रविवार, 17 अक्टूबर 2021

लेह-नुब्रा वैलि

                                                              "लेह-नुब्रा वैलि"








लेह लद्दाख की यात्रा देश के अन्य पर्यटक केन्द्रों की तरह उत्साह उमंग से जरा हट के है। यहाँ के पर्यटन मे प्रसन्नता के साथ रोमांच, उत्तेजना एवं कुछ कुछ कठिनाइयाँ लिए पर प्रकृतिक सौन्दर्य से भरपूर है। एक ओर जहां  समुद्र तल से सर्वाधिक ऊंचाई होने के कारण जहां सुंदर प्रकृतिक दृश्यों के अनंत भरपूर भंडार है वहीं ओक्सिजन की कमी के कारण स्वांस संबंधी कुछ थोड़ी बहुत परेशानियाँ भी है। लेकिन एक-दो दिन रहने एवं आराम करने से यहाँ के मौसम के अनुकूल अभ्यस्त हुआ जा सकता है। लेह लद्धाख मे "डायमोक्स " दवाई जो सर्वसुलभ होने के कारण अति ऊंचाई की बीमारी से बचाने मे सहायक है। हर छोटी कस्बे या गाँव मे सरकारी चिकिसकीय सेवाएँ उपलब्ध है। राज्य सरकार की डिस्पेन्सरी/अस्पताल एवं सेना की मेडिकल कोर के केंद्र भी पर्यटकों के बीच लेह लद्धाख की इस सामान्य श्वांस संबन्धित इस अति ऊंचाई की बीमारी से बाकिफ है और इसके बीमारी के विरुद्ध उपलब्ध साधन सहायक सिद्ध होते है।  इसलिये इस भय से बहुत ज्यादा घबराने या डरने की आवश्यकता भी नहीं क्योंकि इस बर्फीले रेगिस्तान के प्रकृतिक दृश्यों का सम्मोहन आपका ध्यान स्वतः ही छोटी-मोटी  बाधाओं से हटा जो लेता है।

दिनांक 18 सितम्बर 2021 को हम छः परिवारों के बारह सदस्यों ने लेह से नुब्रा वैलि के लिए टेम्पो ट्रेक्स सी प्रस्थान किया जहां हमारा दो दिन का प्रवास था। लेह से नुब्रा घाटी की दूरी लगभग 160 किमी थी। घुमाव दार पहाड़ी रस्तों मे इस यात्रा की अवधि 6-7 घंटे की थी जिसमे 5-6 अधिकृत   विराम शामिल थे  जिसमे नाश्ता, खाना या कुछ प्रसिद्ध पर्यटक केन्द्रों के अतरिक्त रुकना तय था किन्तु ग्रुप की दो महिला सदस्यों का घुमाव दार पहाड़ी रस्तों मे यात्रा के अभ्यस्त न होने से लगातार उल्टी के के कारण 5-6 अतरिक्त विराम लेने पड़े। लेकिन श्रीमती उमा गुप्ता एवं श्रीमती रति वर्मा की तारीफ करनी होगी कि उल्टी की इन बाधाओं के बावजूद मजाल है, कि इनके  नुब्रा वैली, तुरतुक एवं पेंगोंग झील घूमने के उत्साह मे कहीं कोई लेश मात्र भी कमी आयी हो?

पहला पढ़ाव लेह शहर के बाहर की ऊंची पहाड़ियो पर था जहां से लेह शहर के सहज और सरल दर्शन हुए। दूर वर्फ से ढंकी पहाड़ियाँ दिखाई दी। आगे करीब 39-40 किमी पर खरदुंगला  पास पर जाना हुआ जो नुब्रा वैलि एवं श्योंक वैली का प्रवेश द्वार है साथ ही साथ ये दुनियाँ का सबसे ऊंचा (समुद्र ताल से 17982 फुट ऊंचाई) ऑटो वाहन मार्ग है। खरदुंगला  मार्ग पर उम्मीद थी कि शायद बर्फ के पहाड़ और चोटियाँ नजदीक से दिखाई देंगी और ऐसा हुआ भी लेकिन उस छोटी सी सड़क पर बहुतायत बुलेट मोटरसाइकल सहित दो पहिया और चार पहिया वाहनों, कारों, बसों एवं सेना के ट्रकों सहित गाड़ियों की इतनी ज्यादा रेलम-पेल थी कि पैदल भी चलना मुश्किल हो रहा था ट्रैफिक जैम की सी स्थिति थी। दिल्ली के चाँदनी चौक सी  भीड़ जैसा दृश्य आँखों के सामने हो आया। लघु शंका की समुचित व्यवस्था न होने के कारण लोग जहां तहां लघु शंका से निवृत्त हो रहे थे। ऐसे ही स्थानों के आसपास ही बर्फ के साथ फोटो की ललक-लालसा मे लोग विभिन्न भरतनाट्यम की शास्त्रीय मुद्राओं मे फोटो खींच और खिंचवा रहे थे। चारों तरफ वाहनों से निकले डीजल धुएँ की दुर्गंध आ रही थी। हालत इतने बेकाबू थे कि सीमा सड़क संगठन द्वरा दुनियाँ की सबसे ऊंची सड़क के मील के पत्थर के साथ सेल्फी और फोटो लेने वालों की आपस मे होड मची थी। मैंने दुनियाँ के सबसे ऊंची सड़क के उपर बर्फ़ीली रास्तों की जो कल्पना की थी, वास्तविकता इसके ठीक  विपरीत थी।            

रास्ते मे चाय पान हेतु खलसार जगह पर रुकना हुआ। गर्म चाय के साथ समोसे की उपलब्धता ने मन को मोह लिया। फिर क्या था गरम-गरम समोसे का ऑर्डर दे दिया। सुदूर उत्तर के लद्दाख मे समोसे की उपलब्धता इस व्यंजन के अंतराष्ट्रीय होने का प्रमाण है। चाय समोसे का वो स्वाद की सोच आज भी मुँह मे पानी आ गया। पहाड़ों पर जीवन कितना कठिन है इसकी झलक वहीं पास मे उस महिला द्वारा सिर पर लदे बोझे को उतरते समय महसूस किया, जहां पर एक लद्दाखी महिला को जीवन की आपाधापी से जूझते देख उससे बात की। कठिनाई ये थी मुझे लद्दाखी नहीं आती थी और उसे हिन्दी!! संकेतों और इशारों से उसको अपने सिर पर बोरी मे लिये वस्तु की जानने की उत्कंठा हुई। मै धाराप्रवाह हिन्दी मे सवाल पूंछता वह धाराप्रवाह लद्दाखी मे जबाब दे रही थी। दोनों के पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था। आखिर उसके बोरे को खोल कर देखा तो जंगल मे याक के गोबर के सूखे टुकड़ों को उसने एकत्रित कर बोरे मे भर रखा  था। उस महिला द्वारा सर्दियों मे ईधन को एकत्रित करने की जिजीविषा के कठिन प्रयास को देख नतमस्तक था।  उसने जाड़ों मे इसके  उपयोग के लिये याक के गोबर को दूर दराज पहाड़ों से एकत्रित किया था। जब मैंने कुछ धनराशि दे उसकी फोटो खींची तो "जूले-जूले" कह कर उस वृद्ध महिला ने अभिवादन किया। लद्दाखी मे मै "जूले" शब्द से परिचित था जिसका अभिप्राय  "अभिवादन" से था जिसे सुन कर मन अति प्रसन्न था।

यहाँ से नीचे घाटी का रास्ता शुरू हो चुका था और श्योंक नदी की धारा सड़क के साथ साथ चलती नज़र आ रही थी। खलसार मे अल्पाहार के लिए रुके कुछ नौजवान लड़के एवं परिवारों के साथ आए छोटे बच्चे  इस नदी की छोटी धारा मे ही अठखेलियाँ कर बहती नदी की धारा का आनंद ले रहे थे।  ( नुब्रा घाटी का शेष भाग अगले अंक मे.............क्रमश:)

विजय सहगल

कोई टिप्पणी नहीं: