शुक्रवार, 27 मई 2022

थिकसे मोनेस्ट्री, लेह

 

"थिकसे मोनेस्ट्री, लेह"









17 सितम्बर 2021 को जब हमारे टूर ऑपरेटर द्वारा उस स्कूल के भ्रमण कराने का कार्यक्रम था जिसका चित्रांकन आमिर खान द्वारा अभिनीत फिल्म "थ्री इडियट" मे किया गया था, लेकिन हम सभी ने एक मत से समाज को उच्छृंखल और अधम संदेश देने वाले उस दोहरे चरित्र    के पथभ्रष्ट अभिनेता के किसी भी प्रतीक को देखने की अपेक्षा शांति के संदेश देने वाले थिकसे मठ को प्राथमिकता के आधार पर देखना उचित समझा। हम लोग नहीं चाहते थे कि लेह जैसे पवित्र स्थान पर दिन की शुरुआत एक अधोगामी, पतोन्मुख व्यक्ति का स्मरण कर किया जाय। 

थिकसे मोनेस्ट्री को लेह का प्रतीक स्थल कहे तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। 15वी शताब्दी मे निर्मित इस खूबसूरत बुद्ध मोनेस्ट्री के आँगन को मैंने अनेकों बार टीवी या अन्य डोक्यूमेंट्री मे देखा था। इस वृहद प्रांगण मे लेह लद्धाख के सांस्कृतिक नृत्यों और लोक कलाओं के प्रदर्शन और धार्मिक आयोजन लेह भ्रमण करने वाले पर्यटकों के बीच काफी आकर्षक और प्रख्यात है। मुझे भी अपने समूह के सदस्यों के साथ लेह के मुख्य आकर्षक थिकसे मोनेस्ट्री के दर्शन लाभ का सुअवसर प्राप्त हुआ। लेह शहर से 19 किमी॰ दूर स्थित थिकसे मठ के प्रवेश द्वार के दोनों स्तंभों और उसके शहतीर के उपर सुर्ख लाल, नीले हरे पीले रंग से  बौद्ध शैली मे शानदार चित्रकारी देखते ही बनती थी। उपर के शहतीर पर सुनहरे रंग मे लेह की बकरी की छोटी दोनों मूर्तियाँ एक दूसरे के सामने मुंह किए बैठी थी, जिसके बीच मे शांति चक्र काफी दूर से मठ की  स्वर्ण आभा विखेर रहा था। इस महान मठ के  बाहर के बड़े  मुख्य द्वार मे प्रवेश करने, प्रार्थना चक्र घुमाते हुए मोनेस्ट्री के कार्यालय  से होकर हम लोगो ने मोनेस्ट्री की इमारत मे प्रवेश किया।  प्रवेश द्वार पर ही लेह लद्धाख पुलिस के जवान नासिर हुसैन से मुलाक़ात हुई। बात चीत मे धारा 370 के समापन से बने केंद्र शासित राज्य लेह और लद्धाख के निर्माण से वह बेहद  खुश थे क्योंकि भविष्य मे उन्हे केंद्र सरकार के वेतन मान एवं भत्ते एवं अन्य सुविधाएं प्राप्त होने वाली जो थी। मोनेस्ट्री के प्रवेश द्वार से होकर जैसे ही सीढ़ियाँ चढ़ कर मै उपर की ओर बढ़ा तो  सफ़ेद और हरे रंग की दो  शेर नुमा आकृतियों ने हमारा स्वागत किया।  जैसे ही शेरों के बीच बनी सीढ़ियों पर चढ़ा ही था तो लेह के प्रतीक मोनेस्ट्री के चिर प्रतीक्षित आँगन को देख मै भाव विह्वल हो गया। मुझे आभास नहीं था कि मै उसी  मोनेस्ट्री मे हूँ जिसकी कल्पना मैंने लेह आने के वर्षों पूर्व अपने अंतशचेतना पटल पर बना रक्खी थी। प्रांगण का सौन्दर्य और शांति से मन अविभूत हो गया।  मै कुछ देर आँगन मे भ्रमण के पश्चात एक कोने मे बैठ थिकसे मोनेस्ट्री के सौन्दर्य को एकटक निहारता रहा और कुछ पल के लिये थिकसे उत्सव के कल्पना लोक मे खो गया जो मैंने अनेकों बार टीवी पर देखा था। यहाँ यह बताना लाज़मी होगा कि लेह मे स्थित थिकसे मठ मे वार्षिक उत्सव तिब्बती कैलेंडर अनुसार नौवे माह की 17 तारीख से 19 तारीख तक मनाया जाता है जो अँग्रेजी माह अक्टूबर-नवम्बर के बीच कभी पड़ता है। आँगन के एक तरफ मोनेस्ट्री की दीवार जिस पर  सुनहरे गोल्डन कलर की पृष्टभूमि मे नीले, सफ़ेद, हरे, पीले  रंग से भगवान बुद्ध के जीवन पर आधारित जातक कथाओं को उकेरा गया था एवं जिसके पार  दूर दूर नज़र आने वाले ऊंचे ऊंचे सुनसान पहाड़ थे, वही आँगन के विपरीत दूसरी तरफ 5-6 मंज़िला इमारत जिसे बौद्ध शैली मे सुंदर तरीके से बनाया गया था और  जो देखने मे अत्यंत ही अनूठी, आकर्षक और सुंदर दिखाई दे रही थी। थिकसे मोनेस्ट्री के पंचमंजिला इमारत को निर्माण के अनुरूप    तीन भागों मे विभक्त किया जा सकता है। अँग्रेजी शब्द C के आकार मे बनी मठ की शानदार इमारत का सौन्दर्य देखते ही बनता था।

जब आँगन से चढ़कर पहले विशाल कक्ष मे प्रवेश किया तो ये एक सभा कक्ष की तरह दिखने वाले हाल की तरह ही था। बीच मे छोटा से रास्ता बनाया गया था जिसके दूसरे छोड़ पर सिंहासन पर विराजित मुद्रा मे शांति के अग्रदूत  महामहिम दलाई लामा की आदम कद कट आउट रक्खा हुआ था। जो  अपनी चितपरिचित मुस्कराती मुद्रा मे मानों हम सभी आगंतुकों का स्वागत करने को आतुर हों। ऐसा लगता है कि उक्त सिंहासन और उस पर लगे कट आउट को श्री दलाई लामा जी के थिकसे मठ मे आगमन की स्मृति मे बना कर रक्खा गया हो। मध्य मार्ग के दोनों ओर लकड़ी की चौकियों पर लाल रंग के गर्म बिछौने बिछे हुए थे जो शायद मठ के शिक्षकों, आगंतुकों और विध्यार्थियों के बैठने के लिये बनाये गये हों। इन चौकियों के पीछे भी हाल की दीवारों से सटी इसी तरह की चौकियाँ लगी हुई थी जिन पर हमारे समूह के सदस्यों ने कुछ समय बैठ कर भगवान बुद्ध का स्मरण किया। पूरे  सभा कक्ष मे  तिब्बती शैली मे रंग बिरंगी चित्रकारी दीवारों पर की गयी थी। सिंहासन के दोनों ओर देवस्थानों मे भगवान बुद्ध के विभिन्न विग्रहों को करीने से संजो कर रक्खा गया था।

उक्त कक्ष के बगल मे ही एक अन्य कक्ष मे विशाल लकड़ी के  स्तम्भों  पर आलंबित कक्ष मे अष्टभुजधारी विशाल स्याह रंग की प्रतिमा रक्खी हुई थी जिसके चेहरे और अन्य अंगों को नीले पीले सुनहरे रंगों के कपड़ों से ढाका गया था। ऐसा प्रतीत होता था मानों ये तंत्र-मंत्र विध्याध्यान का केंद्र हो। उक्त विशाल देव प्रतिमा के नीचे अन्य विग्रहों को भी रक्खा हुआ था। उक्त कक्ष मे हल्के धीमे प्रकाश मे उक्त विशाल बड़े दांतों और भयंकर मुख वाली रौद्र रूप वाली प्रतिमा  भय, खौफ और डर उत्पन्न करने वाली थी जो शायद प्राचीन तांत्रिक शिक्षा के कोई आराध्य देव हों। कक्ष के पास से ही छोटे पतले रास्ते जो उपर की मंजिल की ओर जाते थे और जो शायद मठ के कर्मचारियों, शिक्षकों और विध्यार्थियों के निवास और कार्यालय रहे होंगे और जहां दर्शनार्थियों और पर्यटकों का प्रवेश वर्जित था।  इन दोनों कक्षों के दर्शन के बाद बापस सीढ़ियों से उतरकर एक बार हम सब मठ के विशाल आँगन मे पुनः आ गये। आँगन के पार, दूसरी तरफ भी पहले कक्ष की तरह का एक विशाल भवन था। उक्त भवन मे सुनहरे रंग की विशाल बुद्ध प्रतिमा विराजित मुद्रा मे  मैत्रेय रूप मे स्थापित थी। चेहरे पर शांत भाव और सिर पर स्वर्ण रंग के मुकुट धारण किये सुंदर दिव्य और अलौकिक मुद्रा मे भगवान बुद्ध के दर्शन हृदय को कृत्य-कृत्य करने वाले थे। गमलों मे सुंदर पुष्पों और हरे भरे पौधों, चाँदी के पात्रों मे भरे दिव्य जल, शीतल पेय और बिस्कुट आदि वस्तुएँ प्रसाद के रूप मे मठ की दिव्यता को भव्यता प्रदान करने वाली थी। श्रद्धालुओं द्वारा समर्पित सफ़ेद मखमली कपड़े को जहां तहां अनुशासित रूप से बांध कर भगवान बुद्ध को समर्पित किया गया था।

बगल मे ही एक छोटे से कक्ष मे छोटी छोटी अलमारियों मे अनेकों प्रतिमाओं को संजो कर रक्खा गया था। अलमारियों के बाहर सुंदर नक्काशी की गयी थी। दीवारों पर भी पारंपरिक तिब्बती शैली की चित्रकारी जहां तहां नज़र आ रही थी। भक्तो द्वारा समर्पित शांति के प्रतीक  सफ़ेद मखमली पट्टे को यहाँ भी करीने से सजाया गया था। पूरे मठ के प्रांगण मे साफ सफाई देखते ही बनती थी। कहीं पर एक तिनका कचरा भी दिखाई नहीं दिया। मठ प्रबंधन की  इस हेतु हार्दिक प्रशंसा करे बिना न रह सका।  

एक सुंदर और सार्थक यात्रा पूरी कर जैसे ही हम लोग बाहर की तरफ बड़े ही थे कि छोटे छोटे बच्चे अपनी परंपरागत वस्त्रों मे मठ की तरफ आ रहे थे। बाल बौद्ध भिक्षुओं के रूप को देख मन आनंदित हो उठा। बौद्ध धर्म की शिक्षा ग्रहण करने वाले ये शिशु भविष्य मे देश और समाज को शांति का संदेश देने वाले शिक्षक होंगे इन्ही  मे से कोई बौद्ध धर्म के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच कर दुनियाँ को शांति का संदेश देगा।          

एक बात जो मुझे भ्रमण के दौरान हमेशा कचोटती रही  कि इन बौद्ध मठों से निकलने वाले विध्यार्थी फिर चाहे वो लेह लद्धाख, तिब्बत, बर्मा या जापान से क्यों न हों कहीं कभी कोई अतिवादी दूर दूर तक नहीं  निकलता इसके विपरीत दुनियाँ के अधिकतर आतंकवादी एक विशेष प्राथमिक विध्यालय से ही निकले हुए मिलते है जिनकी एक लंबी फेहरिश्त है!! ऐसा क्यों?  

 

विजय सहगल

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