शनिवार, 31 जुलाई 2021

पशुओं के साथ नैतिक व्यवहार (PETA)

 

"पशुओं के साथ नैतिक व्यवहार (PETA)"





महानगरों की ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं मे  रहने वाले नागरिकों से ये अपेक्षा थी कि उनकी सोच भी इन ऊंची गगनचुम्बी इमारतों की सी होगी। इनमे रह रहे लोगो के दिल मे गरीब और निर्बल वर्गों के लिये सहृदयता होगी। इन ऊंची ऊंची बिल्डिंग मे सभी भाषा, प्रांत और समाज के प्रबुद्ध वर्ग के "मानव" तो निवासरत थे लेकिन "मानवता" कहीं  दूर दूर तक दिखाई न देती। पिछले दिनों नगर निगम के पार्क मे शाम को खेलने जा रहे सोसाइटी के एक बच्चे को एक स्ट्रीट डॉग ने काट लिया। पंद्रह वर्षीय राजू को आठ टांके लगे थे। हाथ पैरों मे जगह जगह कुत्ते के काटे के निशान थे जिनसे खून रिस रहा था।  ये तो भला हो आसपास घूम रहे लोगो का जो उस समय घूमने जा रहे थे। लोगो ने कुत्तों को डंडे और पत्थरों से मार कर पीछे भगा बच्चे को बचाया।

गनीमत थी हालत कोई गंभीर तो नहीं थे  पर गली के इन आवारा कुत्तों ने सोसाइटी के चिंतातुर नागरिकों के बीच  एक गंभीर चर्चा का विषय तो बना ही दिया था। उसकी सोसाइटी सहित आसपास की सोसाइटी मे रह रहे निवासियों के बीच बड़ा हँगामा मचा था। दर असल कुछ पशु प्रेमी गली के आवारा कुत्तों को रोज जगह-जगह खाना, बिस्कुट और भोजन खिलाते थे। महानगर की एक पशु प्रेमी संस्था तो सुबह और शाम अपने कर्मचारी के माध्यम से इन स्ट्रीट डॉग को ताजी और स्वादिष्ट बिरयानी खिलाती थी। उस कर्मचारी को देख सारे आवारा कुत्ते उसके इर्द गिर्द पूंछ हिलाते, गुरगुराते उसको  चारों ओर से बिरयानी की चाह मे घेर खड़े हो जाते। वह कर्मचारी कागज विछा, बिरयानी के छोटे छोटे ढेर लगा सड़क के दोनों ओर अलग अलग फैला देता। उस समय सड़क के दोनों ओर दूर दूर तक कुत्तों को भोजन  करते लाइन मे देखा जा सकता था। इसी दौरान रहवासी जो वहाँ से निकल रहे होते, कुत्तों को  लगता कि राहगीर उनको उनके भोजन से वंचित करना चाहते है अतः स्ट्रीट डॉग गुजर रहे लोगो पर  भौंकते थे। इसके अतिरिक्त कुछ धर्म प्रेमी, पशु प्रेमी नागरिक भी पूरे दिन इन आवारा कुत्तों को रोटी, चावल, भोजन बिस्कुट आदि भी खिलते रहते थे जिससे भी इन जानवरों के स्वभाव मे परिवर्तन आ चुका था और जिसके कारण इनकी आक्रामकता बढ़ती जा रही थी। आस पास की सोसाइटी के बहुतायत निवासियों को इन आवारा पशुओं को भोजन खिलाने पर आपत्ति रहती थी  और कभी कभी आपस मे कहा सुनी हो जाती। क्योंकि इन आवारा कुत्तों को बगैर किसी मेहनत के मिल रहे स्वादिष्ट खाने ने इन्हे खूंखार भी बना दिया था। गाहे बगाहे ये निरंकुश पशु कभी कभी सड़क पर चल रहे नागरिकों, बूढ़े और बच्चों पर आक्रामक हो काट भी लेते थे, पर  आज तो हद हो गई थी।

सभी सोसाइटी के लोगों ने एकत्रित होकर  इन आवारा पशु प्रेमियों के विरुद्ध मोर्चा खोल इन गली के कुत्तों को बिरयानी परोसने वाली संस्था के कर्मचारियों को घेर लिया। उसके इस तरह आवारा कुत्तों को भोजन खिलाने पर आपत्ति की। स्वाभाविक था इन्ही सोसाइटी मे रह रहे पशु प्रेमी भी हल्ला गुल्ला सुन उस संस्था के कर्मचारी के पक्ष मे खड़े हो गये। "पशु के साथ नैतिक व्यवहार" कानून "पेटा"  के पक्षधर लोगो ने न्यायालय एवं "पेटा"  (प्युपल  फॉर द एथिकल ट्रीटमंट ऑफ एनिमल) कानून का हवाल दे अपने अधिकार के पक्ष मे आवाज उठाई और घर से लाये बिस्कुट, रोटी और कुत्तों को खिलाने वाले बिस्कुट के साथ आमने सामने हो गये। पशु प्रेमी संस्था के कर्मचारी की बाइक पर रक्खी  बिरयानी की खुशबू सूंघ आवारा कुत्ते भी उसके आसपास एकत्रित हों बिरयानी की चाह मे भौंक रहे थे मानो भोजन के अधिकार के लिए अपनी आवाज बुलंद कर रहे हों। इन आवारा कुत्तों की आक्रामकता से तंग आये लोगो ने कर्मचारी को कुत्तों को खाना खिलाने से रोका। कहा सुनी बढ़ती जा रही थी। कोरोना काल मे इस तरह हुल्लड़ मचाती भीड़ को देख किसी ने पुलिस को हंगामे की सूचना दी। इस कहासुनी के बीच 40-50 लोगो के एकत्रित होने की सूचना पर पुलिस तुरंत हरकत मे आयी और स्थिति का जायजा लिया। लेकिन आज तो लोग कुत्तों की इस आवारागर्दी पर कुछ स्थायी समाधान करने के मूड मे थे।

सड़क पर चल रहे इस हंगामे को नंदू भी अपनी झुग्गी से देख रहा था जो घटना स्थल के  निकट ही थी। निपट निरक्षर, नंदू और उसकी घरवाली, "छोटी" अपने बच्चों  के साथ इन्ही सोसाइटी मे लोगो के घरो पर वर्तन धोने और घरेलू काम कर अपना गुजर बसर करते थे। पिछले लगभग एक साल से उनके हालत कोरोना की बजह से ठीक न थे। लोगो ने कोरोना फैलने के डर से घरों मे काम कराना बंद कर दिया था। किसी तरह मांग-चूंग कर गुजर-बसर हो रही थी।  कभी कभी भूखे  रह फाँके करने की नौबत भी आ जाती थी। नोएडा जैसे नगर मे बिना  काम-धंधे के जीवन यापन कठिन था फिर इस कोरोना ने तो उनकी कमर ही तोड़ दी। यातायात के सभी बंद साधनों ने उन्हे कहीं का नहीं छोड़ा था। सरकार के "आश्वासनों" से तो उनकी झुग्गी मे धन्य-धान के पर्याप्त भंडार भरे थे पर यथार्थ के धरातल पर उनको खाने के लाले पड़े थे। मई-जून की भरी दोपहरी मे चाह कर भी छोटे बच्चे के साथ वह अपने गाँव को पलायन की हिम्मत न दिखा सका और अनुकूल समय के आने का इंतज़ार कर रहा था। नंदू ने अपने गाँव मे कुत्तों के लिये आदमियों के बीच ऐसी कहासुनी कभी नहीं देखी  थी। सूखी रोटी दे उसने कुत्तों को पूरी बफदारी के साथ गाँव की चौकीदारी करते देखा था। इन आवारा कुत्तों को सुबह-शाम बिरयानी खाता देख उसे ईर्ष्या होती कि काश उसे भी कभी थोड़ी बिरयानी मिल जाती!! मन मे चल रही इसी ऊहा-पोह की अकुलाहट मे अचानक ऊंची आवाज के हो हल्ले ने उसका ध्यान भंग कर दिया।

उसका ध्यान पुनः भीड़ की ओर गया। नंदू बैसे था तो निपट कुपढ़ और निरक्षर पर  रहवासियों, पुलिस और लोगो के एक एक कदम को बड़े गौर से देख और सुन रहा था।  पुलिस के अनुरोध के बावजूद दोनों पक्ष मानने के तैयार नहीं थे। कुछ "पेटा" कानून का बार बार हवाला दे पक्ष मे खड़े थे तो कुछ आये कुत्तों द्वारा बच्चों, बुजुर्गों को काटने से तंग इन आवारा कुत्तों का भोजन खिलाने का विरोध  कर रहे थे।  मामला कुछ गंभीर हो गया था। अंततः अचानक पुलिस शांति बनाए रखने दोनों पक्षो के कुछ लोगो और पशु प्रेमी संस्था के कारिंदे  को भी  गाड़ी मे बैठा थाने ले गयी और दूसरे रहवासियों को लाठी फटकार अपने अपने घरों मे बापस भेज दिया।  लठियों की आवाजों के बीच कुत्ते भी नदारद थे पर बिरयानी का थैला बाइक पर यथास्थिति लटका हुआ था। नंदू ने भी लोगो की निगाहों से बचते बचाते झुग्गी से निकल संस्था के कर्मचारी की बाइक पर टंगे बिरयानी के झोले को चुपके से निकाल  झुग्गी की ओर लपका।

बिन मांगे "बिरयानी" की आज उसकी मुराद जो पूरी हुई थी। सारे परिवार के साथ उस रात जम कर  बिरयानी का रसास्वादन करते हुए दावत उड़ाई। बैसे राजू था तो कूपढ़ पर भीड़ मे बार-बार जब पशु प्रेमी प्रभावशाली ढंग से "पेटा" कानून  का हवाला दे विरोधियों पर आक्रामक तरीके से अपनी बात कहते सुना तो उसके मन मे "पेटा" के प्रति सम्मान और सकारात्मक भाव की  छवि  थी। "पेटा" के बारे मे बहुत ज्यादा कुछ पल्ले न पड़ने के बावजूद  उसने  अपना निष्कर्ष पत्नी से यूं कहा, "भली मानुष" देख, "कचहरी (कानून) हम गरीबों का कितना ध्यान रखती है"। वो क्या कहते है "पेटा", हाँ, "पेटा" कानून यदि कचहरी न बनायी  होती  तो आज स्वादिष्ट  बिरयानी खाने को न मिलती!! पेटा तो हम गरीबों की सुधि लेने के लिये ही बना अन्यथा हम लोगो को कौन पूंछने वाला था।

अनजाने मे ही सही नंदू ने महानगरों के रहवासियों से "पशुओं के साथ सा "नैतिक व्यवहार" की अपेक्षा गरीबों के साथ भी करने का संदेश तो दिया ही  थी।                

विजय सहगल

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