शनिवार, 17 जुलाई 2021

पहली हवाई यात्रा

"पहली हवाई यात्रा"





1986 मार्च या अप्रैल की बात थी।  मै उन दिनों ग्वालियर शाखा मे पदस्थ था। प्रोन्नति हेतु दिल्ली मे टेस्ट होना था। ग्वालियर शाखा से मै और मेरे मित्र श्री अजय गुप्ता को टेस्ट मे शामिल होना था। उन दिनों ग्वालियर से एयर इंडिया की एक फ्लाइट ग्वालियर से दिल्ली जाती थी। हम दोनों ने तय किया कि क्यों ने दिल्ली तक की यात्रा हवाई जहाज से की जाये। सरकारी यात्रा थी किराया तो ट्रेन के प्रथम श्रेणी का ही मिलना था, यही सोच कर कि अब तक हवाई जहाज से कभी  यात्रा नहीं कि तो क्यों न कुछ पैसा जेब से लगा यात्रा का आनंद लिया जाये? इसी विचार के साथ पढ़ाव स्थित एयर इंडिया के कार्यालय से हवाई जहाज का टिकिट कटा लिया गया।

नियत तिथि पर हम लोग ग्वालियर के हवाई अड्डे पर पहुंचे। ज्यादा हवाई यात्रा के नियम कानून की जानकारी तो थी नहीं। सुरक्षा जांच और सामान आदि की जांच के बाद बोर्डिंग पास भी बन गया। जानकारी के आभाव और  अपने श्रेष्ठता भाव की ऐंठ मे यात्रियों की लाइन मे सबसे पीछे हो लिये। जब हवाई जहाज मे प्रवेश किया तो मामला बिलकुल ही अलग था। हम और हमारे मित्र श्री अजय गुप्ता जी सबसे अंत मे आये तो सीट तो दो खाली थी लेकिन दोनों ही अलग अलग काफी लाइन के अंतर पर थी। खिड़की और सीट के बीच की दूरी आज के कोरोना महामारी की तरह दो गज की  दूरी!! अब तो बड़ी कोफ्त हुई। हमने तो  सोचा था पहली हवाई यात्रा है खिड़की वाली सीट मिल जायेगी पर यहाँ तो लाइन मे सबसे पीछे आने के कारण खिड़की तो दूर अगल बगल की सीट भी न मिली। रेल यात्रा की बड़ी याद आयी  कि धक्का मुक्की या खिड़की से रुमाल, अखबार, बैग आदि खिड़की से फेंक कर ही सीट पक्की हो जाती थी। वाह रे हवाई यात्रा ट्रेन से चौगुना किराए के बाबजूद दोनों मित्र अलग अलग बैठे थे। मालूम  होता ऐसी हवाई यात्रा होगी   तो लाइन मे सबसे आगे न चलते? और झपट कर ट्रेन की तरह खिड़की वाली सीट न ले लेते? चूंकि आखिरी गंतव्य की यात्रा थी जो यात्री ग्वालियर उतरे उनकी अनुकूलतम सीटों पर पूर्व मे ही यात्रा कर रहे यात्रियों ने अपने मन माकिफ सीट ले ली और जो बची थी उन पर भी लाइन मे पहले चल रहे यात्रियों ने कब्जा कर लिया था।  मन मार कर दोनों मित्र अलग अलग बीच बाली सीटों मे दो यात्रियों के बीच मन मार कर बैठ गये। पैरा शूट, ओक्सिजन मास्क, आपात स्थिति मे पानी मे फिसल कर उतरने के निर्देश की औपचारिकता ने तो डरा ही दिया मानों जहाज पानी मे ही उतारने का निर्णय कर चुका हो। खिड़की की सीट न मिलने के कारण मन तो खिन्न था ही इतने मे विमान परचारिका ने कुछ टॉफी रुई आदि प्रस्तुत की उनके ग्रहण करते ही मैंने अपने मन की भड़ास निकाल ही दी और कहा "मैडम, सिनेमा हाल मे फ़र्स्ट क्लास का 3 रूपये का  टिकिट भी लो तो मन पसंद सीट न मिले पर साथ साथ बैठने को तो मिल ही जाता है पर यहाँ तो चार सौ खर्चने के बाद भी हम दोनों मित्रों को आप लोग खिड़की की सीट तो छोड़िये अगल बगल की सीट भी न दिला पाये?        

जैसे तैसे मन को ढांढस बंधाई। और दोनों यात्रियों के बीच ऐसे बैठा जैसे कबीर दस जी ने अपने दोहे मे उल्लेख किया था "दो पाटन के बीच मे ......."। हमे याद है दैनिक आवागमन मे हमारे एक मित्र डेढ़-दो रूपये का अङ्ग्रेज़ी अखबार महज इसलिये खरीदते थे कि अखबार के पन्ने सीट साफ करने, अखबार बिछा कर खाना खाने  आदि के उपयोग करने या गाड़ी के इंतज़ार मे  प्लेट फॉर्म पर अखबार विछा सोने के काम के साथ पैसेंजर ट्रेन मे यात्रा करने पर 25-30% यात्री अङ्ग्रेज़ी अखबार देख सीट खाली कर बैठने दे देते थे, अखबार-वखबार तो किसे पढ़ना होता!! यहाँ हवाई जहाज मे भी  रास्ते के किनारे की सीट वाले से तो क्या सारोकार पर खिड़की की सीट वाला सहयात्री तो और महान निकला यात्रा शुरू होते ही मुफ्त मे मिले अँग्रेजी अखबार को  फैला कर पढ़ने बैठ गया और मेरी खिड़की से बाहर देखने की रई-सई कसर भी  अखबार को खिड़की के सामने पसार कर पढ़ने से जाती रही। अब तो खिड़की से बाहर का दृश्य न देख पाने से अपना भी सब्र जाता रहा और आखिर उन सह यात्री महोदय से हमने कह ही दिया "श्रीमान मै पहली बार हवाई यात्रा कर रहा हूँ कृपया या तो आप अखबार खिड़की के सामने से हटा ले अन्यथा आप कृपया बीच वाली सीट पर स्थान ग्रहण कर अपने अखबार पठन-पाठन का शौक पूरा कर ले? लेकिन सहयात्री भी कम घाघ नहीं था उसने अखबार को तो खिड़की से हटा लिया पर खिड़की छोड़ने की औपचारिकता तो दूर चेहरे पर खिड़की छोड़ने के भाव भी न आने दिये। बाद मे मुझे लगा शायद मेरी तरह वह भी पहली बार खिड़की चापने की लालसा से ही हवाई यात्रा कर रहा हो? और दिखावे के लिये अखबार पढ़ने का अभिनय कर अपने आपको संयत कर रहा हो?

बैंक की सर्विस के 2-4 साल ही हुए थे। मन ही मन पहले तो 20-25 मिनिट इंतजार किया कि शायद कुछ सौजन्यता या मानवता वश वह हमे खिड़की की सीट ऑफर कर देगा पर ऑफर करना तो दूर बीच बीच मे पुनः अखबार पढ़ कर या आँखें बंद कर झपकी मार खिड़की झपटने के अपने वीरोचित कृत पर, इतरा कर मानो हमे चुनौती दे  रहा हो? मै भी अपनी पहली हवाई यात्रा को इस तरह निष्फल होते देख मन ही मन कुढ़ रहा था। हमे खिड़की वाली सीट न ऑफर करने के कारण सहयात्री का ये व्यवहार दुनियाँ का सबसे निर्लज्ज व्यक्ति का अहसास करा रहा था और मानवाधिकार के हनन का सबसे बड़ा उदाहरण सामने घटित प्रतीत हो रहा था। आदमी अपने स्वार्थ और ईर्ष्या मे कितनी ओछे विचार रख सकता है कुछ ऐसी ही दिशा-दशा हमारी  भी हो रही थी उस समय!! बड़ी पढैया-की-पूंछ बन रहा है कही खुदा-न-खास्ता हवाई जहाज उपर नीचे हो गया तो उपर-ही-उपर निकल लेगा, खिड़की से। यहीं-की-यहीं धरी रह जायेगी खिड़की और अखबार की पढ़ाई?

उन्ही दिनों खालिस्तान अतिवादी आंदोलन पंजाब मे व्याप्त था। एक हवाई जहाज का अपहरण हो चुका था। डर लगा कही कोई आतंकवादी इसका भी अपहरण न कर ले? फिर सोचा, "अगर कर भी ले तो अफगानिस्तान जैसे सड़े-भुसे देश मे न ले जाये"? ले भी जाये तो पेरिस, लंदन जैसा कोई सपनों का शहर तो हो? अगर कोई मौका आमने सामने का पड़ा भी तो दो-दो हाथ की तैयारी भी कर लेंगे? ऐसे ऊँह-पोंह मे  कब चालीस मिनिट निकल गये और पता भी न चला। लेकिन पहली हवाई यात्रा यादगार तो रही लेकिन यादें अप्रिय, अवांछित, अप्रसन्नता दायी रही थी। आनंद दायक हवाई यात्रा वृतांत फिर कभी।

विजय सहगल       

      

 


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