"20
फुट गहरा गड्ढा"
भारत के लोकतन्त्र के सर्वोच्च सदन राज्यसभा
के सदस्य महापुरुष श्री संजय राऊत ने पिछले दिनों परोक्ष
रूप से अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदी सांसद और विधायक राणा दंपति को धमकाते हुए एक वक्तव्य दिया कि,
"किसी ने भी यदि मातुश्री की तरफ टेड़ी निगाह से भी देखा तो "20 फुट गहरे गड्ढे मे
गाड़ देंगे"!! बड़े खेद और संताप का विषय है कि सांसद जैसे प्रतिष्ठित पदासीन जिम्मेदार
राजनैतिक व्यक्ति कैसे अपने राजनैतिक प्रतिस्पर्धी को "20 फुट गहरे जमीन के नीचे
गाड़ने" जैसे गैर जिम्मेदारान धमकी दे सकता है?
एक सभ्य और प्रजातान्त्रिक देश मे कोई जनप्रतिनिधि कैसे गली छाप शोहदे की तरह किसी सांसद सदस्य/विधायक को तो छोड़िए किसी
एक साधारण नागरिक को भी ऐसी अशोभनीय भाषा मे कैसे धमकी दे सकता है?
किसी संस्था या व्यक्ति के लिए ऐसा अनुराग और
प्रीति देख, मुझे गोस्वामी तुलसीदास
की उक्त कथा याद हो आयी। कैसे तुलसीदास जी
अपनी ससुराल मे पत्नी प्रेम मे आसक्त हो भरी बरसात मे नदी मे बहती लाश को नाव समझ नदी
पार कर, खिड़की पर लटके मरे साँप
को रस्सी समझ जब रत्नावली के पास पहुंचे तो विदुषी पत्नी ने लज्जित हो ताना देते हुए
कहा:-
"अस्थिचर्म
मय देह यह,
तासौ ऐसी प्रीत।"
"नेकु
जो होती राम से, तो काहे भव भीत॥" अर्थात
मेरे
इस हाड़-मांस के शरीर मे जितनी तुम्हारी आसक्ति है,
उसकी आधी भी यदि प्रभु श्री राम मे होती तो तुम्हारा जीवन सँवर गया होता।
शिवसेना
और मातुश्री के प्रति अपनी ऐसी ही निष्ठा और समर्पण का एकांश भी,
"20 फुट गहरे गड्ढे मे गाड़ने" के अपने इस वक्तव्य को,
देश पर टेड़ी निगाह रखने वाले द्रोहीयों और दुश्मनों को चुनौती देते हुए कहा होता तो वे निर्विवाद रूप
से एक राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नेताओं की श्रेणी मे होते!! लेकिन अफसोस और दुःख है
ऐसा वक्तव्य दे कर वेशक वे शिवसेना प्रमुख के विश्वस्तों की सूंची मे तो आ सकते है
लेकिन देश और देश के नागरिकों के समक्ष उनकी छवि मात्र एक चाटुकार और चापलूस नेता से
ज्यादा नहीं हो सकती।
श्री
संजय राऊत पहले भी "उखाड़ दिया",
"गाड़ दिया" जैसे अशोभनीय कथन अपने राजनैतिक विरोधियों के लिये कह चुके है।
ऐसे अमर्यादित और असंस्कारित वक्तव्य उनका
स्वभाव बन चुका है। उम्र के इस पढ़ाव पर उनसे
संस्कारित भाषा का अपेक्षित व्यवहार अब मात्र शिवसेना प्रमुख श्री उद्धो ठाकरे ही उन की जुबान पर अंकुश लगाने
के आवश्यक निर्देश देने से ही हो सकता है। पर आज के इस राजनैतिक प्रदूषित माहौल मे
क्या उनसे ऐसे आवश्यक निर्देश की उम्मीद करना
अतिरंजना न होगी?
विजय
सहगल


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