शनिवार, 8 अगस्त 2026

पेनुकोंडा फोर्ट-अनंतपुर, आंध्रप्रदेश

 

"पेनुकोंडा फोर्ट-अनंतपुर, आंध्रप्रदेश"













हाँ यही नाम था, पेनुकोंडा फोर्ट। थोड़ा कठिन नाम था पर गूगल ने अपनी जोरदार सिफ़ारिश मे इसे एक ऐतिहासिक, प्राकृतिक रूप से समृद्ध और शानदार सड़क निर्माण के कारण बाइकरों के लिए चुनौती पूर्ण सवारी का स्वर्णिम स्थान बताया था। यह किला अनंतपुर शहर से 70 किमी॰ और बेंगुलुरु से लगभग 150 किमी॰, शानदार राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 44 पर स्थित है। छोटे से घनी आबादी बाला कस्बा पेनुकोंडा पहले आंध्र प्रदेश के सत्यासाईं जिले मे था लेकिन जिलों के विभाजन के बाद अब अनंतपुर जिले मे स्थित है। तेलगु भाषा मे पेनु का अर्थ है बड़ी और कोंडा का अर्थ है पहाड़ या पहाड़ी जिससे इस कस्बे का नाम पेनुकोंडा पड़ा। शुरू मे इसका नाम लेना या याद रखना  कठिन था पर भ्रमण के पश्चात ये एक चित-परिचित नाम और स्थान बन गया। सन 1565 मे हम्पी राज्य के पतन के बाद विजयनगर साम्राज्य  की दूसरी राजधानी के रूप मे पेनुकोंडा का निर्माण राजा वीर विरूपन उद्य्यार ने कराया था। इस पेनुकोंडा के उजड़े हुए किले की सड़क, कस्बे के धरातल से लगभग 6 किमी॰ और पहाड़ी की ऊंचाई लगभग 2500 फुट थी। पहले  मुझे भ्रम और भ्रांति थी कि पेनुकोंडा फोर्ट कस्बा कर्नाटक मे है पर शानदार डाम्मर सड़क के निर्माण और रेसिंग बाईकरों के पसंदीदा स्वर्ग देख मुझे थोड़ा भ्रम और भ्रांति हुई क्योंकि  सड़क की शानदार आधारभूत संरचना देख सहसा विश्वास नहीं हुआ क्योंकि कर्नाटक राज्य की राजधानी बेंगलुरु शहर की सड़कों की जो हालात और दुर्दशा  देखे वो बद से बदतर हैं। बेंगलुरु शहर की आधारभूत संरचना विशेषतः सड़कें  किसी निम्नतम पिछड़े अविकसित शहर या कस्बे जैसी वाहियात और बेकार है। मेरा मिथ्याभास गलत निकला, जब मुझे पता चला कि ये कस्बा आंध्रा प्रदेश मे है।

खैर! 15 जून 2025 को  पेनुकोंडा कस्बे के प्रवेश करते ही जो सड़क पेनुकोंडा फोर्ट को जाती है की तरफ, जब हम लोगों ने कार को मोड़ा तो पीछे से करीब 20-30 बाइकर ढों....., भौ-भौ...... कर फर्राटे भरते हुए आगे निकले। ये लोग शायद बेंगलुरु से आ रहे थे। सप्ताहांत सूचना प्रौध्योगिकी के नौकर पेशा लोग, शानदार राष्ट्रीय राजमार्गों के कारण सामान्यतः  शनिवार, रविवार की छुट्टियों मे बड़ी संख्या मे पेनुकोंडा या अन्य ऐसी ही जगहों पर प्रायः घूमने, भ्रमण करने निकलते हैं।  हम लोगों ने अपनी कार को एक तरफ लगाते हुए, बाईकारों के निकलने को प्राथमिकता देते हुए कार को सावधानी पूर्वक चलाने का जतन किया। यध्यपि सड़क शानदार, पक्की और काफी चौड़ी थी, वाहनों के आने और  जाने के रास्ते सफ़ेद रंग से स्पष्टतः अंकित थे परंतु ये रास्ता पहाड़ी रस्तों से कुछ अलग था क्योंकि इस 6 किमी॰ तक की चढ़ाई मे लगभग 14 हेयर पिन मोड़ (कर्व) थे। जो वाहन चालकों विशेषतः बाइकर चालकों को रोमांच, थ्रिल और जोश पैदा करते थे। प्रायः इसी रहस्य और रोमांच का आनंद उठाने नौजवान युवा पेनुकोंडा जैसे स्थान पर बाइक को दौड़ाने आते हैं।

लगभग छः किमी॰ के इस रेसिंग ट्रैक के अंतिम सिरे पर जो कि एक सपाट रोड पर बना हैं घुम्मकड़ लोग अपने वाहनों को सड़क के दोनों किनारों पर खड़ा कर देते हैं और आगे के कच्चे मार्ग के दोनों ओर बनी पहाड़ी पर विजयनगर साम्राज्य के बीते  इतिहास को खंडहर होती इमारतों, महलों और किलों की दीवारों मे खोजने का जतन करते हैं। हम लोगों ने भी अपनी कार को सड़क के कच्चे रास्ते के एक ओर लगा कर पेनुकोंडा के ऐतिहासिक  महलों और मंदिरों को देखने का निश्चय किया। एक कम ऊंची पहाड़ी पर जिसका रास्ता पत्थरों की लंबी-लंबी सीढ़ियों से बनाया गया था और पहाड़ी के शिखर पर पत्थरों, शिलाओं और कलात्मक स्तम्भों पर बना एक ऊंचा आकर्षक महल जो मंदिर प्रतीत होता था जाने का निश्चय किया। ज्यादा रखरखाब न होने के कारण, सीढ़ियों के दोनों और पत्थरीली जमीन मे  जगह जगह जंगली घास उग रही थी। सामने पत्थर से बने मुख्य द्वार के ऊपर ध्वस्त हुई, विखंडित और उजड़ी तीन मंज़िला महल की आकृति दिखाई पड़ रही थी, दोनों मंजिलों के चारों ओर चौकोर स्तम्भों की शानदार दक्षिण भारतीय नक्काशी नज़र आ रही थी। भवन मे प्रवेश करते ही एक विशाल आयताकार  गर्भगृह था जिसकी ऊपरी छत्त आसमान की ओर खुली थी जिससे भरपूर प्रकाश पूरे परिसर मे फैला हुआ था। इस आयताकार छिद्र के उपर ही एक आयताकार सीधा सपाट पत्थर रक्खा था जो शायद इस भवन के छिद्र या खुले भाग को ढकने के लिए इस्तेमाल किया जाता होगा। इस आयताकार भवन के चारों ओर चार दिशाओं मे लंबे बरामदे बने हैं, जिनकी छत्त, नीचे  आयताकार, बीच मे नक्काशी की गयी वर्गाकार और सबसे ऊपर गोल नक्काशीदार स्तम्भों पर टिकी थी। रख रखाब के अभाव मे पूरा महल ऊबड़-खाबड़ और उजाड़ नज़र आ रहा था। फर्श के मोटे-मोटे पत्थर यहाँ वहाँ उखड़े पड़े थे। इसी  भवन के कुछ स्थानों पर भगवान बजरंगवली हनुमान, माँ धनलक्ष्मी की प्रतिमा के दोनों ओर सूंढ उठाए हाथी, नृत्य करती नृत्यांगना एवं द्वार पर बने गंधर्व की प्रतिमा भी यथोचित स्थान की बाँट जोहती नज़र आयी। शासन को चाहिए इस अद्भुत वास्तु धरोहर का समुचित रखरखाव शीघ्र-अतिशीघ्र करें।

इस मंदिर महल से नीचे उतरकर जब हम आगे बड़े तो जगह जगह किले मे स्थित महलों के अवशेष देखने को मिले जो आज भी सुंदर और लोगों का ध्यानकर्षण कर रहे थे। पानी की बावड़ी के मध्य बनी टापू के समान एक चारद्वारी आकर्षण का केंद्र थी। अपने यौवनकाल मे निश्चित ही लोगो का ध्यानाकर्षित कर विजयनगर साम्राज्य की समृद्ध विरासत को दर्शा रही होगी। इसी बावड़ी के पास बने हाथी और घोड़ों के अस्तबल के खंडहर विजयनगर राज्य के गौरव और वैभवशीलता की कहानी कह रहे थे। बापसी मे रास्ते के दूसरी ओर बनी पहाड़ी के शिखर पर बने भवनों के अवशेष दिखाई दे रहे थे जहां साधारणतः लोगों का पहुँचना संभव नहीं था।  यही नहीं इस पहाड़ी पर जहां एक ओर विजय नगर के राजाओं ने अपने शिल्प और वास्तु से समृद्ध किया वहीं प्रकृति ने भी अपना भरपूर स्नेह से  पहाड़ी को समृद्ध किया। रास्ते मे जहां तहां प्राकृतिक रूप से पत्थरों का एक के ऊपर एक रक्खे रहना, विभिन्न आकार प्रकार के पाषाणों का एक क्रम मे दिखना और भी मन को आश्चर्य चकित कर देता है। 

बापसी मे एक बार फिर से सड़क पर बने 14 हेयर बैंड कर्व से होकर रोमांचित यात्रा करने के आनंद का लाभ लेते हुए हम अपनी अगली यात्रा के लिए पेनुकोंडा फोर्ट से प्रस्थान कर गए। 

विजय सहगल                                    

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

अति सुंदर

बेनामी ने कहा…

बहुत अच्छी जगह है

बेनामी ने कहा…

Vijay me bhi Aaj kal pracheen mandiron ko dekh kar apne bhavya Itihas ko samajh raha hoon Aisse mandir duniya men kahin nahi hai Matra Bharat khand men hee hain.