गुरुवार, 5 मई 2022

कश्मीर फ़ाइल्स" (अंश-1)

 

"कश्मीर फ़ाइल्स" (अंश-1)




किन्हीं कारणों मे व्यस्तता के चलते दिनांक 25 अप्रैल 2022 को फिल्म "कश्मीर फ़ाइल" देखने का मौका मिला। 1990 मे कश्मीर की आतंकवादी घटनाओ का संकलन को चलचित्र के माध्यम से प्रदर्शन एक चुनौती पूर्ण कार्य था। उन घटनाओं का दबी  जुबान मे आधा अधूरा सच तो उन दिनों के समाचार पत्रों के माध्यम से सुनाया जरूर गया था पर दृश्य माध्यमों ने अपने आकाओं के प्रति अपनी चापलूसी और स्वामी भक्ति के चलते कभी इस सच को नहीं दिखाया, जिसका छायांकन विवेक अग्निहोत्री निर्देशित फिल्म कश्मीर फ़ाइल्स मे दिखलाया गया। विदित हो कि उस समय सरकार नियंत्रित दूरदर्शन का उद्गम हो चुका था। लेकिन बदले हुए राजनैतिक परिदृश्य मे निर्माता निर्देशक ने इस चुनौती पूर्ण कार्य को निर्भीकता पूर्वक सम्पादन और निर्देशन कर आम जनता के सामने प्रस्तुत किया इसके लिये वे बधाई के पात्र है। इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद कुछ राजनैतिक दलों और उनके सदस्यों की फिल्म पर प्रतिक्रिया ने उनके चेहरों  के  छद्म भोले भाले भाव ओढ़े मुखैटोँ को उतार उनके असली खूनी खूँखार चेहरों को भी आम जनों के बीच बेनकाब कर दिया। 

जम्मू कश्मीर मे कश्मीरी पंडितों का पलायन सहसा  19 जनवरी 1990 मे ही नहीं हुआ था जैसा कि फिल्म मे दर्शाया गया अपितु इसकी पृष्टभूमि 1966 मे ही लिख दी गयी थी।  जब जून 1966 मे नेशनल लिब्रेशन फ्रंट के आतंकवादी मकबूल भट को सीआईडी सब इंस्पेक्टर श्री अमरचंद की हत्या के आरोप मे फांसी की सजा सुनाई गयी। जम्मू कश्मीर सरकार और प्रशासन की अकर्मण्यता, लचर और ढीला-ढाला रवैया देखिये कि जिस मकबूल भट को 1968 मे फांसी की सजा सुनाई गयी थी वही मकबूल भट 1968 मे ही जेल तोड़ सीमा पार पाकिस्तान मे फरार हो गया। यदि सन 1966 से 1984 अर्थात लागभग 19 वर्ष केंद्र मे पदस्थ श्रीमती इन्दिरा गांधी की सरकार ने आतंकवादियों और देश द्रोहीयों पर सख्त और कठोर रवैया अपनाया होता तो कश्मीर की समस्या इतनी गंभीर और संगीन न होती। काँग्रेस ने स्वतन्त्रता के बाद से ही हमेशा कश्मीर पर अपनी लचर और ढुल-मुल नीति ही अपनाती रही। अब्दुल्ला परिवार को कश्मीर मे कठपुतली की तरह "जब तक चाहा दिल से खेला  और जब चाहा तोड़ दिया......" की तर्ज़  पर इस्तेमाल करती रही। श्रीमती गांधी ने 1986 मे फारुख अब्दुल्ला को हटा कर जब गुलाम मुहम्मद शाह को जम्मू कश्मीर का मुख्य मंत्री बनाया तो गुलाम मोहम्मद शाह ने अपने कुकृत्यों द्वारा जम्मू कश्मीर को सांप्रदायिक आग मे झोंक दिया। जम्मू के नवीन सचिवालय के पास स्थित एक मंदिर के परिसर के अंदर मस्जिद बनाने की अनुमति दे दी ताकि मुस्लिम कर्मचारी वहाँ नमाज पढ़ सकें। इस कुकृत्य पर कड़ी प्रितिक्रिया हुई और जगह जगह दंगे भड़कने लगे।  कश्मीरी के अनंतनाग सहित अन्य स्थानों मे सुनोयोजित तरीके से कश्मीरी  पंडितों के घरों मे तोड़-फोड़ और आगजनी की पटकथा लिखने की शुरुआत होने लगी। उन्हे मारा गया, महिलाओं के साथ लूटपाट और बलात्कार हुए। 1986 का ये सिलसिला जो शुरू हुआ तो अत्याचार और अनाचार की जघन्यतम त्रासदी की परिणति 19 जनवरी 1990 को कश्मीरी पंडितों के समूहिक नरसंहार के रूप मे हुई और जिसे विवेक अग्निहोत्री के निर्देशन मे "कश्मीर फ़ाइल्स" के रूप मे फिल्मांकन किया गया।

फिल्म मे अभिनीत कुछ पात्र बड़े परिपक्व और अभिनय के क्षेत्र मे निपुढ़ है जिनमे पुष्कर नाथ के रूप मे अनुपम खेर ने अपनी अमित छाप छोड़ी है,  शेष तीन मित्रों की मंडली के ब्रहमा के रूप मे मिथुन चक्रवर्ती का अभिनय भी प्रभावशाली है। अपनी संक्षिप्त भूमिका मे डॉक्टर के रूप मे प्रकाश, पुलिस अधिकारी के रूप मे पुनीत इससर, दूरदर्शन समाचार वाचक के रूप मे अतुल श्रीवास्तव  एवं श्रीमती लक्ष्मी ब्रहम्मा के रूप  की मृणाल की  भूमिका भी सरहनीय है। बिट्टा उर्फ कराटे के रोल मे चिन्मय, कृष्णा पंडित के रूप मे दर्शन कुमार ने मुख्य अभिनेता को बखूबी निभाया। फिल्मों के कुछ हिंसात्मक दृश्य दिल दहलाने वाले थे जिनको वास्तविकता के नजदीक होते हुए भी निर्देशक ने बड़ी सफाई से फिल्मांकन कर उनकी हिंसात्मकता के भाव को कम कर दृश्यों के महत्व को यथा रूप मे कायम रखने का सफल प्रयास किया है  जिसका अनुमोदन किया जाना चाहिए। फिल्म के शुरू मे ही पुष्कर नाथ के बेटे करण पंडित को चावल से भरे ड्रम मे छुपने के दौरान ही पड़ौसी से मिले सुराग से आतंकी बिट्टा द्वारा गोलियों की बौछार से हत्या कर देने का दृश्य दहशत से सराबोर करने वाला था। तनिक उस दृश्य की कल्पना करें जब एक पिता के सामने उसके पुत्र की, एक पत्नी के सामने उसके पति की और एक पुत्र के सामने उसके पिता की इस तरह नृशंसता पूर्वक हत्या के दृश्य को फिल्माया गया होगा!! दृश्य  दिल दहलाने वाले थे!! उसकी पत्नी को खून से सने चावल खाने को मजबूर करने वाला दृश्य अमानवीयता की पराकाष्ठा थी। ऐसा नीच और अधम कृत एक मानसिक रूप से विक्षिप्त नर पिशाच द्वारा ही किया जा सकता था। वायु सेना के अफसरों की हत्या, मकबूल भट को फांसी की सजा सुनाने वाले न्यायधीश नीलकंठ गंजू की हत्या के  दृश्य तो मात्र प्रतीकात्मक ही थे लेकिन उन दिनों कश्मीरी पंडितों के बीच दहशत और भयादोहन करने वाले थे।

फिल्म मे दिखाये गए राधिका मेनन जैसे पात्र आज भी देश की राजधानी सहित अनेकों जगहों मे टुकड़े टुकड़े गेंग के रूप मे कुख्यात है। 70-90  के दशकों मे रही सरकारों ने अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर राधिका मेनन के मानस पुत्रों के विरुद्ध  उस समय न सही पर आज की सरकार ने उनके  विरुद्ध सख्त कार्यवाही कर जेलों मे डाल रक्खा है जो प्रशंसनीय कदम है। फिल्म के एक दृश्य मे मकबूल भट से कृष्णा की मुलाक़ात के दौरान हाउस बोट मे टंगे  राधिका मेनन के एक श्वेत-श्याम चित्र ने इस फोटो के पीछे छुपे काले अध्याय के  स्याह संदेश को बड़ी खामोशी से दर्शकों के बीच पहुंचा कर टुकड़े-टुकड़े गेंग की सोच और विचारों का पर्दाफाश किया है जिसके लिए निर्देशक के फिल्मी ज्ञान और कौशल  की प्रशंसा की जानी चाहिये।   

एक अन्य दृश्य मे आतंकियों द्वारा 13  कश्मीरी पंडितों जिनमे मासूम बच्चे भी शामिल थे की समूहिक हत्या कर गड्ढों मे गिरते दिखाना मानवता के पतन की पराकाष्ठा थी। एक अन्य दृश्य मे पुष्कर नाथ के अस्थि कलश को देखना एवं अस्थि विसर्जन को उनके पैतृक घर मे चारों ओर बिखेरने का दृश्य मर्मस्पर्शी और हृदय द्रवित कर  देने वाले थे। फिल्म मे मध्यांतर के बाद  एएनयू सभागार मे छात्रों के बीच "कृष्णा" द्वारा छद्म धर्म निरपेक्षता को स्थापित करने के अर्थहीन विषय पर छात्रों को सम्बोधन के दृश्यों  को कुछ लंबा खींच कर उबाऊ और रुचि विहीन कर दिया। इस विषय मे पलायन की अन्य घटनाओं के दृश्यों को छोटे  छोटे भागों मे विभक्त कर दिल्चस्व बनाया जा सकता था। 

फिल्म का संगीत घटनाओं की पीढ़ा और वेदना  के अनुरूप अच्छा था। फिल्म मे कश्मीर वादियों, पुराने घरों और गलियों का चित्रांकन विषय मे मौलिकता और गाम्भीर्य उत्पन्न करता है जिसे दर्शक उस काल की त्रासदी से अपने आपको सहजता से जोड़ लेता है शायद इसी कारण ही कश्मीर घाटी के पंडितों का दुःख, दर्द और वेदना देश के आम नागरिकों ने महसूस की और फिल्म को जबर्दस्त  सफलता और  शानदार प्रतिसाद  प्राप्त हुआ।

(शेष एवं समापन अंश दिनांक 08 मई 2022 रविवार) 

विजय सहगल


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