"रामलिंगेश्वर
मंदिर,
ताड़ीपत्री-आंध्रा प्रदेश"
लेपाक्षि मंदिर से बापसी के समय 14 जून 2025
को हमारा,
आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले के एक छोटे लेकिन धार्मिक दृष्टि से विश्व प्रसिद्ध,
एतिहासिक मंदिरों की नगरी तड़ीपत्री जाना हुआ। 1490 और 1509 ई॰ मे विजयनगर
साम्राज्य के राजा पेम्मासानी रामलिंगा नायडू प्रथम द्वारा बनवाये गए इस मंदिर की
वास्तु शैली विजयनगर, चालुक्य और चोल
शासकों की तरह है। इस छोटे से कस्बे मे
अतिप्राचीन, पेन्नार नदी के दक्षिण
तट पर स्थित भगवान शिव को समर्पित बुग्गा रामलिंगेश्वर स्वामी मंदिर एवं भगवान
विष्णु को समर्पित श्री चिंताला वेंकटरमण स्वामी मंदिर के दर्शन का सौभाग्य
प्राप्त हुआ। तड़ीपत्री शहर के प्रवेश द्वार पर कस्बे के बाहर रामलिंगेश्वर स्वामी
मंदिर के दर्शन पहले करने का निश्चय किया क्योंकि ये ही पहले हमारे मार्ग पर पड़ता
था। दूर से ही मंदिर के गोपुरम के दर्शन हो रहे थे मंदिर के बाहर काफी बड़ा प्रवेश
मार्ग जिसके दोनों ओर कार पार्किंग की समुचित व्यवस्था थी। कार को पार्किंग मे रख,
हम लोग मंदिर की ओर बढ़े ही थे, तो मंदिर का लकड़ी
का बना मध्यम आकार का रथ मार्ग के एक तरफ रखा हुआ था जो किसी पर्व या त्योहार
मे इस्तेमाल किया जाता रहा होगा। आगे सड़क
पर ही ऑइल पेंट से सुंदर बड़ी गोल रंगोली पूरी सड़क को घेरती हुई बनाई गयी थी जो
दक्षिण भारत के घरों, मंदिरों और
धार्मिक स्थानों मे प्रायः देखने को मिल जाती है।
मंदिर के विशाल प्रवेश द्वार के बाहर और
अंदर की वास्तु निर्माण मे काफी अंतर था। बाहर की तरफ से सहारा देती बड़े बड़े
खंडों/बोल्डर की दीवार बनाई गयी थी जो
शायद पुरातत्व विभाग ने प्रवेश द्वार की ऊंची दीवारों को सहारा देने के लिए
बनाई थी क्योंकि अंदर की तरफ प्रवेश द्वार की ऊंची ऊंची दीवारों पर कलात्मक देवी
देवताओं की मूर्तियाँ के अतिरिक्त नृत्य करती अप्सराओं,
गंधर्व, नाग,
किन्नर और द्वारपालों की विभिन्न भाव भंगिमाओं की नक्काशीदार मूर्तिया,
स्तम्भ, छोटे छोटे गुंबद,
घंटे आदि बनाए गए थे। ऊंची देहरी लांघ कर जब मंदिर प्रांगण मे पहुंचे तो सामने ही
भगवान शिव-पार्वती का सुंदर और विशाल मंदिर दिखलाई पड़ा। बारह द्वारों के विशाल सभा
मंडप मे बारह काले ग्रेनाइट के सुंदर स्तंभों पर भी गहरी बारीक नक्काशी से गरजते
सिंहों की मूर्तियों को उकेरा गया था। सभा मंडप तक चढ़ने के लिए तीनों दिशाओं मे
सीढ़ियाँ बनाई गयी थे जबकि चौथी दिशा मे मंदिर के गर्भ गृह मे भगवान शिव की मूर्ति
विराजमान थी। मूर्ति का श्रृंगार स्वर्ण आभूषणों के साथ सुंदर ताजे फूलों से किया
गया था। मंदिर के पुजारी ने हमारे परिवार से शुभ संकल्प कराते हुए कुल,
गोत्र और पूर्वजों का स्मरण कराते हुए शिवाभिषेक कराया। कुछ समय सभा मंडप के एकतरफ
ध्यान लगा कर बैठना, अपूर्व आनंद और शांति
प्रदान करने का अनुभव था। काले ग्रेनाइट के वर्गाकार पत्थरों से बने फर्श पर इन्ही
पत्थरों से बने मंदिर के कुछ आगे मंदिर के प्रवेश द्वार के विपरीत दिशा मे भी वैसा
ही एक भव्य नक्काशीदार प्रवेश द्वार बना था,
बस दोनों दीवारों के बीच की क्षैतिज/आड़ी छत्त नहीं थी। द्वार की दीवारों पर वही गंधर्भ,
किन्नर और अप्सराओं की नृत्य करती मूर्तियाँ अत्यंत सुंदर और नयनभिराम थी।
पूरे मंदिर प्रांगण की प्रदक्षिणा के
दौरान लेपाक्षि मंदिर की तरह ही एक बुर्काधारी महिला का हाथ मे दूर्वा और फूल लिए
देखना आश्चर्य और अचरज का अनुभव था। मेरे लिए उस मुस्लिम महिला की सनातन धर्म मे
निष्ठा और नियत समझना कठिन था?
एक प्रदक्षिणा पूर्ण कर हम लोग मंदिर के गोपुरम
को ऊपर से नीचे और बार-बार निहारते हुए पुनः भगवन शिव की ओर अपना शीश झुकाते हुए पड़ीपत्री
के दूसरे मंदिर की ओर प्रस्थान कर गए जो वहीं पास मे स्थित था।
विजय सहगल








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