शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021

श्रीनगर के लाल चौक से मै......

"श्रीनगर के लाल चौक से मै......"






 श्रीनगर का लाल चौक भारत के इतिहास मे एक अलग महत्व रखता है। 1947 मे स्वतन्त्रता के बाद से ही तत्कालीन सरकार के जम्मू और कश्मीर पर निर्णय पर देश मे इस विषय मे  प्रायः चर्चा और टीका टिप्पड़ी लगातार होती आ रही है पर एक बात स्पष्ट है कि देश के  सभी राजनैतिक दल सहित समस्त देशवासी सर्वसम्मत रूप से  पाक अधिकृत कश्मीर सहित पूरे  जम्मू कश्मीर को  भारत का अभिन्न अंग मानते है जिसमे कोई शंका और संशय नहीं। इस मत और विचार को अलग अलग समय मे विभिन्न राजनैतिक दलों और नेताओं ने अपने अपने तरीके से लाल चौक मे अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा अपनी प्रतिवद्धता और वचनबद्धता प्रदर्शित की है।

पिछले अनेकों वर्षों से जब कभी मै कश्मीर के प्रकृतिक रूप से समृद्ध एवं आर्थिक गतिविधियों के रूप से सुदृढ़, इस लाल चौक की तस्वीर को टीवी या अखबारों मे देखता था तो मेरी "दो" दिली ख्वाहिश दिल मे रहा करती थी। पहली, इस लाल चौक मे अपनी भी उपस्थिती दर्ज़ कराऊँ  एवं दूसरी, हमारे सुधि पाठकों ने ध्यान दिया हो कि, लाल चौक की पृष्टभूमि मे  नीले रंग के उस लंबे-चौड़े  बोर्ड जिस पर बड़े बड़े शब्दों मे हिन्दी के साथ उर्दू और अँग्रेजी मे  "यात्री निवास" लिखा लिखाई देता है!!, उस यात्री निवास के स्वामी से मिलूँ। मुझे ये हिन्दी मे लिखित बोर्ड इसलिये भी प्रभावित करता है क्योंकि सिर्फ ये ही बोर्ड श्रीनगर मे आपको अन्य भाषा के साथ हिन्दी मे लिखा दिखाई देता है। 26 सितम्बर 2021 को मुझ जैसे एक हिन्दी प्रेमी व्यक्ति को हिन्दी मे लिखे  बोर्ड को देख कर कुछ बैसा ही  सुख और सुकून  मिला जैसा किसी व्यक्ति को रेगिस्तान मे, हरे भरे छोटे से नखलिस्तान को देख कर मिलता है। मुझे उर्दू या अँग्रेजी सहित अन्य भाषाओं से कुछ दुराग्रह नहीं है पर हिन्दी प्रेमी इस भवन स्वामी का हिन्दी के प्रति आग्रह मुझे अत्यंत प्रिय लगा। यूं तो गाहे-बगाहे मै अन्य भाषाओं के शब्दों को भी अपने ब्लॉग मे शामिल करता हूँ लेकिन एक ऐसे स्थान मे जहां देश के कुछ दक्षिणी राज्यों की तरह  केंद्रीय या राज्य सरकारी विभागों की वैधानिक बाध्यता के चलते तो पट हिन्दी मे मिल जाएंगे पर इस बाध्यता के परे  शायद ही कोई बोर्ड  आपको हिन्दी मे लिखा दिखाई देता हो? आज मेरी दोनों ही दिली ख्वाहिश पूरी हो रही थी। मेरे आनंद और खुशी का कोई ओर-छोर नहीं था जब लाल चौक की विभिन्न दिशाओं मे एवं लाल चौक के  पीछे पार्क मे बनी छत्री मे पड़ी बेंच पर बैठ कर छायाचित्रांकन से मेरी पहली इच्छा और आकांक्षा पूरी हुई जिसमे हमारी सहायता हमारे मित्र विजय गुप्ता ने की।  

मुझ जैसे हिन्दी प्रेमी व्यक्ति को हिन्दी मे लिखे उस "यात्री निवास" के बोर्ड को  देख कर जो सुख मिला उसको शब्दों मे वर्णन कठिन है। अब बारी थी हमारी "दूसरी दिली इच्छा" मे यात्री निवास के भवन स्वामी से मिलने की? पार्क के सामने ही दो अन्य हिन्दी मे लिखे बोर्ड भवन के कार्यालय के रास्ते को दर्शा रहे थे। बोर्ड के नीचे पढ़ कर ज्ञात हुआ कि उक्त यात्री निवास/ धर्मशाला कश्मीर के राजा के वंशजों द्वारा गठित सनातन धर्म प्रताप सभा, श्रीनगर द्वारा संचालित है, जिसकी पुष्टि यात्री निवास के प्रबन्धक श्री इंदर कुमार सेठ एवं पुजारी जी श्री अजय शुक्ला जी ने भी मुलाक़ात के दौरान की। श्री सेठ जी ने बताया कि उक्त धर्मशाला मे साठ कमरे है। प्रत्येक कमरा शौचालय एवं स्नानागार सुविधा से परिपूर्ण है एवं  यात्रियों को मात्र 400/- प्रतिदिन की दर से उपलब्ध है। श्री नगर के हृदय स्थल मे इस दर पर आवास की सुविधा कतई महंगा सौदा नहीं है अपितु सात्विक और आध्यात्मिक वातावरण मे निवास आपको सोने मे सुहागा प्रदत्त कराता है।

मंदिर मे ही श्री करण मेहरा जी से भी मुलाक़ात हुई। श्रीनगर मे ही जन्मे मेहरा जी शायद अपने किसी ईष्ट का श्राद्ध तर्पण या अन्य धार्मिक कार्यक्रम संपादित कराने  हेतु पंडित जी को आमंत्रित करने आये थे। कपड़ा व्यवसायी श्री मेहरा जी श्रीनगर के व्यवसायियों मे एक गणमान्य स्थान रखते है जिनके सौजन्य से हमने  स्थानीय बाज़ार की खरीद-फरोख्त मे कश्मीरी कपड़ों पर अच्छी ख़ासी छूट भी प्राप्त की। जहां ऐसा पारवारिक माहौल हमे एक-दो घंटे मे मिला जो काफी अच्छा लगा। हमने श्री इंदर कुमार सेठ जी और महंत श्री अजय शुक्ला से अगली बार श्रीनगर आने पर यात्री निवास मे ही रुकने का वादा किया। राष्ट्र भाषा हिन्दी की ध्वज-वाहक इन वीर सपूतों को हृदय से धन्यवाद देते हुए इनके राष्ट्र-भाषा और राष्ट्र प्रेम को नमन करते हुए अपने मित्र के साथ श्रीनगर मे लाल चौक के  यात्री निवास की मधुर स्मृतियो और यादों को दिल मे सँजोये हमने  अपने गंतव्य के लिये दुबारा आने के संकल्प के साथ प्रस्थान किया।        

श्रीनगर के लाल चौक से अपने सुधि पाठकों के लिए मै विजय सहगल!!       

विजय सहगल


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