"बचपन
के दिन "
बचपन
की
यादें।
भूली-विसरि
बातें॥
वो
किस्से कहानी।
जो याद
है जुबानी॥
"लू-लपट", दिल लागे
ठंडा।
भरी
दोपहरी, गिल्ली डंडा।
गुच्चू, पिद्दू , लाल नापना
पिदा-पिदा
के हाड़ तापना॥
डंडे
पर गिल्ली को ताना।
चुन्नू
का था गज़ब निशाना॥
एक
बार, जब धाम गंवा दी।
धाम
दुबारा कसम चढ़ा, ली॥
"खो-खो"
मे भागे और आये।
"आइस-पाइस"
मे छुपे छुपाये॥
कंचे
"गल्ल" मे खूब निशाना।
लूट, मार "बंटों"
का खजाना॥
"चंदा-पउवा", "कट्टस
- विंदी"।
खेल
जमीं पर नहीं थी गिनती॥
"कैरम"
सफ़ेद और काली गोटें।
पाने
"रानी", सब लड़े
लपोटें॥
ताश
के पत्ते, जद् न जद्दू।
बड़ी
अजब थी "भद्द" की भद्दू॥
"सीप", "कोट-पीस", के क्या कहने।
हारने
बाला
"कोट" को पहने॥
"माँझे"
और "सद्दे" की "चरखी"।
पतंग
उड़ाना "कला" थी परखी॥
बाँधके
"कन्ना" पतंग उड़ाना।
पतंग
उड़ाके "पेंच" लड़ाना।
पेंच, पतंग का फाटम-फाटा।
कटी
पतंग चीखें "वो काटा"॥
हरे, गुलाबी
लाल "चपेटा"।
हाथ
एक से, सबै समेटा॥
लंगड़ी, गिप्पी, गैणी गानी।
मछ्ली-मछ्ली
कितना पानी।
छुक-छुक
दानी।
बड़े
घर जानी॥
भरे
"घाम" मे मुन्नी-मुन्ना।
खेला करते, "चूल्हा-पन्ना"॥
बीते
बचपन के दिन सारे।
आज भी
लगते कितने प्यारे॥
विजय
सहगल




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