शनिवार, 6 जुलाई 2019

ORCHA ओरछा- एक शानदार सस्ता पर्यटन स्थल(म॰प्र॰)



ओरछा- एक शानदार सस्ता पर्यटन स्थल(म॰प्र॰)
 



तालों मे भोपाल ताल और सब तल्लियाँ।
रानी हैं राजकुंवर और सब रान्नियाँ ॥

बचपन मे उक्त किम्बदन्ति सुनते आये हैं जिसमे भोपाल ताल को सबसे विशाल बताया गया हैं एवं अन्य तालाबों को उसके सामने बहुत छोटा या तुच्छ बताया गया हैं  और इसी तरह  पुराने राजे-रजवाड़ों मे ओरछा की महारानी को सबसे महत्व पूर्ण स्थान दिया गया हैं अन्य राजे रजवाड़ों की  रनियों को उनके सामने तुच्छ बताया गया हैं, जिसका कारण महारानी "गणेश कुंवर" काफी धर्मपरायण और प्रजा को अपनी संतान के समान समझने के कारण इतिहास ने उक्त विशेषण से उन्हे नवाजा हैं। लगभग 400-450  साल पूर्व सन् 1542-92 के बीच  ओरछा अपने वैभव, ऐतिहासिक और धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप मे जाना जाता हैं। दिल्ली या आसपास के लोग एक दिन मे दो पुण्य लाभ इस स्थल से कर सकते हैं एक तो बेतवा नदी के किनारे बने इस सुंदर पर्यटक स्थल जो अपने सुंदर किले और राजमहलों के लिए प्रिसिद्ध हैं का भ्रमण कर सकते हैं और दूसरा बुंदेलखंड क्षेत्र का पुण्य  तीर्थ भगवान श्री राम के भव्य मंदिर के दर्शन लाभ ले सकते हैं।  देश का  ये मात्र ऐसा मंदिर हैं जहां भगवान राम को राजा के रूप मे पूजा जाता हैं, आज भी आरती के पूर्व म॰प्र॰ पुलिस भगवान राम को राजा के रूप मे सशस्त्र सलामी देती हैं।  इस सबसे सस्ते पर्यटन का मजा आप बहुत कम खर्च मे उठा सकते हैं। मैं 9 दिसम्बर 2018 झाँसी से ओरछा के लिये निकला।  ओरछा झाँसी से मात्र 18-20 कि. मी॰ हैं।  झाँसी, दिल्ली से दक्षिण जाने बाली रेल लाइन से अच्छी तरह जुड़ा हैं।  दिल्ली से दक्षिण के सभी शहरों जैसे बेंगलोर, हैदरवाद, चेन्नई, केरला जाने बाली ट्रेन झाँसी हो कर ही जाती हैं। किसी भी दिल्ली से रात मे चलने बाली ट्रेन से बहुत सबेरे आप झाँसी पहुँच सकते हैं। झाँसी मे स्नान, ध्यान कर आप तैयार हो कर अपने साधन से कार टैक्सी या शेयरिंग ऑटो से झाँसी बस स्टैंड से ओरछा पहुँच सकते हैं। घूमने के लिये सर्वोत्तम समय अक्टूबर से फरबरी के बीच हैं। रामनौमी या अन्य धार्मिक त्योहारों पर यहाँ स्थानीय लोगो की बहुत भीड़ रहती है अतः भ्रमण का  ध्यान आपकी पसंदगी या न पसंदगी पर निर्भर हैं। ओरछा बमुश्किल आधा किलोमीटर के अर्धव्यास मे स्थित हैं। ओरछा बहुत ही छोटा गाँव कि तरह का स्थान हैं वहाँ पर स्थित किले, महल मंदिर आप पैदल ही घूम सकते हैं। आप ओरछा मे स्थित बेतवा नदी मे भी स्नान का आनंद भी कुछ सावधानियों रख कर ले सकते है। कस्बे के बीचों बीच भगवान राम का प्रसिद्ध मंदिर हैं जो  सुबह 8 से 12.30  दोपहर तक हैं एवं शाम 5 बजे से रात 10 बजे तक खुला रहता हैं। एतिहासिक मंदिर के बारे मे ऐसा कहा जाता हैं लगभग 400 वर्ष पूर्व रानी गणेश कुँवर ने पैदल चलकर भगवान राम लक्ष्मण और माता सीता की मूर्तियों को अयोध्या से विधि विधान के साथ ओरछा लायी थी और मंदिर निर्माणाधीन होने के कारण उन मूर्तियों को अपने महल मे तब तक के लिए स्थापित किया जब तक मंदिर पूर्ण न हो जाए। परन्तू एक बचन के अनुसार मूर्तिया महल मे ही स्थापित रही जिसके अनुसार एक बार भगवान जहां विराजित हो जाएंगे वहाँ पर ही अडिग रहेंगे ऐसा वचन भगवान ने अयोध्या से चलने के पूर्व स्वपन मे रानी से लिया था। इसी कारण वर्तमान मे भगवान महल मे ही स्थापित है और जो मंदिर उनके लिये   बनाया गया बह आज भी  वीरान सा पड़ा हैं। जिसे लोग 7-8 मंजिल भूलभुलैया या चतुर्भुज मंदिर के नाम से भी जानते हैं जो मंदिर के बायें स्थित हैं।  नदी के किनारे ओरछा के राजाओं की  भव्य छतरियाँ हैं। मंदिर के दायें तरफ दो आयताकार लंबे खंबे ऋतु विज्ञान के प्रतीक बने हैं जिनहे "सावन-भादों" के नाम से जाना जाता हैं। इस तरफ भवन के अंदर हरदौल की समाधि हैं जिनका सम्मान पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र मे जीवित कुँवर के रूप मे किया जाता  हैं। ऐसी मान्यता हैं कि कुँवर हरदौल राज्य की जनता के हितों और रक्षा  के लिये रात मे भ्रमण करते हैं।   बुंदेलखंड मे सभी वर्ग और जतियों मे   ऐसी परंपरा हैं लड़के लड़की के संबंध तय होने पर जन्मपत्री भगवान के श्री चरणों मे रख कर लड़के-लड़की के सुखद वैवाहिक जीवन की कामना की जाती हैं।  शादी, सगाई एवं अन्य किसी भी शुभ कार्य का सर्वप्रथम कार्ड भगवान राम राजा और जीवित कुँवर हरलदौल को आमंत्रण देकर समर्पित किया जाता हैं।  मंदिर आने बाले मार्ग के विपरीत सड़क के पार ओरछा का किला द्रष्टि गोचर होता हैं। 10 रुपये के प्रवेश शुल्क के साथ किले का भ्रमण  दर्शन किये  जा सकते हैं। उक्त टिकिट पर ही मंदिर के पास की भव्य छत्रियों को देखा जा सकता हैं।  किले के एक भाग मे म. प्र॰ पर्यटन निगम का शानदार ए.सी॰ होटल हैं। बगल मे ही सीडियाँ चढ़कर जहाँगीर महल और किले के अन्य भवनों को देखा जा सकता हैं। किले की निर्माण कला अपने जमाने के वैभव की कहानी क़हती हैं। किले के बाहर चारों ओर  मंत्रियों और सेना नायकों की हवेलियाँ बनी हैं जिन्हे प्रायः बीरान और रास्ते के दोनों ओर लंबी घास से ढके होने के कारण  पर्यटक देखते नहीं हैं। वर्तमान मे उजाड़ सी  ये हवेलियाँ राजदरबार के सिपहसालारों  के महात्वता और रसूख  को दर्शाती हैं। हवेली मे प्रवेश करने के बाद आप एक बड़े से आँगन मे प्रवेश करेंगे पर बाहर निकलने मे एक बार आप जरूर भटकेंगे ऐसा मैंने महसूस किया हैं इसका मुख्य कारण इनके मुख्य दरवाजे का "L" शेप मे निर्माण हैं। चार पाँच हवेली किले के बाहर पत्थरों के  खंडों से निर्मित मार्ग से जुड़ी हैं। जिन्हे पैदल या टू-व्हीलर की मदद से घूम सकते हैं।   किले के पीछे कल-कल करती वेतवा नदी का सुंदर नजारा देखा जा सकता हैं। मंदिर के बाहर ताजी सब्जियाँ, सलाद की मूली, खीरा बहुत सस्ते मिल जायेंगे। सूखे बेर का "स्वादिष्ट भिंजोरा" आपको अवश्य पसंद आयेगा। लंच के लिये आजकल कुछ अच्छे होटल खुल गये है पर मेरी राय मे मंदिर के बाहर गरमा गरम पूड़ी विशेष तौर पर "खत्री पूड़ी भंडार" (विनोद दुआ फेम) की गरम पूड़ी गर्म आलू की सब्जी और बूंदी-मट्ठे का (रायता) "सन्नाटा" के साथ  हरी मिर्च और नीबू या आंवले के अचार ताजे हरे पत्तों की पत्तल पर पूर्णतया: भारतीय परंपरा मे  आपकी कड़क भूंख को यादगार भोजन का रूप देंगा  वह भी 40-50 रूपये प्रति व्यक्ति की दर पर। ओरछा के प्रसाद के रूप मे मिल्क-पूडिंग की स्वादिष्ट मिठाई आपका मन मोह लेगी। यहाँ पर आप बहुत  ज्यादा आधुनिक खाने की अपेक्षा न करे। एक छोटे से गाँव मे घूमने और यदि रहने की इक्छा  है तो एक अलग ही आनंद हैं, बैसे  शाम के पूर्व आप चाहें तो बापसी मे झाँसी का किला भी घूम सकते हैं। शाम के समय दिल्ली भोपाल आदि जगहों के लिये सारी रात अनेकों ट्रेन हैं जिनसे आप ओवर नाइट यात्रा कर अपने गंतव्य को पहुँच सकते हैं। एक सस्ता सुंदर पर्यटन स्थल का भ्रमण कैसा लगा? और अधिक जानकारी के लिये आपकी सेवा मे हाजिर।

विजय सहगल   



  




















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