतुओं से विहीन इस झील और पर्वत मे दूर दूर तक नितांत वीरानी के दर्शन कहीं आत्मा
से परमात्मा के साक्षात्कार का अहसास करा रहे थे जिसे शब्दों के परे दिल मे ही महसूस
किया जा सकता था। झील के दूसरी तरफ दिखाई
दे रहे पहाड़ो पर ऐसा प्रतीत होता मानों लाल-सुनहरी,
मटियानी रंग की रेत के टीलों पर जमी सफ़ेद
बर्फ की लकीरे शरीर पर दिखाई देने वाली श्वेत रक्त धमनियाँ हों। इन उघारे वनस्पति
विहीन पहाड़ों के पीछे वर्फ से ढँकी चोटियाँ किसी वयोवृद्ध साधू सा अहसास करा रही
थी जो अपनी सफ़ेद जटाओं को विखेर अपनी सुधबुध भूल तपस्या मे लीन हों। पर्यटन की दृष्टि
से मीलों दूर झील के किनारे पर बनी अष्ट भुजाकार चबूतरे पर आठ लौह खंबों पर पड़े लाल
रंग का टीन शेड की आकृति इस झील का एक पहचान चिन्ह बन चुकी है। टीन शेड के नीचे
सुंदर अर्ध वलयाकार लोहे की छड़ों पर छोटी छोटी पत्तियों की ज्योमिति आकृतियाँ
सुंदर दिखाई दे रही थी। मानव निर्मित ये लौह स्तंभों पर टिकी आकृति के दोनों ओर
मीलों दूर तक दिखाई देने वाले रेगिस्तान मे एक आश्रय स्थल का अहसास कराती है जो
सकारात्मकता से परिपूर्ण भरपूर ऊर्जा चारों ओर बिखेरती प्रतीत होती है।
हम लोगो का दुर्भाग्य है कि प्रकृतिक सौन्दर्य
से भरपूर स्थानों को फिल्मों से जोड़ कर याद रखने और उससे अपने आपको जोड़ कर अपने सौभाग्य
को सराहने की परंपरा है जिसका मै धुर विरोधी हूँ। पेंगोंग झील के किनारे इस स्थान पर एक फिल्म के कुछ प्रतीक चिन्हों को
सँजो कर लोग फोटो खिंचवा रहे थे। मै उक्त
फिल्म और उसके "टपोरी नचैये" का
यहाँ उल्लेख कर इस पेंगोंग त्से जैसे प्राकृतिक
सौन्दर्य से भरपूर इस अत्यंत खूबसूरत स्थान के कद और महत्व को कम करना नहीं
चाहता।
झील के किनारे दो ढाई घंटे के भ्रमण पश्चात
हम लोगो अपने आश्रय स्थल टेंटों की ओर रवाना हुए। इस पूरे क्षेत्र मे कोई स्थायी
संरचना और भवन दिखाई नहीं दिया। टेंट की व्यवस्था मे रत योगेन्द्र सिंह ने बताया
कि अक्टूबर माह के शुरू होने के कुछ दिन बाद ही हम लोग शीत कालीन मौसम की शुरुआत
के पूर्व यहाँ से प्रस्थान कर जाएंगे क्योंकि चारों तरफ बर्फवारी होने के कारण
यहाँ रुकना असंभव हो जाता है। लेकिन इस जघन्य सर्दी के बावजूद हमारे सेना और
सुरक्षा बलों के जवान यहाँ से मीलों आगे तक देश की रक्षार्थ तत्परता से डटे रहते
है जिनके सामने श्रद्धा और सम्मान से सिर
स्वतः ही नतमस्तक हो झुक जाता है।
हमारे एक साथी ने कार्यक्रम बनने के दौरान
शंका जताई थी कि पेंगोंग के टेंट मे व्यवस्थापक रात के ओढ़ने बिछाने के कपड़ों का अभाव उत्पन्न कर
उपलब्ध नहीं कराते है? जिससे सर्दी मे रात काटना कठिन हो जाता है।
मै चिंतित था पर एक एक अतिरिक्त रज़ाई और
कंबल देख उक्त आशंका निर्मूल साबित हुई। टेंट लगभग वायु रोधी थे। रात भर चली
साँय-साँय हवाओं के बावजूद टेंट के अंदर
सर्दी का कोई असर नहीं था। हम लोग अच्छी भरपूर नींद के बाद जब सुबह छह बजे के लगभग
जागे तो अपने कुछ साथियों के साथ पुनः पेंगोंग झील के किनारे सुबह का लुत्फ लेने
झील किनारे पहुँच गए। कलकत्ता के कुछ पर्यटकों से सौजन्य भेंट हुई। झील किनारे
अपनी आस्थाओं इच्छाओं के प्रतीक एक के उपर
एक कई पत्थरों की आकृति देखी जो शायद
ईश्वर से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु निवेदन
का प्रतीक थी। तस्वीर को लेते हुए मैंने भी ईश्वर से उस व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण
करने हेतु गुहार लगाई। झील से उपर बने
सफ़ेद टेंट की कतारें सुंदर दिखाई दे रही थी जिनमे वातावरण के विपरीत मानव श्रम और
कौशल ने पर्यटकों को एक सुखद आश्रय उपलब्ध कराया था।
इस तरह हम एक बार फिर से पेंगोंग से लेह की
यात्रा के लिए तैयारी मे लग गए।
विजय सहगल
1 टिप्पणी:
Bahut hi sunder varnan sir...
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