"बाबा
का मुट्टा"
अस्सी के दशक तक हर वर्ष स्कूल के ग्रीष्म
अवकाश मई जून मे प्रायः हमारी उम्र के बच्चों मे पतंगबाजी का महत्वपूर्ण स्थान
रहता था। शाम होते ही बच्चो के झुंड अपनी अपनी छत्तों पर चढ़ कर पतंग उड़ाने का आनंद
लेते थे। पतंग को ऊंचे से ऊंचे ले जाने का जुनून रहता था। पतंग के माध्यम से सन् 1749
मे बेंजामिन फ्रेंकलिन द्वारा तड़ित चालक के
आविष्कार के बारे मे हम बच्चे किताबों मे पढ़ ही चुके थे अतः नये नये प्रयोग पतंग के साथ करते रहते। पतंग मे
पुंछल्ला लगा कर उढ़ाना एक मुख्य सगल था। पुंछल्ला कभी कागज और कभी कपड़े को फाड़ कर लगाना
सामान्य बात होती लेकिन जब हवा तेज होती तो पुंछल्ला दस-पंद्रह फुट से भी ज्यादा
हनुमान की पूंछ की तरह लंबा होता,
कुछ बच्चे इस से भी ज्यादा लंबा पुंछल्ला लगा मानो,
पुंछल्ले की प्रतियोगिता मे अपना नाम "गिनी बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड" मे
दर्ज़ कराने की दौड़ मे शामिल हों। ऐसा शायद मेरे शहर झाँसी सहित देश के सभी शहरों
और कस्बों मे पतंग बाजी देखने को मिलती थी।
पतंग उड़ाने मे प्रायः एक सहायक की जरूरत तो
पड़ती ही थी। एक पतंग उड़ता तो दूसरा चरखी पकड़ डोर को ढील दे कर पतंग को आकाश मे
ऊंचा उड़ाने मे करता या पतंग की डोर को
बापस खींचने पर धागे को चरखी मे लपेटता। ये सार्वभौमिक सत्य था कि पतंग मे
सहायक का काम करने वाला छोटा, कमजोर और दबा
कुचला होता फिर वह चाहे रिश्ते मे छोटा भाई हों,
मित्र या पड़ौसी। एक बात और भी सच थी कि पतंग के कटने,
पेड़ या बिजली के तारों मे उलझने,
फटने या पतंग के न उड़ पाने के सारा
दोष हमेशा सहायक के मत्थे मढ़ दिया जाता!!
निश्चित तौर पर बच्चों मे इस दौरान कहा
सुनी, लड़ाई झगड़ा और कभी कभी मार पिटाई भी आम बात
थी, जो अगले दिन पतंग उड़ाने के दौरान सामान्य हो जाती थी। पतंग के लिए आवश्यक हवा न चलने
पर बच्चे उन दिनों बच्चे चिल्ला चिल्ला कर एक टोटका कहते "चील-चील हवा चलाओ,
बर्ना तेरा अंडा फोडुंगा"!!
"कटी पतंग" को लूटने के लिए पतंग के पीछे भागना,
एक छत्त से दूसरे के घर की छत्त को फाँदना सामान्य बात थी। बगैर किसी जोखिम की परवाह
किए सिर्फ एक मकसद था किसी भी तरह पतंग को कब्जे मे लेना। अघोषित नियम के तहत जिस बच्चे
का हाथ पतंग मे पहले लग जाता दूसरे बच्चे मुंह टापते रह जाते।
मैंने समाचार पत्रों मे एक बार अनेकों पतंगो
को एक साथ उड़ाने के बारे मे पढ़ा था। मुझे याद है कि कुछ नया करने के मेरे स्वभाव
के कारण एक बार मैंने बचपन मे पाँच-छः पुंछल्ला लगी पतंगों को जोड़ कर एक साथ उड़ाया था। जो मैंने
अपने शहर मे कभी नहीं देखा। कुछ लोग पतंग मे मोमबत्ती आदि लगा रात मे भी उड़ाते थे।
पतंग के उड़ाने मे माँझा का एक महत्वपूर्ण भूमिका तो रहती ही थी पर कुछ लोग जो पेंच
लड़ाने के शौकीन होते, माँझे की जगह
बिजली के ताँबे का तार इस्तेमाल करते,
कुछ लोग दरी मे इस्तेमाल होने वाले मोटे धागे का उपयोग करते ताकि उनकी पतंग न कटे। प्रतिद्वंदी की पतंग को काटने
पर "वो काटा" का शोर समूह मे गूंजने लगता। पतंग उड़ाते मे यदि कोई पतंग कट
फट जाती तो उसे जोड़ने की जुगाड़ मे आटा घोल लेई बनाई जाती,
घर मे चावल हों तो उससे भी काम चलाया जाता। घर मे चावल न हों तो पड़ौसी के यहाँ चावल
की पूंछ परख होती। लवेरे के फल या उबले आलू से भी पतंग की मलहम पट्टी कर उसे फिर से
उड़ाया जाता। पतंग की बाँस से बनी तीर कमान भी यदि कभी टूट जाती तो एक अन्य छोटी बाँस
की तीली को दोनों टूटे सिरों के बीच जोड़ हड्डी जोड़ विशेषज्ञ की तरह जोड़ दिया जाता।
पतंग को ठीक कर पुनः उड़ाने मे कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जाती।
सैकड़ों तरह की रंगीन कागजों से बनी एक रंगी,
दो रंगी या बहु रंगी पतंगे आकाश मे चारों तरफ दिखाई देती जो पूरी तरह एक ही आकार
अर्थात वर्गाकार ही होती। झाँसी मे एक पतंग साज़ थे जिनकी पतंगों जा आकार सामान्य पतंगों से हट कर था। झाँसी मे "बाबा
का मुट्टा" के नाम से मशहूर इनकी पतंग को हम लोग "मुट्टा" कहते थे।
जहां सामान्य पतंगे वर्गाकार होती पर बाबा की पतंग अर्थात "मुट्टा" की
दायें-बाएँ की बांस की कमान के कोने समकोण
न होकर कुछ गोलाकार लिए होते जो इनकी पतंग
की पहली पहचान थी। एक विशेषता इस "मुट्टे" की और थी कि बाबा की हर पतंग
पर चाहे वह एक आने की छोटी पतंग हो या आठ आने की
बड़ी, पतंग के ऊपरी हिस्से मे
आँखों के आकार का दूसरे रंग का कागज जरूर चिपकाया जाता जिसे "पक्खा" कहा
जाता था और पतंग के निचले सिरे पर एक त्रिभुजाकार कागज चिपकाया जाता जो पतंग की खूबसूरती
को और भी बढ़ा देता था। ये "पक्खे" एवं त्रिभुजाकार कागज बाबा की पतंग की दूसरी पहचान थे। आसमान मे
सैकड़ों पतंग के बीच बाबा का मुट्टा अपनी अलग आन-बान और शान के साथ आकाश मे बड़ी बड़ी आँखों के साथ बड़े इतरा कर एक
बादशाह की तरह उड़ता दिखाई देता। बाबा की पतंग के मुरीद झाँसी के हर कोने से सागर गेट
स्थित उनके आवास पर आते थे।
आज से 35-40 साल पूर्व की यादों को पुनः
ताज़ा करने हेतु, झाँसी शहर के एक कोने
मे निवासरत बाबा की पतंग अर्थात "मुट्टा" की तलाश मे दिनांक 15 फरवरी 2022 को मै बाबा उर्फ किशोरी लाल के
सागर गेट स्थित घर की ओर बढ़ा। चालीस साल मे गलियों मे हुए बदलाब के बावजूद भी
मैंने बाबा के घर को पहचान लिया, जहां कभी मै
अपने दोस्तों और बड़े भाई के साथ बाबा के मुट्टा को खरीदने आया करता था।
गली-मुहल्ले और आस पास की बसाहट मे हुए जमीन आसमान के बदलाब के बावजूद बाबा का घर
जस का तस था। ऐसा लगा कि एक समय झाँसी मे पतंग बनाने मे अपनी अलग पहचान बनाने वाले
किशोरी लाल उर्फ बाबा जी के मकान को "बदलाब" और "विकास" बिना
छूए ही गलियों और मुहल्लों से होकर झाँसी शहर से गुज़र गया हो?
घर की जिस दलान मे बैठ मैंने दशकों पूर्व बाबा का मुट्टा खरीदा था उस दलान का
आधा हिस्सा जीर्ण सीर्ण हो टूट चुका था। एक
ऐसा पतंग साज़ जो खुद भी पतंग बाज़ था जिसकी पतंग बनाने की कारीगरि और माँजा बनाने के
हुनर को राज्य का आश्रय मिलना चाहिये था?
जिसके हुनर को एक पहचान मिलनी चाहिये थी?
बाबा के मुट्टे की कभी एक अलग शान और पहचान थी। इस पहचान को मुंहताज एक पतंग साज़
अपने साथ इस पतंग साज़ी को कौशल को लगता है अपने साथ ले गया!! उनके सुपुत्र श्री
मुन्ना जो अपने व अपने परिवार के जीवन यापन के लिए ऑटो चला कर गुजर बसर करते है।
लेकिन खुशी थी कि उनके पुत्र बेशक अपने पिता की तरह पतंग का निर्माण तो नहीं कर
पाये पर पतंग के व्यवसाय मे अभी भी जुड़े हुए है। उनका कहना था कि सरकार द्वारा यदि
कुछ मदद मिले तो वह पुनः अपने पिता के पतंग निर्माण को शुरू कर सकते है। उनकी
पत्नी और बच्चे बाज़ार मे बनी पतंग का व्यवसाय अभी भी अपने घर से कर रहे है। मुलाक़ात के दौरान श्री मुन्ना ने बताया कि उनके
पिता के द्वारा बनाई पतंगे झाँसी मे तो प्रसिद्ध थी ही बल्कि उनके पिता की बनाई
पतंगे यूरोप और अमेरिका तक मे प्रख्यात और विख्यात थी। जब मैंने उनसे बाबा की कोई
पुरानी पतंग या उसकी फोटो चाही जो उपलब्ध नहीं थी। उनके पुत्र द्वारा निर्मित "बाबा के मुट्टा"
जैसी एक पतंग मिली तो लेकिन बाबा के हाथ जैसी बनावट और सफाई उसमे दूर दूर तक नज़र न
आयी।
आज के समय की विकसित तकनीकी और आधुनिक
विज्ञान के इन टीवी,
फ़ेस बुक, व्हाट्सप,
ट्वीटर जैसे उत्पाद मे पली बढ़ी इस पीढ़ी जो कैंडी और पवजी खेलने मे व्यस्त है। काश!!
उनके पाठ्यक्रम से परे इन पतंगबाजी, पतंग या "बाबा के मुट्टा" की गतिविधियों से ऐरो डायनेमिक्स की जानकारी या गुल्ली
डंडे और कंचों से न्यूटन के गति के नियम और निशाने बाजी सीखी जाती
या पहिये चलाने से संतुलन और गति की दिशा समझी जाती पर आज के समय ये अपेक्षा करना असंगत
होगा। काश!! अगर आज की पीढ़ी एवं पुरानी पीढ़ी के मनोरंजन के क्रिया कलापों के बीच
समंजस्य बैठाया जाए तो बाबा के मुट्टे जैसे हुनर को कायम रक्खा जा सकता है जो आज
लुप्त प्राय होने के कगार पर है।
विजय सहगल
1 टिप्पणी:
बहुत बढ़िया सर जी 💐🙏
एक टिप्पणी भेजें