"गुरुद्वारा
पत्थर साहिब-लेह"
दिनांक 23 सितम्बर 2021 को लेह यात्रा से
बापसी के समय लेह से 25 किमी दूर लेह कारगिल मार्ग मे चारों तरफ बंजर-भूमि मे एक
छोटा सा हरा-भरा आसमानी रंग मे रंगा गुरुद्वारा पत्थर साहिब रेगिस्तान मे नखलिस्तान
की तरह आँखों को सुख और सुकून देने वाला
था। मार्ग से आती जाती सभी गाडियाँ चाहे असैनिक हो या सैनिक कुछ देर के लिए
गुरुद्वारे के समीप अवश्य रुकती है। गुरुद्वारे का संचालन एवं सेवा भी लेह मे
पदस्थ सैनिकों द्वारा की जा रही थी। हर आगंतुक का स्वागत प्रवेश द्वार पर ही
गरमा-गर्म चाय एवं टोस्ट से किया जा रहा था। सर्दी के मौसम मे गर्म चाय अमृत के
तुल्य प्रसाद की तरह था। ज्ञात हुआ कि इस स्थान पर गुरु नानक देव जी सन 1517-1518
के बीच नेपाल, तिब्बत,
सिक्किम, लेह का भ्रमण करते हुए
सन 1517 ई॰ मे कुछ दिनों के प्रवास पर यहाँ पहुंचे थे। बड़ा आश्चर्य और विस्मय का
विषय है कि इतने सीमित साधनों और अविकसित
माध्यमों के चलते इतनी लंबी यात्रा की कल्पना ही असंभव सी प्रतीत होती है। गुरु
नानक देव जी जैसे अलौकिक महापुरुष के बसकी ही बात थी जो लगभग सत्तर वर्ष के जीवन
काल मे अपने पारवारिक दायित्वों, जिम्मेद्वारियों
से निवृत हो जीवन का अधिकांश समय देश विदेश की यात्राओं मे भक्तिवाद,
सर्वीश्वरवाद एवं मानव सेवा की अलख जगाने का संदेश दिया। ऐसे भागीरथी प्रयास आध्यात्मिक
चिंतन, सत्संग से परिपूर्ण श्री गुरुनानक देव जी
जैसे दिव्य अलौकिक महापुरुष के द्वारा ही संभव थे।
ऐसी किवदंती है कि इस स्थान के सामने पहाड़ी
पर एक घोर पापी राक्षस रहता था। जिसे लोगो
को सताने और मारने और कभी कभी मारकर खाने मे बड़ा आनंद आता था। स्थानीय लोगो के
कहने पर गुरु नानक देव जी ने इस स्थान पर प्रवास करने का निश्चय किया जिससे
स्थानीय लोगो को राहत की सांस ली। नदी किनारे श्री नानक देव जी को समाधि मे लीन
देख क्रोधित राक्षस ने एक बड़ा सा पत्थर उनके उपर फेंक,
जान से मारने की कोशिश की। पर "हरि बिनु तेरो,
को न सहाई...... के मूल मंत्र पर अडिग नानक देव जी का बाल भी बांका न हुआ। पत्थर उनके
शरीर से स्पर्श होते ही मोम की तरह मुलायम होकर उनके शरीर के पिछले हिस्से पर
गिरने से शरीर पत्थर मे धंस गया। नानक देव जी पूर्व की तरह अपनी भक्ति मे लीन रहे।
अपनी कुत्सित सोच के वशीभूत जब राक्षस ने पत्थर के नीचे देखा तो हैरान रह गया
कि नानक देव जी को कुछ नहीं हुआ,
वे एकदम ठीक थे। क्रोध मे उसने जैसे ही अपना पैर पत्थर मे मारा वह भी उस पत्थर मे
धंस गया। इस चमत्कार को देख उस मूढ्मती को अहसास हुआ कि ये कोई दिव्य संत,
महात्मा है! इस तरह नानक जी के चरणों मे गिर माफी मांगी। नानक देव जी ने अपने आंखे
खोली और राक्षस को उपदेश दिया। राक्षस को शेष जीवन लोगो की सेवा करने मे ही जीवन
का सार्थक संदेश और कल्याण का मार्ग बताया।
पत्थर की उक्त सिला को गुरुद्वारे मे आज भी
देखा जा सकता है। पत्थर की सिला मे नानक देव जी के शरीर के पिछले हिस्से की
प्रतिकृति एवं राक्षस के पैर के निशान स्पष्ट देखे जा सकते है। दिव्य वातावरण मे
ध्यान और सुमरिन की दृष्टि से गुरद्वारे मे चारों तरफ कालीन बिच्छाया गया है ताकि
दर्शनार्थी दिव्य आध्यात्मिक, मौसमानुकूल
वातावरण मे कुछ समय ध्यान लगा नानक देव जी का स्मरण कर सके। सिला के पास ही गुरुग्रंथ साहिब की स्थापना की
गयी जहां पर हम लोगो ने मत्था टेक कर गुरुओं के समक्ष अपनी अरदाश की और सिर झुका अपना सम्मान प्रकट किया।
बापसी पर कढ़ा प्रसाद ग्रहण कर गरम पानी के
सरोवर से निकल कर ऐतिहासिक गुरुद्वारे श्री पत्थर साहब के दर्शन अपनी आँखों मे
सँजोये, बस मे आकर बैठ,
आगे की यात्रा के लिए प्रस्थान किया।
"बोले सो निहाल", "सत श्री अकाल"!
विजय सहगल
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