शनिवार, 5 मार्च 2022

यूक्रेन मे भारतीय छात्रों की पीढ़ा

"यूक्रेन मे भारतीय छात्रों की पीढ़ा"






पिछले दिनों यूक्रेन पर रूस के हमले के समाचार पूरे प्रिंट और दृश्य माध्यमों मे छाए रहे। दूरदर्शन के अलावा लगभग हर हिन्दी समाचार चैनल चौबीसों घंटे सिर्फ और सिर्फ युद्ध के समाचार ही परोसता रहा। मै रूस द्वारा अवैधानिक और अन्याय पूर्वक किए गए इस आक्रमण का पक्ष नहीं लेता और न ही एक लोकतान्त्रिक देश यूक्रेन पर हुए इस हमले का समर्थन करता हूँ। लेकिन यूक्रेन को युद्ध की विभित्षिका मे झौकने के लिये जहां एक ओर रूस जिम्मेदार है वहीं दूसरी ओर यूरोपियन (ईयू) और उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के सदस्य देश कम जिम्मेदार नहीं जिन्होने खाली-पीली अपने गाल बजाते हुए यूक्रेन को चने के झाड़ पर चढ़ा बर्बादी और विनाश के मुंह मे धकेल विकास और उन्नति के पथ से डिगा,  दशकों पीछे धकेल दिया।

कल्पना करें, यदि यूक्रेन  युद्ध की इस आपाधापी मे, जब अन्य लोगो की तरह आप भी युद्धक्षेत्र से अपनी जान बचाने के लिये पलायन हेतु ट्रेन मे चढ़ने  की लाइन मे लगे हों, आप पर ट्रेन मे चढ़ने, यात्रा करने की वैध अनुमति हो  और ट्रेन मे प्रवेश की आपकी बारी आने पर "रंगभेद" के आधार पर आपको लाइन से बाहर कर दिया जाये, तो सोचो आपके दिल मे उन व्यक्तियों और व्यवस्था के विरुद्ध  कितना आक्रोश होगा? क्या आप ताउम्र इस अन्याय और भेदभाव को कभी भूल सकते है? ऐसा ही कुछ यूक्रेन मे पिछले दिनों भारतीय छात्रों के विरुद्ध यूक्रेन के नागरिकों ने किया जब वे युद्ध ग्रसित यूक्रेन मे बचने के लिए ट्रेन से सुरक्षित स्थानों पर जाने हेतु अन्य यात्रियों के साथ लाइन मे खड़े हो  अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। इस अन्याय को देख कर भी अनदेखा करने वाले यूक्रेनी नागरिक जब इस घृणास्पद  कृत पर मौन रहें? तब संत कबीर दास जी की इन  पंक्तियाँ का स्मरण स्वतः ही हो आता है:- "साधू, ये मुरदों का गाँव"......... । 

जीवित होकर भी जो समाज  जीवंत नज़र न आये, वे जीवित होते हुए भी मृतक समान है!! आप सोच सकते कि ऐसे नागरिकों के प्रति यूक्रेन मे रह रहे उन पीढ़ित भारतीय  छात्रों के दिल मे कितनी वितृष्णा और क्रोध होगा? जिसकी कल्पना ही की जा सकती है? मेरा दावा है कि ट्रेन मे चढ़ने को लेकर इस तरह के भेदभाव की घटना यदि भारत मे घटी होती तो अनेकों भारतीयों ने प्रशासन से इस बात का प्रतिवाद, प्रतिरोध और प्रदर्शन किया होता।   

मै ये नहीं कहता कि यूक्रेन के सारे नागरिक, पुलिस, सेना और सरकार की ऐसी मनसा या विचार रहा होगा। पर वाइरल अनेकों विडियो मे लगभग हर भारतीय छात्र ने यूक्रेन के कीव, खारकीव या अन्य शहरों से इस युद्धोंन्माद भरे वातावरण मे गुजर रही ट्रेनों मे विदेशी छात्रों के साथ, यूक्रेनी नागरिकों, सुरक्षा बलों ने उनको चढ़ने देने से वंचित कर स्वार्थपरक एवं पक्षपात पूर्ण व्यवहार की पुष्टि की है। यूक्रेन के एक बड़े नागरिक वर्ग, सेना और पुलिस द्वारा अपने नागरिकों को प्राथमिकता देकर युद्ध की इस भयंकर विभिषिका मे न केवल भारतीय छात्रों बल्कि अन्य देश के विध्यार्थियों से रंग भेद और स्वार्थ पूर्ण भेद भाव करते हुए ट्रेन मे चढ़ने देने से वंचित किये जाने वाले इस कृत की मै निंदा करता हूँ, जिसकी आलोचना, भर्त्स्ना और तिरस्कार  अवश्य ही होना चाहिये!!

क्या मुसीबत या विपत्ति काल मे केवल यूक्रेनी नागरिकों की जान मूल्यवान  है? क्या  यूक्रेन मे रह रहे दूसरे विदेशी छात्रों की जान की कोई कीमत नहीं? ऐसा नहीं था कि चिकित्सा शास्त्र की उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे ये भारतीय छात्र कोई अवैधानिक रूप से यूक्रेन मे  प्रवेश कर रह रहे थे, अपितु इन भारतीय छात्रों की   यूक्रेन के आर्थिक विकास और उन्नति मे एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है, इसलिए ये और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि यूक्रेन सरकार, ज़िम्मेदारी पूर्वक विदेशी छात्रों की नैतिक ही नहीं बल्कि अंतर राष्ट्रीय मानदंडों  और परम्पराओं के तहत इन छात्रों की रक्षा और सुरक्षा देती। प्राथमिकता के आधार पर न सही लेकिन समानता के अवसर की नीति के तहत ही इन्हे ट्रेनों से सुरक्षित स्थानों/देशों मे भेजती? पर खेद और अफसोस सैकड़ों साल बाद भी इन यूरोपियन देशों के कुछ नागरिक अपनी रंगभेद कारी  सोच और अपने   "श्रेष्ठता के भाव" से ग्रसित "मनो  विकार" से आज भी पीढ़ित है!!  

यदि इन यूक्रेनी नागरिकों और पुलिस प्रशासन की ये सोच रही हो कि "भारत" ने संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न संस्थाओं के प्रस्तावों के जनमत पर तटस्थ और निष्पक्ष भूमिका निभा, किसी भी पक्ष के साथ न खड़े होने का फैसला कर अपने आपको निष्पक्ष रख कोई त्रुटि की है, तो ये उन की भूल है? हर राष्ट्र को अपने सार्वभौमिक और संप्रभु राष्ट्र के रूप मे अपनी पहचान और अपने हितों की रक्षा हेतु अपनी नीतियाँ और कार्यक्रम होते है, जिन्हे किसी दूसरे राष्ट्र के दबाव मे बदला नहीं जा सकता फिर वह राष्ट्र चाहें अमेरिका हों या यूक्रेन।

भारत ने रूस और यूक्रेन के इस मामले मे अपनी तटस्थ भूमिका के तहत समस्त विश्व को इस आपदा और संकट की घड़ी मे  बहुपक्षीय बातचीत के माध्यम से शांति स्थापित करने एवं  समाधान खोजने की पहल की है ताकि इस युद्ध को शीघ्रातिशीघ्र समाप्त किया जा सके? भारत ने अपनी गैरपक्षपातीय एवं तटस्थ भूमिका के बावजूद यूक्रेन को मानवीय आधार पर चिकत्सा उपकरण, दवा, टेंट, कंबल एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं को पूर्ति कर एक जिम्मेदार राष्ट्र और मानवता के पक्षधर की भूमिका अदा की है।

यूक्रेन की पुलिस और सेना, जिन पर ट्रेन मे चढ़ने हेतु अनुशासन की व्यवस्था बनाये रखने की ज़िम्मेदारी थी, वे ही अन्याय का हिस्सा बन यूक्रेनी नागरिकों के हित  और भारतीय छात्रों के विरुद्ध अमर्यादित वर्ताव कर पक्षपात कर रहे थे!! क्या यूक्रेन जैसा एक सभ्य और सुसांस्कृत, विकसित देश जो रूस के अन्याय और अनुचित नीतियों के विरुद्ध लड़ रहा हो और जब उसके ही नागरिक और पुलिस अधिकारी भी वही दुराचरण, भेदभाव दुहराकर अपने देश मे आये विदेशी आगंतुक नागरिकों के साथ कर रहे हों तो दोनों देशो के आचरण, नियत और नीति मे क्या अंतर रह जाता है? इन विभेदकारी, पक्षपातपूर्ण एवं अन्यायी नीतियों के चलते यूक्रेन किस मुँह से रूस के विरुद्ध युद्ध लड़ सकता है?, जिसके नागरिक अपने ही देश मे आये विदेशी नागरिकों के साथ ऐसा अशास्त्रीय एवं नीति विरुद्ध व्यवहार करते हों?   

मै मानता हूँ कि अभी पड़ौसी देश रूस से इस युद्धोंमाद के कारण यूक्रेनी प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकताएं, आपदा और संकट के इस आपात काल मे अपने देश की रक्षा सर्वोपरि है, पर शांतिकाल के आगमन पर  अपने कुछ  नागरिकों, पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों  द्वारा दूसरे देश के छात्र और नागरिकों को समानता और मानवता  के अधिकार से वंचित रखने के इस  कुकृत्य की  जाँच कर इनके विरुद्ध कार्यवाही अवश्य ही करनी चाहिये? 

विजय सहगल

           


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