"देशी और बाहरी"
उन दिनों भोपाल एवं छत्तीसगढ़, भोपाल प्रादेशिक कार्यालय के अंतर्गत ही आते थे जहां अधिकारी और कर्मचारियों का आपसी सद्भाव, मेल मिलाप बेमिसाल था, इस एक बहुत बड़ी खूबी के कारण भोपाल रीज़न को देश के अन्य रीज़न से अलग रखा जाता रहा था। जिसकी मुख्य बजह अधिकारी-कर्मचारी संगठन के नेतृत्व कारी साथियों का आपसी समन्वय, सद्भाव और उनकी टीम भावना थी जो कुछ कमियों के बावजूद अपने शानदार कार्यकलापों और अधिकारी कर्मचारी संगठनों मे सामंजस्य रख परस्पर आपसी सहयोग और सौहार्द को बनाने मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती थी।
उन दिनों हर साल बदल रहे प्रादेशिक प्रबन्धकों के बीच एक ऐसा दौर भी आया जब एक प्रमुख और कुछ अन्य अधिकारियों के आने पर कार्यालय के आपसी सद्भाव के माहौल मे अचानक परिवर्तन आया। उस दौरान प्रबंधन और अधिकारी-कर्मचारी संगठन के आपसी सद्भाव और समबन्ध पिछले दौर के सबसे निम्नतम स्तर पर थे। कार्यालय मे एक वर्ग चापलूसी और जी हजूरी की दौड़ मे अव्वल आने और उच्च अधिकारियों की कृपा पात्र सूची मे शामिल होने के लिए लालायित था। एक मुख्य प्रबन्धक वर्ग का अधिकारी जिसे बैंक के अपना ई-मेल खोलना भी गवारा न था। हजारों बिना पढे ई-मेल उसके इन-बॉक्स मे पड़े रहते। इसके विपरीत उस मुख्य प्रबन्धक ने बैंक के कार्यों के इत्तर अपने आधिकारिक ई-मेल का उपयोग वैमनस्य, गुटबाजी फैलाने, यूनियन के विरुद्ध विष वमन करने मे किया। प्रादेशिक प्रमुख की शह पर उस "महापुरुष" ने पूर्वस्थापित आपसी सद्भाव को तोड़ने मे कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। हालत इतने खराब हो गए कि उन दिनों "मूल" निवासी बनाम "बाहरी" स्टाफ के बीच शीत युद्ध शुरू हो गया। विना सिर-पैर की बातों मे अधिकारी-कर्मचारी के नेताओं की छद्म शिकायते प्रेषित की जाने लगी। इस परीक्षा की घड़ी मे तमाम ऐसे अधिकारी जो कल तक अधिकारी यूनियन मे सक्रिय थे बदले हालात मे पाला बदल तत्कालीन प्रबंधन को शष्टांग दंडवत कर उनकी शरण मे चले गये ताकि सालों से राजधानी मे जमे होने के अधिकार से वंचित न होना पड़े। उन दिनों ऐसे निर्लज्ज रंग बदलने वालों की पहचान संभव हो सकी।
प्रबंधन के दहशत पूर्ण माहौल के चलते चुन चुन कर ऐसे लोगों को जो तत्कालीन समय मे संगठन मे थे या उच्च पद प्रितिष्ठा से वंचित थे अर्थात ऐसी कमजोर कड़ियों की पहचान कर अकारण दूर दूर स्थानांतरण किए गये। ऐसा शायद संगठन के बल पौरुष और ताकत को परखने के लिए किया गया था। सांगठनिक स्तर पर कोई छोटी बड़ी प्रितिक्रिया न होने पर प्रदेश मे निरंकुश शासन हो गया। मैंने अपने 39 वर्ष के कार्यकाल एक प्रादेशिक प्रमुख द्वारा दुर्भावना के साथ ऐसा स्वच्छंद मनमर्जी पूर्ण आचरण नहीं देखा जिसने अपने अहम की छद्म तुष्टि हेतु अधिकारियों को चुन चुन कर प्रताड़ित किया गया हो। उन कुछ पीढ़ित अधिकारियों मे से एक मै भी था जिसका ट्रान्सफर प्रादेशिक कार्यालय से निरीक्षालय कर दिया गया था।
मुझे लिखते हुए कोई संशय, शक या संकोच नहीं कि ऐसे उच्छृंखल, निरंकुश माहौल बनाने की आड़ मे ऐसे पतित, पथभ्रष्ट अधिकारी अपने व्यक्तिगत स्वार्थ, आत्महित और भ्रष्ट आचरण निर्मित करना ही जिनका मुख्य उद्देश्य होता है और ऐसा ही उन दिनों हुआ भी था। उन दिनों भ्रष्टाचार की बाते पहली बार प्रादेशिक कार्यालय मे सुनी। चंबल क्षेत्र की एक शाखा मे निरीक्षण के दौरान छह सोने की गिन्नी देने की बात को खुद अपने कानों, एक ऋणी से कहते हुए सुना जब वह मेरे परिचय से अंजान प्रबन्धक के कक्ष मे उनके साथ बैठा था। उन दिनों मार्केटिंग मे लगे अधिकारियों को उच्च प्रबन्धक के लिए गिलासों का इंतजाम करने और उन गिलासों मे पानी भरने का कार्य ही उनकी मुख्य सेवा शर्तों मे समाहित था। प्रबंधन के कुत्सित कार्यों मे निरंकुश आचरण शायद संगठन के उच्च पदासीन लोगो को एक चेतावनी भरा संदेश था!! संगठन के नेतृत्वकारी साथियों के बचाव की भूमिका मे आने और कोई प्रतिरोध न करने के कारण उन दिनों रीजन मे स्वछंद एवं स्वेच्छाचारिता की चरमसीमा निर्मित हो गयी थी।
स्थानातरण पर प्रबंधन का
विवेकाधिकार होने के कारण यध्यपि
मुझे अपने ट्रान्सफर को स्वीकार करने के
अलावा कोई विकल्प नहीं था। पर स्थानांतरण सहित अनधिकृत कार्यों पर संगठन का
प्रतिरोध न होने पर सदस्यों मे मतभेद थे। मेरा मत था कि यूनियन और संगठनों को भी
अनैतिक कार्यों का विरोध, प्रतिरोध समय समय पर करते रहना चाहिये।
मेरा मानना है कि जो सेनाएँ शांतिकाल मे भी युद्धाभ्यास करती है वे सेनाएँ ही युद्ध काल मे विजयी होती है। कदाचित उन दिनों भी हमारे संगठन और यूनियन ने भी इसी नीति का पालन अनुपालन किया होता?? संगठन को प्रबंधन से हमेशा एक तय दूरी बना कर रखना चाहिए ताकि सदस्यों को ऐसा न प्रतीत हो कि संगठन और प्रबंधन एक ही सिक्के के दो पहलू है।
मेरा मानना है कि कदाचित उच्च प्रबंधन के ऐसे अधिकारियों द्वारा अपने दंभ और अहंकार की छद्म पूर्ति मे जो ऊर्जा का अपव्यय किया वह ऊर्जा यदि बैंक के विकास मे व्यय की होती तो शायद बैंक का ये हश्र न हुआ होता।
विजय सहगल


2 टिप्पणियां:
Vijay ji aap ne bilkul vastvik sthiti ko apni lekhni ke dwara prastut kiya he.Keep it up.
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