शनिवार, 9 अक्टूबर 2021

श्रीनगर मे निरीह नागरिकों की आतंकवादियों द्वारा हत्या

 

"श्रीनगर मे निरीह नागरिकों की आतंकवादियों द्वारा हत्या"





आज कुछ शोक और दुःख मे हूँ। कुछ क्षोभ और क्रोध भी है। अभी कुछ दिन पूर्व जब मै 26 सितम्बर 2021 को लाल चौक की गलियों मे घूम रहा था तो बड़ा फख्र और उत्साह मन मे था कि हम अपने देश के हृदय स्थल श्रीनगर के लाल चौक की गलियों मे घूम रहे है। हर जगह अपना वतन अपनी जमीं नज़र आती थी मानों हम दिल्ली के कॅनाट प्लेस  पर चहल कदमी कर रहे हों। जब पिछले मंगलवार  यानि 5 अक्टूबर को लाल चौक की उन्ही गलियों मे कुछ आतंकवादियों ने श्री माखन लाल बिंदरू की हत्या कर दी जो शहर के बड़े पुराने दवा व्यापारी  थे। ये उन गिने चुने लोगो मे थे जिन्होने  राज्य मे आतंकवाद के चर्म पर होने के बावजूद  भी अपनी मातृ भूमि को नहीं छोड़ा था और न पलायन किया था। मै नहीं जनता कि उनका व्यापारिक संस्थान लाल चौक मे कहाँ था लेकिन मै जानता हूँ लाल चौक की  जिन गलियों मे हमने 26 सितम्बर 2021 को जहां चहल कदमी की थी वहीं-कहीं आसपास ही वो जगह रही होगी और जहां हमने लाल चौक मे अपने हसीन पल उस दिन व्यतीत किए थे। उस दिन ही एक खोमचे वाले गरीब मजदूर  को भी उसके धर्म के आधार पर आतंकवादियों ने गोली मारकर उस निरीह मजदूर को मौत की नींद सुला दिया था।  

सात अक्टूबर को भी श्री नगर के शहरी इलाके मे ही एक सरकारी  स्कूल की प्राचार्य सुपिंदर कौर और अन्य अध्यापक दीपक चंद की भी हत्या की गयी।  यहाँ भी इन कायर आतंकवादियों ने धर्म की पहचान के आधार पर दो अध्यापकों की नृशंस हत्या की जो धर्म-संप्रदाय के परे शिक्षा की ज्योति बच्चों के बीच प्रज्वलित कर रहे थे। लेकिन आतंकवादियों द्वारा पहचान पत्रों के आधार अध्यापकों  को अलग करने के दौरान कार्यालय के अन्य संप्रदाय के साथियों का मौन भी समझ और शंका से परे अत्यंत दुःखद है। इन धूर्त डरपोक अतिवादियों ने निरीह, निहत्थी  महिला के ऊपर बंदूक से फायर कर कौन सी मर्दानगी का प्रदर्शन किया? इनमे अगर थोड़ी सी भी शर्म और गैरत  होती  तो इन नीच आतंकवादियों ने निरीह निहत्थे लोगो की हत्या कर अपनी माँ के दूध को न लजाया होता? पाकिस्तान मे बैठे इमरान सहित इनके आकाओं मे थोड़ी भी बहादुर और शर्म होती तो तनिक अपनी  वीरता और पराक्रम  हमारी सेना और सुरक्षा बालों के समक्ष दिखलाया होता तब इनको हमारे सैनिकों  ने छटीं का दूध याद दिला दिया होता। एक खोमचे वाले गरीब की हत्या मे कौन सी वीरता है? एक वृद्ध दुकानदार को मारने मे क्या पराक्रम? एक महिला प्राचार्य और अध्यापक  को सिर्फ धर्म के आधार पर कत्ल मे तुम्हारा  कौन सा पौरुष और साहस है? ये सब दर्शाते है कि आतंकियों, दहशतगर्दों तुम दोगले, बहशी और कायर कुल की संताने हो, जिनके दिलों मे इंसानियत और मानवता के लिए कोई जगह नहीं। लानत है तुम पर, तुम्हारी मर्दानगी पर!! और तुम्हारे होने पर!! तुम्हारी ये कायरता पूर्ण हरकतों से तुम्हारे मंसूबे पूरे नहीं होने वाले।

आतंकवादियों और देश के दुश्मनों से लड़ते हुए इन निरीह और निहत्थे नागरिकों का बलिदान भुलाया नहीं जा सकता पर  हम अपने सुरक्षा विशेषज्ञों, सरकारों और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों  से निवेदन करना चाहते  है कि संकट की ऐसी कठिन, विषम परिस्थितियों मे जब जीवन और मौत के बीच  मृत्यु अवश्यसंभावी हो तो क्या तरकीबें? कौन से हथियार? और कैसी परिस्थितियाँ? निर्मित की जानी चाहिये जिससे दुश्मन को अधिकतम क्षति पहुंचाई जा सके? क्योंकि एकतरफा बलिदान, वीरगति एवं आत्मोसर्ग अब हमे रास नहीं आ रहा?            

 

विजय सहगल