लखनऊ का ठग
मैंने
नौकरी की नई-नई शुरुआत लखनऊ से की थी। जेब मे अब कॉलेज की ज़िंदगी से हट कर 1-2 रुपये
बहुत से बहुत 10 रूपये से हट कर 50-60
रूपये तक या कभी कभी 100 रूपये भी पर्स मे पहली बार देखे थे। जब आर्थिक रूप से स्वतंत्र
हुए तो कुछ खर्च करने की भी आजादी मिली। ये जानते या सुनते हुए
भी "कि लालच बुरी बला" आदमी लालच मे फंस
ही जाता हैं। जब तक पैसे नहीं थे तब तक कभी ज्यादा लालच भी नहीं आयी थी। उन दिनों मे
मै प्रादेशिक कार्यालय लखनऊ मे था। श्री पवन शर्मा जी उन दिनों लखनऊ प्रादेशिक
कार्यालय मे वरिष्ठ प्रवंधक थे। लंबे चौड़े व्यक्तित्व के धनी बैसी ही बुलंद आवाज
और उतनी ही रौब दार मूंछे एक आदर्श प्रभावशाली व्यक्तित्व। एक दिन एक व्यक्ति सुबह
ऑफिस खुलने के बाद 11 बजे लगभग शर्मा जी को पूंछता हुआ आया। मैडम किरण और पैरी
साहब जैसे बरिष्ठ अफसर से उसने बात की। उस दिन दुर्भाग्य से शर्मा जी छुट्टी पर
थे। जैसा कि कार्यालयों मे रिबाज़ हैं सौजन्यता बस इन लोगो ने उसके आने का प्रयोजन
पूंछा। तब उसने बताया कि मैं शर्मा जी का मित्र हूँ उनको राशन कि सस्ती चीनी
दिलाने आया था, मेरी उनसे बात हुई थी।
उन दिनों राशन की चीनी और बाजार के भाव मे दुगने से भी ज्यादा का अंतर था। उसने
बताया कि उसकी राशन दफ्तर मे जान पहचान हैं और शर्मा जी हमारे परम मित्र हैं। हाल
मे बैठे कुछ स्टाफ ने जब ये सुना तो आपस मे कानाफूसी कर उससे पूछा क्या हमे भी राशन की सस्ती चीनी मिल सकती हैं तो तपाक से उसने कहा क्यों नहीं आप
लोग भी शर्मा जी की तरह हमारे मित्र हैं आप सभी उनके स्टाफ के लोग हैं इतना तो हम
कर ही सकते हैं। अब तो जैसे चीनी लेने बालों की न केवल लाइन लग गई बल्कि चीनी की
ज्यादा से ज्यादा मात्रा लेने की होड़ भी लग गई। हम जैसे हमारे अन्य साथी जो अकेले
थे इस लालच के जाल मे फंस गये और सभी ने 10-10
किलो चीनी की फर्माइश उस सक्स से कर दी।
हमारे साथी अनिल भटनागर, संतोष
श्रीवास्तव, सक्सेना जी,
मेडम खरबन्दा आदि ने भी किसी ने 5 किलो तो
किसी ने 10 किलो चीनी की मांग कर डाली। अब तक तो ये चीनी की लालच का रोग सबको लगता
जा रहा था। हमे ध्यान हैं इस जाल मे अवस्थी जी,
किरण जी, पैरी साहब,
मूर्ति साहब, जीबीवीटी शर्मा,
खोसला जी, महात्मा जी आदि ने भी चीनी की अच्छी ख़ासी मात्रा मे लेने की इच्छा
जताई। हो सकता हैं कुछ नाम मै भूल रहा हूँ। अब क्या था लिस्ट बना कर सबसे पैसे एकत्रित किये
गये। पर सबके दिल मे एक ख्याल
अंदर-ही-अंदर आ रहा था, "कही धोखा
धड़ी या फ़्राड का मामला तो नहीं है",
ऐसा सोच कर उस अंजान व्यक्ति के साथ दो "चतुर सुजान" को भेजने का निर्णय
लिया। बह चालाक व्यक्ति भी विश्वास दिलाता जा रहा था कि पैसा आप ही अपने पास रखे,
मै मात्रा के अनुसार चीनी को बोरे मे डाल
कर चीनी भेज दूँगा और आप लोग आपस मे अपनी
अपनी चीनी बाँट लेना। अब "चतुर सुजान" के रूप मे मेरी और अनिल भटनागर जी
की पहचान की गई कि ये दोनों उस व्यक्ति के साथ जाएंगे। हम
तीनों लोग एक रिक्शा मे बैठ कर उस व्यक्ति के साथ चल दिये। हमे याद है रिक्शा से
हम लोग केसर बाग हो के बरादरी कि तरफ गये थे। रास्ते भर बह व्यक्ति लोगो को
नमस्कार-आदाब हैलो करता जा रहा था। हम और भटनागर
को भी लगा "ये व्यक्ति तो बड़ा सामाजिक और प्रसिद्ध जान पड़ता है! कितने लोगो से इसकी जान पहचान
हैं।
कुछ
ही देर मे हम लोग एक बड़ी बिल्डिंग मे पहुँचे जिसका नाम तो हमे याद नहीं पर जिस जगह
हम पहुँचे बह एक बड़े राष्ट्रीय राजनैतिक
दल का कार्यालय था। वहाँ जाते ही उसने हम दोनों को एक जगह बैठाया और वहाँ पर उपस्थित
सभी लोगो से बड़े गर्म जोशी से बात करता
रहा। हम लोग तो पूरे रास्ते उसके व्यवहार को देख चुके थे,
उसका यहाँ भी सबसे मिलना जुलना देखते रहे। हम लोगो को अब बिलकुल यकीन हो गया था कि
यह व्यक्ति राजनैतिक रसूख बाला व्यक्ति हैं और अवश्य ही चीनी दिलवा देगा। अचानक वह हम दोनों के पास आया और बोला कि आप लोग
यही बैठो हम चीनी लेकर आते हैं और चीनी की
मात्रा के हिसाब से उसने पैसे ले लिये। उसके प्रभाव के जादू के कारण हम लोग उसे पैसा देने से इंकार न कर सके।
जब काफी इंतजार के बाद भी वह व्यक्ति नहीं
आया तो हमे दाल मे कुछ काला लगा। हमने कार्यालय मे उपस्थित एक दो लोगो से उस
व्यक्ति के बारे मे पूंछा वो कौन सज्जन थे जो आप से अभी बात कर रहे थे,
तो उन्होने जबाब दिया हम तो उन्हे नहीं जानता,
बो तो बात कर रहा तो हम सहज ही उसे जबाब दे
रहे थे। तब हमने उन्हे चीनी ठगी का सारा किस्सा सुनाया तो वहाँ पर उपस्थित
सभी लोग आश्चर्यचकित थे। वे लोग कोई भी उसे नहीं जानते थे,
वे बोले यूं भी ये राजनैतिक कार्यालय है अनेकों लोग आते जाते रहते हैं,
बात करते या बैठे रहते हैं। अब ये पक्का
हो गया था कि हम सभी उस ठग के ठगी का शिकार हो गये थे। अब कुछ भी उम्मीद शेष नहीं
थी। हम दोनों ने बापस ऑफिस के लिये रिक्शा पकड़ा। ऑफिस मे सभी लोग हम दोनों का
इंतजार ही कर रहे थे। मे सभी साथी भी हम
लोगो के लिये चिन्तित थे। जब हम लोगो ने पहुँच कर ऑफिस मे सभी को हुए हादसे के
बारे मे बताया तो सभी आश्चर्य मिश्रित
चिंता और हंसी के बीच अपने को लूटा पिटा महसूस कर रहे थे। कुछ समय तो सभी अवाक होकर चुप
थे पर इस बात से खुश थे ज्यादा पैसों से नहीं लुटे। जब शर्माजी बापस आये और सभी ने
उन्हे मज़ाक मे उलहना दिया कि आपका कोई जानने बाले "मित्र" हमलोगो के साथ
ठगी कर गया। पूरा किस्सा सुन कर उन्होने भी अट्ठ्हास किया। उक्त घटना के किस्से कई
दिनो तक प्रादेशिक कार्यालय और अमीनाबाद,
हजरतगंज शाखा मे सुने-सुनाये जाते रहे। कॉलेज लाइफ के बाद हमे और अनिल भटनागर को
अहसास हुआ कि हम जो अपने को बड़ा तीसमरखाँ "चतुरसुजान" समझते थे उस लखनऊ के ठग
के सामने कच्चे खिलाड़ी साबित हुए।
विजय सहगल

2 टिप्पणियां:
Ati sunder
Very nice description
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