रविवार, 28 जुलाई 2019

"बचपन के दिन "


"बचपन के दिन "



















बचपन  की  यादें।   
भूली-विसरि बातें॥  
वो किस्से कहानी।
जो याद है जुबानी॥  

"लू-लपट", दिल लागे ठंडा।
भरी दोपहरी, गिल्ली डंडा।
गुच्चू, पिद्दू , लाल नापना
पिदा-पिदा के हाड़ तापना॥
डंडे पर गिल्ली  को  ताना।
चुन्नू का था गज़ब निशाना॥  
एक बार, जब धाम गंवा दी।
धाम दुबारा कसम चढ़ा, ली॥
"खो-खो" मे भागे  और आये।
"आइस-पाइस" मे छुपे छुपाये॥
कंचे "गल्ल" मे खूब निशाना।
लूट, मार "बंटों" का खजाना॥
"चंदा-पउवा", "कट्टस - विंदी"।
खेल जमीं पर नहीं थी गिनती॥ 
"कैरम" सफ़ेद और काली गोटें।
पाने  "रानी", सब लड़े लपोटें॥   
ताश के पत्ते,  जद् न जद्दू।  
बड़ी अजब थी "भद्द" की भद्दू॥ 
"सीप", "कोट-पीस", के क्या कहने।
हारने  बाला  "कोट"  को  पहने॥
"माँझे" और "सद्दे" की "चरखी"।
पतंग उड़ाना "कला" थी परखी॥
बाँधके "कन्ना" पतंग उड़ाना।
पतंग उड़ाके  "पेंच" लड़ाना।
पेंच, पतंग का फाटम-फाटा।
कटी पतंग चीखें "वो काटा"॥         
हरे, गुलाबी लाल "चपेटा"।
हाथ एक से, सबै  समेटा॥           
लंगड़ी, गिप्पी, गैणी गानी।
मछ्ली-मछ्ली कितना पानी। 
छुक-छुक दानी।
बड़े घर जानी॥   
भरे "घाम" मे मुन्नी-मुन्ना।
खेला करते, "चूल्हा-पन्ना"॥
बीते बचपन के दिन सारे।
आज भी लगते कितने प्यारे॥

विजय सहगल

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