रविवार, 1 मई 2022

शे पैलेस, लेह

 

"शे पैलेस, लेह"










लेह की यात्रा मेरे सपनों का यथार्थ मे परिवर्तन की यात्रा थी। ऐसी ही कुछ मनोभाव मेरे मन मे तब उठे थे जब मैंने बर्ष 2000 मे अंडमान निकोबार की यात्रा की थी। रह रह कर प्रसन्नता और खुशी की अनुभूति मन मे उठ रही थी कि वर्षों की प्रतीक्षा के बाद दिनांक 17 सितम्बर 2021  को मुझे  अपने देश के शीर्ष मुकुट "लेह-लद्धाख" के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रातः आठ बजे दिल्ली से प्रस्थान के बाद जब लेह के निकट हवाई यात्रा मे था तो अनेकों  हिमाच्छादित पर्वत चोटियों के उपर उड़ना एवं एक जगह बर्फ से ढकी पर्वत मालाओं   के बीच सुंदर नीले पानी की झील को देखना आँखों को सुखद संदेश देता रहा। मेरी पहली "हवाई यात्रा" से मिले अप्रिय अनुभव ने लेह यात्रा मे खिड़की की उपलब्धता कराने मे न केवल मेरी अपितु समूह के सभी छह परिवारों को एक-एक खिड़की उपलब्ध करा सुखद यात्रा का आगाज़ कर दिया था। (https://sahgalvk.blogspot.com/2021/07/blog-post_17.html) लेह के छोटे पर सुंदर हवाई अड्डे पर हमारे टेम्पू ट्रेक्स के सरल और व्यवहारकुशल सारथी पुंचुक भाई ने हमारे ग्रुप का गर्मजोशी से स्वागत कर हमे हमारे गंतव्य होटल पर पहुंचा दिया। अगले पाँच दिन पुंचुक जी हमारे सारथी एवं पथ प्रदर्शक थे।     टूर मैनेजर और होटल स्टाफ की सलाह अनुसार समुद्र तल से 3500 मीटर (लगभग 11500) फुट की ऊंचाई के कारण वातावरण के अनुरूप अपने आप को ढालने हेतु पूरे दिन आराम करना उचित रहा। ऐसे विरह के क्षण ज़िंदगी मे कम ही आते है जब हम लेह को  महसूस कर सकते थे पर लेह मे होते हुए भी लेह हमे महसूस न कर सका। सलाह उचित ही थी पर जिस होटल मे हमारा प्रवास था वहाँ लंच की व्यवस्था न होने के कारण भोजन हेतु हमे मजबूरन आराम छोड़ कर बमुश्किल आधा घंटे के लिये कुछ दूर स्थित ढ़ावे मे जाना पड़ा। इतना चलना भी ग्रुप के कुछ सदस्यों को भारी पड़  गया। शाम होते होते 12 सदस्यों के ग्रुप मे लगभग 5-6 लोगो को मितली और सिर दर्द के कारण उल्टियाँ हो गयी।

पूर्व नियोजित कार्यक्रम अनुसार अगले दिन सुबह के भ्रमण के लिये जाने की तैरारी मे थे तो ज्ञात हुआ कि ग्रुप की  एक महिला सदस्य को ओक्सिजन के कमी के कारण अस्पताल मे भर्ती करना पड़ा। जो सुबह तक स्वस्थ हो कर बापस आ गई।  लेह का प्रशासन मैदानी क्षेत्र से आने वाले पर्यटकों की इस बीमारी से भलीभाँति परिचित होने के कारण सजग रहता है इसलिये जिला अस्पताल मे एक अलग वार्ड की व्यवस्था स्थायी तौर पर मैदानी क्षेत्र के पर्यटकों के लिये  कर दी गयी है।

लेह मे सर्व प्रथम सिंध दर्शन का कार्यक्रम था। नदी के दोनों ओर लाल  सीमेंट टाइल्स से पक्के घाट बनाए गए थे। सिंध नदी मे सूर्य को जल तर्पण कर सिंध जल का आचमन कर घाटों पर पैदल भ्रमण सुखद था। घाट के चारों ओर स्थायी निर्माण किया गया था जिसमे प्रति वर्ष सिंध दर्शन महोत्सव के समय काफी चहल पहल रहती है। ज्ञात हो कि महोत्सव के दौरान बौद्ध संस्कृति और लोक कलाओं का प्रदर्शन पूरे उत्साह और उमंग के साथ किया जाता है।

ऐसा कहा जाता है "शे पैलेस" जो पुरातन लेह की राजधानी थी, लेह से पाँच किमी दूर एक पहाड़ी पर अँग्रेजी के L की शक्ल मे इस महल को बनाया गया है। हमारे ग्रुप का अगला पढ़ाव भी यही शे पैलेस था।   17वी शताब्दी मे नमग्याल शासकों द्वारा निर्मित इस  पाँच मंज़िला पुरातत्व महत्व के महल, जिसकी  बड़ी बड़ी खिड़कियों की पृष्ठभूमि को सफ़ेद रंग से रंगा गया था पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र थी। महल की छत्त का निर्माण लकड़ी की बड़ी बड़ी बल्लियों के उपर स्थानीय मिट्टी की मोटी परत बिछा कर किया गया था जो महल को अंदर से गर्म रख वर्फ़ीले मौसम से बचाने मे सहायक था। महल के अंदर भगवान बुद्ध की पदमाशन मुद्रा मे शांत और सरल विशाल स्वर्ण रंग की नयनाभिराम प्रतिमा दर्शनीय थी। भगवान  के चेहरे पर स्नेह आमंत्रण और सहज सरलता के भाव को स्पष्ट रूप से पढ़ा जा सकता था। भक्तों और दर्शनार्थियों द्वारा अर्पित शीतल पेय, बिस्कुट, चॉकलेट को चाँदी के जलपात्रों के मध्य बड़े करीने से सजाया गया था। विभिन्न देशों की मुद्रायेँ दान पेटी मे दिखाई दे रही थी जो इस बात का प्रमाण थी कि दुनियाँ के अनेक देशों के धर्मावलंबी एवं पर्यटक लेह लद्धाख के प्रति कितना स्नेह और आकर्षण रखते है।  साफ सुथरे इस बौद्ध मठ मे कुछ पल बैठना शांति और सुख प्रदान करने वाले क्षण थे। मठ के उपर निर्मित किले नुमा मीनारे, ऊंची ऊंची परिकोटा मैदानी क्षेत्रों मे बने किले का आभास दे रहे थे। महल की शीर्ष मंजिल से एक तरफ हिमाच्छादित पर्वत चोटियाँ थी तो दूसरी तरफ तलहटी मे हरे भरे खेत के मैदान और उनके बीच सेव और खुमानी  के ऊंचे पेड़ महल की पृष्ठभूमि मे चार चाँद लगाने मे कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे थे। महल मे लगी बिजली की रोशनीयां इस बात की तरफ इशारा कर रही थी कि रात मे ये महल बिजली की रोशनी मे कितना आकर्षक और सुंदर लगता होगा।

यदि मैदानी क्षेत्रों से आए लोगो को पानी के गोलगप्पे दिख जाये तो उन्हे खाने के लोभसंभरण से कैसे बच सकते है? बिहार राज्य के  एक नौजवान को जब शे पैलेस के नीचे जीविकोपार्जन हेतु पानी पूरी का व्यवसाय करते देखा तो उनके देशांतर गमन के साहस और शौर्य की प्रशंसा करे बिना न रह सका। सभी सदस्यों ने गुप-चुप का भरपूर आनंद  ले उसके स्वाद  भूरि-भूरि प्रशंसा की।  

शे पैलेस के बापसी भ्रमण के बाद जब पहाड़ी से नीचे उतरे तो सड़क के पार ही लेह के स्थानीय निवासियों द्वारा खिलौने, महिलाओं एवं बच्चों  के श्रंगार के स्थानीय गहने एवं लेह के प्रतीक अन्य सजावटी सामान का विक्रय किया जा रहा था। यध्यपि इन  सारी वस्तुएँ मे मेरी  कोई विशेष रुचि न थी पर एक दुकान पर लेह के आकर्षण पशु "याक" की एक छोटी खिलौना  आकृति ने मेरा स्वतः ही ध्यानाकर्षित कर लिया। लेह के सीधे और सरल हृदय लोगो से ज्यादा व्यापार विनिमय नहीं करना पड़ा और काले बालों वाले याक का एक जोड़ा 900  रुपए मे मैंने क्रय कर लिया। मुझे ऐसे स्थानीय खिलौने पसंद है जो घर आये आगंतुकों को मेरे भ्रमण किए गए स्थान का स्वतः ही आभास करा देते है।

अथ स्वरचितम  श्री लेह गाथा प्रथमोध्याय: संपूर्णम॥                   

विजय सहगल

4 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

सु:खद यात्रा वृतांत

बेनामी ने कहा…

सहगल बहुत अच्छा लगा ।

दयाराम वर्मा ने कहा…

मेरी भी इच्छा है लेह लद्दाख भ्रमण की। देखें कब अवसर मिलता है। हमेशा की तरह यह वृत्तांत भी रोचक है।

बेनामी ने कहा…

रोचक वृतांत है सर।