शनिवार, 26 फ़रवरी 2022

बाजी राऊत

 

"बाजी राऊत"




जैसा कि मै अनेकों बार उल्लेख कर चुका हूँ कि विविध भारती की प्रातः कालीन सेवा के  सुबह लगभग छह से साढे आठ तक के कार्यक्रम मेरी दिनचर्या का अभिन्न अंग रहे है, फिर चाहे मेरे युवा काल मे इंटर मीडियेट या स्नातक का विध्याध्यन का समय रहा हो या अजीविका हेतु बैंक सेवा मे  प्रवास के दौरान  लखनऊ, सागर, ग्वालियर, पोरसा, रायपुर, भोपाल  या दिल्ली मे पदस्थापना रही हो। मौसम के अनुसार समय दस पंद्रह मिनिट आगे पीछे बेशक रहा हो पर उन दिनों जब ट्रंजिस्टर ही श्रव्य माध्यम के एक मात्र हिस्सा थे या आज आधुनिक तकनीकि के उन्नत मोबाइल मे एफ़एम  रेडियो के माध्यम से विविध भारती की उपलब्धता। विविध भारती की प्रातः कालीन सेवा मेरी ज़िंदगी का आज भी एक अहम हिस्सा है।

1998 मे मै रायपुर से जगन्नाथ पुरी की यात्रा के दौरान मै अपनी कार से  उड़ीसा राज्य के ढेंकानल कस्बे से गुजरा था।  आज 24 साल बाद ढेंकानल एक बार फिर से याद आयेगा ऐसा मैंने सोचा न था। भारत की आज़ादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत पिछले कई सप्ताह से सोमवार और मंगलवार को विविध भारती अपने प्रातः आठ बजे के न्यूज़ बुलेटिन पर भारत की स्वतन्त्रता से जुड़े अज्ञात सेनानियों पर एक सवाल पूंछती है? जिसका उत्तर भी अगले दिन के समाचार बुलेटिन मे विजेता श्रोता के नाम और साक्षात्कार के साथ उद्घोषित करती है। 21 फरवरी 2022 को  मेरे  प्रातः भ्रमण के दौरान के सवाल के अंतर्गत उड़ीसा के उस सबसे कम उम्र के वीर बालक का नाम पूंछा गया था, जिसने अंग्रेज़ सिपाहियों को अपनी नाव से, नदी के पार ले जाने से मना कर दिया था। आज जब ढेंकानल के उस बारह वर्षीय  बालक "बाजी राऊत" के बारे मे सुना तो मन उस वीर बालक के सम्मान मे स्वतः ही झुक गया। काश 1998 मे इस सबसे छोटे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी और सबसे कम उम्र के शहीद सेनानी का नाम सुना होता तो मै ढेंकानल के नीलकंठ गाँव अवश्य जाता!! वीर बालक "बाजी राऊत" ने अंग्रेज़ सिपाहियों के आतंक, अत्याचार और जुल्म ज्यादती  के बारे मे जानने के बावजूद उनके आदेश को 11 अक्टूबर 1938 को  बारह वर्ष की उम्र मे अपनी  निर्भीकता और निडरता से मना कर दिया।  वीर बालक बाजी निश्चित ही अपने शारीरिक बल से परे अपने बौद्धिक और मानसिक संकल्प, देश प्रेम तथा अपने आत्मसम्मान के चलते शूरवीरता और साहस की साक्षात प्रतिमूर्ति थे। जिसने अंग्रेज़ आतताइयों को साहस पूर्वक अपनी नाव से  ढेंकानल के नीलकंठपुर घाट से  गाँव   मे बहने वाली ब्राह्मणी नदी के पार छोड़ने के उनके आदेश को मानने से इंकर कर दिया!! बाजी ने अंग्रेजों के जुल्म और अत्याचार के किस्से को सुन रखा था, बाजी राऊत उर्फ वैजा ने न केवल अंग्रेज़ सिपाहियों के नदी के पार  उतारने के आदेश की अवज्ञा की बल्कि कहा, कि तुम लोग हमारे देश और गाँव के लोगो पर अत्याचार और दुराचार करते है, मै तुम्हें अपनी नाव से अपने गाँव ले जाने नहीं दूँगा।

"बाजी राऊत" जैसे नन्हें बालक द्वारा अंग्रेज़ सिपाही की इस अवज्ञा को अपनी तौहीन मानने वाले उस कायर अंग्रेज़ सिपाही  ने अपनी मर्दांगी, बल और बहदुरी का प्रदर्शन उस छोटे निहत्थे बालक के सिर पर अपनी बंदूक की बट से प्रहार कर किया!! अपनी बुज़दिली और पौरुषहीन भीरुता के कुत्सित कृत को उस अंग्रेज़ सिपाही ने एक बार पुनः अंग्रेज़ो की  बदनीयति, बेईमानी और बदइंतजामी को ही दर्शाया। अंग्रेज़ सिपाही की बंदूक की बट के प्रहार लहूलुहान बालक "बाजी राऊत" ने चिल्ला चिल्ला कर अपने गाँव के लोगो को चेतावनी देकर सचेत कर दिया कि अंग्रेज़ सिपाही उनके गाँव मे घुसने का प्रयास कर रहे है! अति रक्त स्राव के कारण वीर बालक बाजी राऊत अंग्रेज़ो से लोहा लेते हुए देश के लिए वीरगति को प्राप्त हो गए और भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास मे सबसे कम उम्र के स्वतन्त्रता सेनानी और सबसे कम उम्र के शहीद के रूप मे अपना नाम  स्वर्ण अक्षरों मे अमर कर दिया। धन्य है वे माता-पिता और धन्य है ढेंकानल के नीलकंठपुर गाँव की वो धरा जिसने वीर बाजी राऊत जैसे वीर बालक को जन्मदिया। अपने मन मे ढेंकानल के नीलकंठपुर की उस वीर धरा के दर्शन करने की अभिलाषा मन मे लिए जब पता चला कि आज भी  हर वर्ष 11 अक्टूबर को नीलकंठपुर गाँव के लोग बाजी राऊत के जन्मदिन पर उनके बलिदान को याद कर सभा का आयोजन करते है। 

आज जब आकाशवाणी के विविध भारती पर उक्त प्रसंग को सुना तो मुझे लगा कि भारत की स्वतन्त्रता के संघर्ष का इतिहास उतना ही नहीं है जो हमे अब तक हमारे पाठ्यक्रम मे  बताया और पढ़ाया गया? छोटे छोटे गाँव और कस्बों मे छुपे हमारे स्वतन्त्रता संघर्ष के इतिहास को एवं स्वतन्त्रता के छुपे सेनानियों को  आज सभी के सामने लाने की आवश्यकता है ताकि भारत की स्वतन्त्रता के इतिहास का सच देश के सामने आ सके। आकाशवाणी का समाचार सेवा  प्रभाग इस काम को बखूवी कर रहा है, जिसका हमे गर्व है।    

वीर बालक "बाजी राऊत" को हार्दिक नमन।    

विजय सहगल

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