शनिवार, 29 अगस्त 2026

श्री चिंताला वेंकटरमना स्वामी मंदिर, ताड़ीपत्री-आंध्रा प्रदेश

 

"श्री चिंताला वेंकटरमना स्वामी मंदिर, ताड़ीपत्री-आंध्रा प्रदेश "










राम लिंगेश्वर मंदिर से महज एक किमी॰ दूर तड़ीपत्री कस्बे के बीच 16वीं शताब्दी मे बना  भगवान विष्णु को समर्पित बुग्गा रामलिंगेश्वर मंदिर भी अपनी कलात्मक नक्काशी और विजयनगर साम्राज्य की शैली मे बना ये मंदिर आकर्षण का केंद्र था। 5 एकड़ मे फैले इस मंदिर का निर्माण भी विजयनगर साम्राज्य के पेम्मासानी नायकों द्वारा कराया गया था। यह मंदिर भी इसी क्षेत्र मे बहुतायत मे पाये जाने वाले काले ग्रेनाइट पत्थरों से बना है। इस मंदिर का नाम चिंताला इसलिए पड़ा क्योंकि तेलगु भाषा मे चिंताला का अर्थ है इमली का पेड़, यहाँ एक विशाल इमली के पेड़ के नीचे भगवान विष्णु की मूर्ति प्रकट हुई थी। चिंताला ऊंची ऊंची दीवारों से घिरे, आयताकार चबूतरे पर बने विशाल मंदिर के सभा मंडप, गर्भ गृह जिसमे भगवान विष्णु की काले ग्रेनाइट पाषाण की भव्य प्रतिमा दर्शनीय है। मंदिर के पीछे ही काले ग्रेनाइट से बने गरुड मंडप जो कि  रथ के आकार का बनाया गया है जो ठीक हम्पी के विट्ठल मंदिर की तर्ज़ पर बनाया गया है। मुख्य मंदिर के चारों ओर पत्थरों के स्तंभों से एक बरामदा बनाया गया था। मुख्य मंदिर और इस बरामदे के मध्य एक बड़ा और खुला परिक्रमा पथ या रास्ता था जो मंदिर प्रांगण के चारों ओर था।  भारतीय पुरातत्व सर्वे विभाग द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों के रूप मे वर्गीकृत किए जाने वाले मंदिर मे से एक है।    

मंदिर के बाहर बने घास के मैदान के बीच मे एक 4-5 फुट ऊंचे पत्थर के चबूतरे पर लगभग 20-22 फुट लंबी/ऊंची और 2-2.5 फुट चौड़ी पत्थरों दो लम्बवत शिलाओं/स्तंभों  के ऊपर लगभग 6-7 फुट की क्षैतिज या आड़ी शिला रक्खी है इस पूरी आकृति को तुलाभारम कहा जाता है जहां पर भक्त और श्रद्धालु मंदिर मे अपने या परिवार के सदस्यों के बजन के बराबर अन्न, वस्त्र आदि दान देते रहे होगे।    

मंदिर के छह मंज़िला ऊंचे  गौपुरम या प्रवेश द्वार के आगे एक विशाल खुला मैदान है बीच मे बने रास्ते के दोनों ओर हरी घास के मैदानों ने मंदिर के आकर्षण मे चार चाँद लगा दिये हैं। ऐसा प्रतीत होता है नगर के सारे नगरवासी शाम के समय अपने इस भव्य और आकर्षित मंदिर की ओर चले आते हैं। हम लोग भी शाम के समय जब मंदिर मे पहुंचे तो चारों ओर बच्चे, महिलाओं और पुरुषों की भारी जमावड़ा था। बूढ़े और वरिष्ठ जन जहां तहां अपने अपने समूहों मे गुफ्तगू करते नज़र आये। इस तरह के अलग अलग समूह  हुए जहां तहां बैठे थे। मंदिर  का मुख्य  सभा मंडप काले ग्रेनाइट के सुदर  40 नक्काशीदार स्तंभों पर बना है। प्रत्येक स्तंभों पर बारीक नक्काशी से अप्सराओं, नृत्यांगनाओं, द्वारपालों की मूर्तियों को उकेरा गया था। इन जीवंत प्रतिमाओं की वास्तु बेजोड़ और अद्व्तिय है।  इन 40 नक्काशीदार खंभों पर बने सभा मंडप के दोनों ओर लंबाई मे बनी दलानों मे जगह जगह लोगों के समूह यहाँ वहाँ बैठे चर्चा करते नज़र आए। कुछ बुजुर्ग महिलाएं मंडप मे एक ओर समूह मे बैठी तेलगु भाषा मे भगवत कीर्तन और भजन गाती दिखलाई दी। इस सभा मंडप एवं मंदिर की दीवारों पर रामायण, महाभारत और भागवत पुराण के कथा प्रशगों को जगह जगह उकेरा गया है।  वहीं कुछ महिलाएं मंदिर मे चावल की खिचड़ी का  प्रसाद वितरित कर रहीं थी। हम लोगों ने भी इस चावल की खिचड़ी के इस  प्रसाद को ग्रहण किया जो गरम और स्वादिष्ट था। मंदिर मे बैठे कुछ वरिष्ठ जनों को अपना परिचय देकर संवाद करने का प्रयास किया लेकिन भाषा की समस्या के कारण बातचीत उतनी सहज नहीं रही लेकिन भावनाओं का आदान प्रदान भाषा के मुक़ाबले सरल और मिठास लिए था।  

मंदिर मे भगवान चिंतला वेंकटरमना स्वामी के दर्शनार्थ हम लोग गर्भ गृह की ओर बढ़े। एक छोटे से द्वार से होकर हम लोगों ने मंदिर के गर्भ गृह मे प्रवेश किया। मंदिर के गर्भ गृह मे भगवान विष्णु की 10 फुट ऊंची खड़ी प्रतिमा के दर्शन कर मै कृत-कृत हो गया। सुंदर नक्काशी दार प्रतिमा पर शंख, चक्र, गदा और शेषनाग की सैया बहुत ही सुंदरता से स्पष्ट ढंग से दृष्टिगोचर हो रहा था। गर्भ गृह की छत्त अष्टकोणीय  सुंदर नक्काशीदार पुष्प की कारीगरी देखते ही बनती है। गर्भ गृह मे स्थित प्रदक्षिणा पथ की परिक्र्मा कर हम लोग एक बार फिर मंदिर के प्रांगढ़ मे स्थित पीछे बने गरुढ़ मंडप अर्थात रथ के आकार के मंडप के दर्शन के लिए आ गए। यह रथ पत्थरों से बना था लेकिन रथ के पहिये, मंच उसके स्तम्भ और शिखर ऐसे प्रतीत हो रहा था जैसे यदि रथ को आगे की ओर धकेला जाय तो शायद  कुछ ही पलों मे आगे  चल पड़ेगा। यहाँ भी मैंने कुछ बुर्का धारी महिलाओं को मंदिर के अंदर प्रांगण मे और मंदिर के बाहर हरी घास के मैदानों मे बैठे देखा।  

मंदिर की एक पूर्ण परिक्रमा पूर्ण कर पुनः एक बार तड़ीपत्री मे इन दोनों मंदिर के दर्शन की पुनः लालसा लिए हम अपनी अगली यात्रा के लिए मंदिर प्रांगढ़ से आगे बढ़ लिए।  

 

विजय सहगल        

 

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