मंगलवार, 16 जुलाई 2019

गुरुपूर्णिमा पर स्कूल की "तिमाही रिपोर्ट"


गुरुपूर्णिमा पर स्कूल की "तिमाही रिपोर्ट"




आज क्लास को शुरू हुए 3 माह हो गये। ये क्लास उन मजदूरों के  बच्चों के लिये शुरू की  थी जो निर्माण कार्यों मे लगे हैं और लगातार 4-6 महीने मे स्थान परिवर्तन के कारण जिनके बच्चे स्कूल न जाने के कारण पढ़ाई से बंचित रह जाते हैं। ऐसे बच्चों को पढ़ाने का जो सिलसिला तीन माह पहले शुरू किया था वह आज तक जारी रखते हुए प्रसन्नता हैं।  यध्यपि इस छोटे से कालखंड को बहुत ज्यादा मानना उचित न होगा।  इस दौरान क्लास मे  बच्चों का पढ़ने मे  उत्साह और उमंग ने तथा प्रतिदिन क्लास की शुरुआत ईश्वर की प्रार्थना "इतनी शक्ति हमे देना दाता........" से करने से  मिली शक्ति और प्रेणा ने हमे हर दिन क्लास को जारी रखने मे हद दर्जे की ऊर्जा दी। हमने कुछ ही दिन मे महसूस किया कि हमे इन बच्चों के स्तर को उठा कर अपने स्तर पर लाने की अपेक्षा हमे इनके स्तर पर आने की आवश्यकता हैं, जिसके लिये हमने ओढ़े हुए छद्म पद, प्रतिष्ठा, शिक्षा के आवरण को उतरना आवश्यक समझा,  क्योंकि इनके बगैर उतारे इनके साथ बच्चों के वास स्थान, इनके वातावरण मे जाना कठिन ही नहीं बल्कि नामुमकिन था।  "जैसा देश वैसा भेष" अर्थात हमे बच्चों के "देश-काल और पात्र के अनुसार ढलना था"।  इस दौरान रास्ते मे तमाम दिक्कते आयी पर बच्चों के मुस्कराते चेहरों और उनके उत्साह ने हमे कभी निराशा को नजदीक नहीं फटकने दिया। इस दौरान हमे क्लास का स्थान  7 बार बदलना पड़ा लेकिन बच्चों के उत्साह ने मिलकर नये स्थान की तलाश को बगैर समय गवाये  तुरंत ही नये स्थान की खोज को  पूरा कर दिया।   पिछले दिनों जब यहाँ वर्षात हुई और हमे एक दिन फुटपाथ पर क्लास लगानी पड़ी पर पता नहीं उपर बाले ने किस फरिश्ते को भेजा उसने सुंदर कक्षा का निर्माण टीनशेड के साथ बच्चो के बैठने की व्यवस्था कर दी। निर्माण सड़क के किनारे सड़क से 1-1.5 फुट उपर  इस तरह कराया कि क्लास मे बरसात का  पानी न भरे। "धन्यवाद हे अनाम फरिश्ते"!! बच्चों से सुबह मिलने पर अभिवादन हमेशा "नमस्ते सर" से होता  हैं।   अधिकतर  बच्चों को स्कूल की प्रार्थना अब याद हो चुकी हैं, जब वे सब हमारे साथ  सस्वर ऊंची आवाज मे गाते है तो मन को अति प्रसन्नता होती है जो देखते ही बनती हैं।  ऐसा महसूस  होता हैं मानो "बच्चों का ईश्वर से सीधा साक्षात्कार" हो रहा हैं।  निश्छल, निस्वार्थ, निर्विकार!!

प्रायः हर बच्चे को हिन्दी वर्णमाला याद हो चुकी है बगैर रटंत विध्या के, घुमा फिरा कर, उल्टे सीधे पूंछ कर हर दिन की परीक्षा मे  बच्चों से वर्णमाला पूंछी जाती हैं। गिनती का पढ़ना बही पुरानी पध्वति के अनुसार रटने की स्टाइल मे जारी हैं। उनसठ, उनहत्तर, ऊन्यासी, नवासी मे बच्चे अभी भी कन्फ्युज हैं, प्रयास जारी है। लिखने मे चाहे वर्णमाला हो या गिनती बच्चे जी चुरा रहे हैं जिसका मुख्य कारण क्लास मे ब्लैक बोर्ड और स्लेटस की कमी लगती हैं। ब्लैक बोर्ड इस अस्थाई कच्ची जगह मे बन पाना  शायद संभव नहीं। बीच बीच मे जब कभी   लेप-टॉप से  बच्चों को "मछ्ली जल की रानी हैं......" या "नानी तेरी मोरनी को मोर ले गये......" के  विडियो दिखाते हैं   तो  बच्चे बहुत खुश होते हैं।  प्रयास है ऐसे कुछ और विडियो मिले तो बच्चों का क्लास के प्रति आकर्षण और बढ़ेगा। अभी पिछले 8-10 दिन से "एबीसीडी" का चार्ट भी लाये है पढ़ने, बोलने का प्रयास शुरुआती चरण मे हैं। कुछ बच्चे इस प्राइमरी शिक्षा से उपर के है, उनकी ये शिक्षा उन्होने अपने गाँव मे कर ली थी अतः इन  बच्चों को जो तीसरी, चौथी कक्षा मे जाते थे उनको गणित के सवाल "जोड़ना-घटाना" दिये जा रहे हैं उनमे से कुछ पारंगत और निपुण है पर  कुछ "हासिल" के जोड़ना-घटना के सबालों मे  भ्रमित हैं, पर कॉपी चेक कराना और उस पर "good" लिखवाना नहीं भूलते। उनका ये वर्ताव अच्छा लगता है, जिससे शायद हम बचपन मे प्रायः कहीं वंचित रहे।

बच्चे प्रायः धूल-धूसरित रहते हैं पर सफाई के लिए वेहद जागरूक और चिन्तित, क्लास मे प्रातः 10 बजे एकत्रित होने के पूर्व कक्षा को साफ रखने की होड़ रहती हैं। अलग अलग दिन अलग बच्चे का नंबर सफाई के निरीक्षण के लिये रहता हैं। इस चाहत को देख कर सफाई के प्रति उनका आकर्षण देख कर अच्छा लगता हैं। सफाई निरीक्षण करने बाले बच्चे के प्रति प्रार्थना के बाद सभी बच्चे एक साथ उस बच्चे का नाम लेकर उस के प्रति क्रतज्ञता-धन्यवाद ज्ञापित कर कहते हैं जैसे "थैंक यू राकेश भैया" या "थैंक यू निशा" या इमरान, सोनू, परवीन आदि आदि।  अभी तक 35 के लगभग बच्चे पंजीक्रत हुए है पर कुछ बच्चे अपने माता-पिता के साथ अपने घर या किसी नये  शहर मे मजदूरी करने चले गये, "कभी न बापस आने के लिये"।  लेकिन उनकी मीठी यादें हर दिन क्लास मे उनका साथ होने का अहसास कराती है जब उनका नाम  हाजरी रजिस्टर मे बुलाया जाता हैं। इन बच्चों के लिये कोई दिन विशेष हो जाता जब कोई अनाम व्यक्ति अपने जन्मदिन या यूं ही कुछ खाने की वस्तु चॉकलेट, या फल उनको वितरित कर उनके चेहरों पर कुछ अतरिक्त खुशी ला देते हैं।

क्लास मे आती हर दिन कोई एक नयी समस्या, नया संघर्ष, नयी कठिनाई पर बच्चों की मुस्कान, उत्साह और उमंग, तो मानो तैयार बैठे है उस समस्या-संघर्ष-कठिनाई को बल पूर्वक चुनौती देकर परास्त करने के लिये, बताने के लिये, कहने के लिये कि "हमसे टकराना मत" "क्योंकि कि हम है, "अपराजित योद्धा""!! 
                   

गुरु पूर्णिमा पर स्कूल के जाँबाज़-बहादुर  विध्यार्थियों को समर्पित। 

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विजय सहगल     

2 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

Sir My heart is conveying the blissful wishes for you.You are worshiping the god in real sense.

Unknown ने कहा…

विजय भाई, वंचितों को शिक्षा प्रदान करना जैसा पुनीत कार्य बिना ईश्वरीय विधान के और तुम्हारे पुरुषार्थ के संभव नहीं,चरैवेति चरैवेति