"मीडिया समूह पर आयकर की छापेमारी"
दिनांक 23 जुलाई को देश के जाने माने समाचार
पत्र "दैनिक भास्कर" समूह के कई प्रतिष्ठानों और उसके अनुसंगी टीवी चैनल
"भारत समाचार" पर आयकर विभाग ने
छापे मारी की। छापे मारी के समाचार से देश और दुनियाँ के तमाम मीडिया संगठनों ने
इस छापेमारी को "प्रेस की आज़ादी" पर हमला बताया। एक समाचार संगठन (कहाँ
का है पता नहीं) "रिपोर्ट विदाउट वर्ड्स" ने भारत मे इस तरह की
कार्यवाही तुरंत रुकनी चाहिए"। क्यों रुकनी चाहिये?
का कोई जबाब नहीं। अमेरिका स्थिति एक मीडिया समिति ने इस कृत्य की आलोचना की।
"कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स" ने भी कहा "इन जाँचों को बंद
करना चाहिये"। "इंडियन विमिन्स प्रेस कॉर्प्स" ने भी "आईटी
छापों की निंदा की!! एडिटर गिल्ड ऑफ इंडिया" ने तो चिंता जता "स्वतंत्र
पत्रिकारिता को दबाने के लिये सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल दबाब बनाने के हथकंडे
के रूप मे किया जा रहा है" जैसे शब्दों मे सरकार की निंदा की। इन सारे अदृश्य
मीडिया संगठनों ने एक दूसरे की "पीठ खुजा" एक स्वर मे मीडिया पर छापे की
निंदा के समाचार को देश के सभी समाचार
पत्रों मे मोटी मोटी हैड लाइंस मे प्रकाशित किया।
एक बात समझ से परे है कि समाचार माध्यमों पर
उनके अनैतिक कृतों पर क्यों छापे मारी नहीं करनी चाहिये?
क्या मीडिया समूह और टीवी चैनल देश के
सविधान और कानून से उपर है? किस संवैधानिक
विशेषाधिकार के तहत इन समाचार समूहों को उनके अनैतिक कार्यों मे लिप्त होने के बावजूद इनके
विरुद्ध छापेमारी की छूट मिलनी चाहिये?
क्योंकि ये समाचार संस्थान चलाते है?
विदेश समाचार संस्थानों का तो नहीं पता पर भारत मे समाचार संस्थान के मालिक तो
बहुत बड़ी बात है, मीडिया समूह का अदना कर्मचारी
भी अपने दो पहिया/चार पहिया वाहनों मे "प्रेस" लिख अपने आपको कलेक्टर से
भी ऊंचा मानता है!! ये पुलिस विभाग,
व्यापारी, नौकरशाह और आम लोगो के
बीच अपने को मीडिया कर्मी बता धौंस जमाने की कोशिश करते हुए समाज मे "विशेष
महत्व" की अपेक्षा रखते है। शायद ही विदेशी-दुनियाँ मे ऐसी हथकंडे मीडिया से जुड़े पत्रकार और संवाद दाता करते
हों!! मीडिया समूह के ये तथाकथित पत्रकार,
प्रशासनिक अधिकारियों, अपराधियों से अदलतों/न्यायधीशों की तरह ऐसे सवाल जबाब करते है जैसे कोई क्लास टीचर अपने
छात्रों से सवाल करता है और सवाल का मनमाफिक उत्तर न मिलने पर हथेली पर पाँच डंडे मार
तुरंत सजा भी देना चाहता है। फिर ये छापे मारी तो समाचार समूह के मालिकों पर की
गयी थी पत्रकारों की रिपोर्टिंग से इसका क्या लेना देना।
मध्य प्रदेश मे दैनिक भास्कर समूह की सरकार से मिलिभगत कर अपने व्यवसायिक हित लाभ
लेने की कारगुजारियों से प्रदेश के सभी नागरिक भलीभाँति परिचित है। मध्य प्रदेश के
इंदौर, जबलपुर और अन्य शहरों का तो ज्ञात नहीं पर इस समूह ने भोपाल और ग्वालियर मे मौके की सरकारी
जमीन राजनैतिज्ञों से मिलीभगत और सांठगांठ कर अपने हित साधे है जिन्हे यहाँ के
लोगो के साथ मैंने भी स्वयं देखा है। भोपाल
के मुख्य केंद्र "बोर्ड ऑफिस चौराहे" पर स्थित बहुमूल्य भूमि पर निर्मित
व्यावसायिक डीबी मॉल के इतिहास से कौन
परिचित नहीं है? बोर्ड ऑफिस चौराहे पर
स्थित इस विशाल मॉल पर कुछ साल पहले तक हमने अपनी आंखो से झुग्गी बस्ती वसी देखी
थी। किस तरह राजनैतिक नेताओं के मेल-जोल और मिलीभगत से इस बस्ती को बलपूर्वक खाली करा इस
पर भव्य, आलीशान व्यवसायिक मॉल
बनाया गया जो पूरे मध्य प्रदेश मे अपनी विशालता और भव्यता के लिये प्रसिद्ध है। प्रैस
कॉम्प्लेक्स मे स्थित इनके विशाल और भव्य कार्यालय की अलग ही पहचान तो है ही।
ग्वालियर मे रेल्वे स्टेशन के सामने दशकों
तक लोगो ने मध्य प्रदेश राज्य परिवहन निगम का वर्कशॉप को कार्यरत होते देखा।
स्टेशन के सामने स्थित इस वर्कशॉप मे परिवहन निगम की सैकड़ों बसे प्रदेश के दूर
दराज शहरों से यात्रियों को लाने-लेजाने के बाद मरम्मत और रख रखाब के लिये आती थी।
सैकड़ों मिस्त्री, हेल्पर और मेकेनिक इस
वर्क शॉप मे कार्य कर अपनी रोजी रोटी कमाते थे। सालों तक अपने सरकारी कुप्रबंधन से
परिवहन निगम कालांतर मे जब एक सफ़ेद हाथी की तरह कार्य करता रहा और जिसे इन्ही
राजनैतिक आकाओं ने इस संस्थान को मरणासन्न हालत मे ला "लाश" के रूप मे परिवर्तित
कर इसका सौदा दुर्दांत भेड़ियों से कर दिया। सरकार की लाल फीताशाही और ढुलमुल रवैये
से न केवल वर्क शॉप बल्कि राज्य परिवहन निगम भी अपनी पहचान गँवा इतिहास के कालखंड
का हिस्सा बना दिया। परिवहन निगम के हजारों कर्मचारी आज भी अपने वेतन,
भत्तों, भविष्य निधि फंड्ज के
लिये कोर्ट कचहरी के चक्कर लगा अपने भाग्य पर आँसू बहा रहे है उनमे बहुत से
कर्मचारी तो वेतन भत्तों की आश मे इस "फ़ानी दुनियाँ" से ही कूच कर गये।
ग्वालियर स्टेशन के सामने मध्य प्रदेश
परिवहन निगम के दो तरफ सन्मुख वाले इस बहुमूल्य विशाल भूखंड पर भी एक भव्य
व्यावसायिक मॉल का निर्माण किया गया है। आपको आश्चर्य होगा कि इस विशाल मॉल पर भी मालिकाना हक और कब्जा दैनिक
भास्कर समूह का ही है। सिटी सेंटर स्थित अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान,
होटल भी इस समूह के पास है।
जिस तेजी से कुछ सालों मे
इस समूह ने व्यापार, व्यवसाय और
परिसंपातियाँ अर्जित की है वो संदेह पैदा करती है। शायद ही किसी अन्य व्यावसायिक
संस्थान ने इतने कम समय मे मध्य प्रदेश मे इतनी संपत्ति अर्जित की हो!! जो
राजनैतिक नायकों और व्यवसायिक संस्थान की मिलीभगत के बिना संभव नहीं?
अगर सरकार का आयकर विभाग इस मीडिया समूह की आय की जांच करती ही तो किसी को क्या?
और क्यों? संदेह या आपत्ति होना
चाहिये?
अगर हर व्यापारिक,
मीडिया, ऊधयोगपति और राजनैतिक
दलों से जुड़े लोग इसी तरह छापे मारी की आड़ से बचते रहे और यही इल्जाम सरकार पर
लगते रहे कि ये कार्यवाही या ये छापे "राजनैतिक
दुर्भावना", "बदले की
कार्यवाही", "ईर्ष्या" और
"दुश्मनी" से प्रेरित है और अपने बचाव का इस्तेमाल करते रहे। तो क्या ये
माना जाये की देश का कानून सिर्फ गरीब और निरीह साधारण लोगो के लिये ही है??
या जिनका कोई धनी-धोरी (माई-बाप) नहीं है????
विजय सहगल



2 टिप्पणियां:
बहुत सटीक आंकलन किया है।
सटीक टिपणी ।
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