रविवार, 14 जुलाई 2019

कानून व्यवस्था- (सब कुछ ठीक-ठाक हैं)


"कानून व्यवस्था"
(अर्थात सबकुछ ठीक ठाक है)

अभी कुछ दिन पूर्व एक राष्ट्रीय राजनैतिक दल  के एक बाहुबली विधायक का विडियो टीवी पर देखा, हाथ मे तीन-तीन रिवोल्वर, एक राइफल के साथ  शुद्ध "शाकाहारी शराब" के साथ सांस्कृतिक नृत्य करते  नज़र आये। उन्हे अपने आचरण पर कुछ भी अजीब नहीं लगा। लगना भी नहीं चाहिये, जब उनके प्रदेश से ले कर अखिल भारतीय स्तर के अध्यक्षों  और शासन के सर्वोच्च पदों  पर आसीन उस दल के सज्जनों को कुछ भी  अजीब या गलत  नहीं लगा। तब इन टीवी चैनल बालों और आम जनता को क्यों कर कुछ अजीब या गलत  लगना चाहिये?? उक्त साक्षात्कार  मे विधायक महोदय ने कहा भी  "कि उनकी विधान सभा क्षेत्र के किसी मतदाता को जब उनसे कोई शिकायत नहीं हैं तो मीडिया बाले क्यों हल्ला गुल्ला कर रहे हैं"?? कितने सुंदर और उत्तम  विचार हैं  और कितना प्यार  हैं उन्हे  अपने क्षेत्र की जनता के लिये, ऐसे सेवा भावी विधायक आजकल कम ही देखने मिलते है। (बैसे भी तीन रिवोल्वर और एक राइफल देख लेने के बाद किसकी मजाल है या किस की शामत आई है  कि कोई मतदाता उनसे शिकायत करे!!) और जब रियाया की कोई  शिकायत ही नहीं है। अतः सिद्ध होता हैं हुकूमत  मे सब कुछ ठीक ठाक शांति पूर्वक चल रहा हैं। चारों तरफ ठकुरसुहाती छाई है फिर तो  "महाराज की जय हो" बनता है!!!!

सरकारों का रवैया "कानून व्यवस्था" के ऊपर  कुछ ऐसा ही होता है। कुछ लोग सरासर, खुले आम कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाते दिखेंगे, महसूस करेंगे पर जब चर्चा करेंगे  तो जबाब यहीं मिलेगा कहीं कोई लिखित शिकायत नहीं है अर्थात  सब कुछ ठीक ठाक शांति पूर्वक चल रहा हैं और "शिकायत" लिखने की हिम्मत आम जनता मे है नहीं। (क्योंकि उसने सोशल मीडिया पर महाराज का  तीन रिवोल्वर और एक राइफल के साथ सांस्कृतिक नृत्य करते तो देख ही लिया)।  "महाराज की जय हो"!!!!
देश मे कुछ क्षेत्र विशेष ऐसे है जहां की स्थिति कमोबेश  ऐसे ही हैं "तीन रिवॉल्वर और एक राइफल के साथ "भरत नाट्यम" यानि सब कुछ ठीक-ठाक शांति पूर्वक"। ऐसे ही एक बार जब मैं भोपाल मे निरीक्षण कार्यालय से भिंड शाखा मे निरीक्षण करने गया था। ग्वालियर के होटल मे ठहरा था, चूंकि रुकने की ठीक ठाक व्यवस्था भिंड मे उन दिनों नहीं थी। एक दिन शाम के 6.30-7.00 बजे शाखा से कार्य समाप्त कर मैंने भिंड से ग्वालियर के लिये बस से प्रस्थान किया। साधारणतयः लगभग 80 कि॰मी॰ की दूरी 1.30 से 2.00 घंटे मे पूरी हो जाती हैं। बस अपनी सामान्य गति से जा रही थी, सर्दी का समय था। बस छोटे गाँव कस्बो से होती हुई, जहां आवश्यक था सवारियों को उतारती या बैठाती ग्वालियर की दिशा मे सरपट जा रही थी। हम लोग भिंड के औध्योगिक क्षेत्र महाराजपुर  को पार कर गये थे, ग्वालियर 15-20 कि॰मी॰ रह गया था,   अंधेरा भी घिर गया था। महाराजपुर औध्योगिक क्षेत्र से 5-6 किमी आगे अंधेरे को चीरती एक मोटर-साइकल अचानक बस के सामने आ कर रुकी। टायरों की  ची-ची की आवाज के साथ ड्राईवर ने ब्रेक लगा के बस को झटके से रोका। सभी यात्री उनींदे थे अचानक बस के रुकने से सकपकाते हुए जागे कि आखिर क्या मांजरा है। बस अकस्मात क्यों रुकी,  ये जानने सभी उत्सुक थे। कही कोई दुर्घटना का अंदेशा लग रहा था। किसी को कुछ समझ नहीं आया। तभी यात्रियों ने मोटरसाइकल चालक से ड्राईवर की  बातचीत के बाद बस ड्राईवर को उसकी सीट से खींच कर नीचे  उतारते देखा। बस रुक गई थी मेरे सहित कुछ अन्य यात्री भी बस के नीचे उतरे तब पता चला कि मोटरसाइकल चालक ने महाराजपुर औध्योगिक क्षेत्र मे बस को हाथ के इशारे से रोका था चूंकि बस नहीं रुकी तो मोटरसाइकल चालक ने महाराजपुर औध्योगिक क्षेत्र से बस का पीछा कर बस को 5-6 कि॰मी॰ आगे रोक लिया। मोटरसाइकल चालक के  अचानक बस के सामने आ जाने से बस ड्राईवर ने इमरजेंसी ब्रेक लगा कर बस को रोका था अन्यथा बस यात्रियों की  जानमाल के साथ मोटरसाइकल चालक की  जान भी खतरे मे हो सकती थी। अब उस मोटरसाइकल चालक की  जिद थी कि बस को बापस महाराजपुर औध्योगिक क्षेत्र मे लेके  चले। उसने बस को इशारे के बाबजूद क्यों नहीं रोका? बस ड्राईवर को इस गुस्ताखी की सजा मिलेगी?  मेरे सहित अन्य यात्रियों ने उस मोटर साइकल चालक को भरसक समझाने का  प्रयास किया कि बैसे ही हम सभी यात्री लेट हो रहे थे,  उनमे से कुछ को आगे कि यात्रा के लिये ग्वालियर से  ट्रेन पकड़नी है पर बह मोटरसाइकल चालक टस-से-मस नहीं हुआ और आखिर बस को बापस 5-6 किमी मोटरसाइकल के पीछे-पीछे चला कर  महाराजपुर औध्योगिक क्षेत्र मे लेकर जाने से ही माना। चलो यहाँ तक भी ठीक होता तो चलता पर बाहुबली मोटर साइकल चालक ने बस को मुख्य सड़क से हट कर 100-150 मीटर अंदर  एक गली मे ले जाकर रोका। रात मे ये सब देख कर हम जैसे सभी यात्रियों ने चुप रहने मे ही अपनी भलाई समझी। वहाँ पर बस ड्राईवर को उतारकर एक बहुत बड़े लोहे के गेट के अंदर  चारों ओर से बंद हाते मे ले जाया गया। सभी यात्री किसी अनिष्ट की आशंका और  चिंता मे बाहर खड़ी बस मे बैठे इंतजार करते रहे। किसी यात्री ने बताया कि यहाँ इस क्षेत्र मे आये दिन बड़ी मात्रा मे असामाजिक तत्व गुंडई कर बस बालों के साथ मारपीट करते है, बगैर किराये के यात्रा करते हैं और अवैध बसूली भी करते हैं। लगभग आधा घंटे बाद बस ड्राईवर उस मोटरसाइकल चालक साथ-साथ बापस उस हाते से बाहर निकले, ड्राईवर बस की  सीट पर बैठा और उस मोटरसाइकल चालक ने अपनी मोटरसाइकल बही पर छोड़ परिचालक की सीट पर ऐसे अकड़ के बैठा जैसे कोई बहुत बड़ा युद्ध जीत लिया हो और ठाठ से बस मे  बस मालिक की तरह बैठा। बस ड्राईवर का हुलिया बता रहा था उसके साथ भी कुछ शारीरिक हिंसा हुई हो। अब तक रात के 9.30 बज चुके थे। बस पुनः ग्वालियर कि दिशा मे अंधेरे के बीच मध्यम गति से जा रही थी। मुझे रह-रह कर "जॉर्ज बर्नार्ड शॉ" का वह सदवाक्य याद आ रहा था जो कि मैं सुबह भ्रमण मे प्रायः "विविध भारती" के प्रातः भजनों के कार्यक्रम  "वंदनवार"   (6.05 बजे) के पूर्व "महापुरुषो की वाणी" मे   सुनता रहा  हूँ कि  "बहादुर ज़िंदगी मे सिर्फ एक बार मरते हैं जबकि कायर ज़िंदगी मे अनेकों बार मरता हैं" और महसूस कर रहा था हिंदुस्तान मे विशेषतः उत्तर भारत की  जनता  "कायरों" कि तरह ज़िंदगी मे अनेकों बार मरती हैं कभी बस ड्राईवर के रूप मे और  कभी आम बस यात्रियों के रूप मे क्योंकि सरकारों का तो स्पष्ट नजरिया हैं, "कहीं कोई लिखित शिकायत नहीं है अर्थात  सब कुछ ठीक ठाक शांति पूर्वक चल रहा हैं' और हम शिकायत कर भी नहीं सकते क्योंकि हमने सोशल मीडिया पर माननीय विधायक जी  का  "तीन रिवोल्वर और एक राइफल के साथ "शाकाहारी शराब" का पान करते हुये  सांस्कृतिक नृत्य" करते तो देखा ही हैं।
"इति सिद्धम" अर्थात यही सिद्ध करना था।

विजय सहगल    

2 टिप्‍पणियां:

Ashvini Mishra ने कहा…

अतिसुंदर व्यंग्य,समाज की वास्तविक सच्चाई

Ashvini Mishra ने कहा…

अतिसुंदर व्यंग्य,समाज की वास्तविक सच्चाई सत्तामद आदिकाल से चला आ रहा है!आगे भी जारी रहेगा ।