"बुरान्सखंड यात्रा-भाग-2"
जब दिनांक 14 जनवरी 2021 को ट्रैवल ग्रुप ऑफ
इंडिया (टीजीआई)की कॅनाट प्लेस मे मीटिंग मे
बुरान्सखंड, सुरकुंडा देवी,
धानौल्टी की बात चीत हो रही थी तो दिमाक मे सब गड्डमड्ड था,
कि हमे जाना कहाँ है, ठहरना कहाँ है
और देखना क्या है क्योंकि मै पहले कभी यहाँ आया नहीं था और न ही इन स्थानों की भौगोलिक स्थिति से मै ठीक तरह से वाकिफ था।
25 जनवरी की सुबह जब हरिद्वार से बुरान्सखंड
की यात्रा आरंभ की तो उत्साह और उमंग के साथ इन स्थानों के बारे मे जानने,
देखने की जिज्ञासा भी मन मे थी। इस उत्साह
और आतुरता ने हमे भोर सवेरे उठने के मजबूर
कर दिया। सर्दी अच्छी ख़ासी थी। हमारे सहचर श्री रिंकू जी से वादा हुआ था कि चलने
के पूर्व घाट पर गंगा स्नान करके चलेंगे
जो होटल के सामने ही बमुश्किल 30-40 कदम दूर था। पर ठंड ने हमे वादाखिलाफी कर वादा तोड़ने पर मजबूर कर दिया। अंततः होटल मे ही
गरम पानी से स्नान करने को बाध्य कर दिया। पर हम इतने कृतघ्न भी न थे कि गंगा जल
के छीटों से शरीर को पवित्र किये विना हरिद्वार से प्रस्थान करते। इसलिये जमशेदपुर से
आये रिंकू भाई के साथ तैयार होकर गंगाजल का आचमन कर पवित्र जल को अपने शरीर पर
छिड़क यात्रा आरंभ की। आज सुबह हमारे सारथी पुष्कर जी का एक नया आध्यात्मिक रूप देख
कर आश्चर्य हुआ जब उन्होने जल का अपव्यय रोकने के मिशन को आगे बढ़ाते हुए खड़े-खड़े
ही भावनात्मक स्नान कर चेहरे की ड्राइ
क्लीनिंग कर सबसे पहले ग्रुप मे तैयार होने की बाजी मार ली। पुष्कर जी बहुत
बहुत बधाई!!
अब हमारे ग्रुप के अन्य 6-7 वाहन हरिद्वार देहरादून मार्ग का अनुसरण कर
रहे थे और हम सभी की सांझा मंजिल थी "बुरान्सखंड"। जब सभी वाहन की कंपनी
के ब्रांड अलग अलग थे,
वाहन चालकों के मिजाज भी अलग अलग थे तो
वाहन की गति भी अलग होनी ही थी। सभी वाहन अपने को आगे मान मंजिल की तरफ बढ़ चले।
वाहन मे तो समुचित ईधन था पर मेरे सहित सभी साथियों के भौतिक शरीर मे ईधन की कमी
महसूस हो रही थी। मैंने पुष्कर जी से कहीं शुद्ध घी का ईधन लेने का आग्रह किया
जिसे उन्होने सहर्ष एक रेस्टोरेन्ट मे कार को रोक "शुद्ध अमूल्य मक्खन मे आलू के पराठे" खिला कर "आत्मनिर्भर
भारत" के लक्ष्य को प्राप्त कर पूर्ण कराया। अधिष्ठान और प्रतिष्ठान की
जानकारी तो मेरे पास नहीं पर उसके छायाचित्र अवश्य पुष्कर जी के पास सुरक्षित होंगे।
आग्रह सहित अनुरोध है कि उन चित्रों को
सार्वजनिक करें।
पुष्कर जी एक अच्छे अनुभवी बाईकर एवं कार चालक भी है। हमारी कार लगभग साढ़े तीन
घंटे मे अपनी मंजिल बुरान्सखंड सबसे पहले पहुँच गई। इस आधार पर पहाड़ों पर भी अच्छे
कार चालन का श्रेय तो उन्हे (पुष्कर जी को) दिया ही जाना चाहिये। बुरान्सखंडा
पहुँचने पर अब हमे स्पष्ट था कि छोटे से मनोहारी पहाड़ी गाँव बुरान्सखंड मे हम लोगो
को रुकने का इंतजाम ट्रैवल ग्रुप ऑफ इंडिया ने किया है। बमुश्किल 4-6 होटल और
20-25 घरों के इस शांत और सुरम्य स्थल से दिखाई दे रही वर्फ से आच्छादित हिमालय पर्वत की चोटियाँ के सौन्दर्य ने मन को
मोह लिया। होटल मे भारी भीड़ थी। कमरे खाली होने मे समय था (चैक आउट टाइम दिन के 12
बजे)। हमे भी कोई जल्दी नहीं थी। सामने ही
होटल मे चाय का ऑर्डर दे हिमालय पर्वत की चोटियों को निहारते रहे। एक ओर फोटो सेशन का दौर चलता रहा तो दूसरे ओर चाय,
पराँठे और आमलेट का दौर चलता रहा। कब 12 बजे पता ही नहीं चला। 12 बजे होटल मे अपने
अपने रूम को अधिग्रहित कर सामान रख सारे टीजीआई सदस्य यहाँ वहाँ भ्रमण करने लगे।
सदस्यों की वृहद संख्या का आभास तब हुआ जब छोटे से गाँव मे सिर्फ और सिर्फ ट्रैवल
ग्रुप ऑफ इंडिया के ही सदस्य दिखाई दे रहे थे। अनुमानित संख्या 80 के उपर थी।
उत्तराखंड के तिली मिश्रित पकोड़े और भांग की चटनी के स्वाद के साथ आगंतुक अतिथितियों का स्वागत किया गया।
अब तक ग्रुप के सदस्य आपस मे घुलमिल कर एक
दूसरे से परचित हो चुके थे। स्वल्पाहार के बाद होटल के समीप स्थित मैदान मे सारे
सदस्य एकत्रित हुए और सदस्यों के व्यक्तिगत परिचय जानने का कार्यक्रम शुरू हुआ
ताकि सभी सदस्य नाम, वासस्थान सहित एक दूसरे
को भलीभाँति जान प्रगाढ़ मित्रता के रूप मे जाने जा सके। हर सदस्य स्वयं अपना परिचय
दे अपने को परिभाषित करता। साथ ही साथ परिचय दाता सदस्य का उत्तराखंड की पारंपरिक
रीति रिवाज से तिलक लगा उत्तरखंड की पहचान गरम कपड़े से बनी सुंदर टोपी पहना कर
स्वागत किया गया। इस परिचय सम्मेलन के पश्चात पोरवाल परिवार की नन्ही बच्ची ने एक
उत्तरखंडी लोकगीत पर पहाड़ी लोक नृत्य किया जिसका उपस्थित समूह ने करतल ध्वनि से
स्वागत किया। उत्तरखंडी लोक नृत्य के किशोर कलाकारों ने पहाड़ी लोक गीत पर बहुत ही
शानदार नृत्य प्रस्तुत किया जिसके बोल तो समझ नहीं आये पर यगुल का प्रणय नृत्य एक
दूसरे को प्यार करने का स्पष्ट संदेश दे रहा था। इन तीनों युवा कलाकारों का
उपस्थित समूह ने तालियाँ बजा कर हौसला अफजाई की एवं गढ़वाली सांस्कृति से परिचय
कराने के लिये युवा कलाकारों को धन्यवाद
भी दिया। कार्यक्रम का संचालन श्रीमती शुभा पोरवाल जी ने किया जो ग्रुप की संचालन समिति की एक एडमिन भी है।
परिचय सम्मेलन के पश्चात अगला कार्यक्रम
बुरान्सखंड से लगभग 9 किमी॰ दूर धानौल्टी स्थित प्रसिद्ध "ईको पार्क"
देखने के लिये सभी सदस्यों ने विश्व प्रसिद्ध "विंटर लाइन" देखने के
लिये प्रस्थान किया। बताते है सूर्यास्त के समय पहाड़ों की चोटियो पर बनने बाली
सुनहरी लाइन को देखना एक प्रकृतिक आश्चर्य जनक जादू की तरह है। इस नौसर्गिक घटना
को देखना एक रोमांचक अनुभव है जो अपने देश मे सीमित स्थानों पर ही दृष्टिगोचर होता
है धनौल्टी उनमे से एक है। ईको पार्क मे स्थित जमीन से 20-25 ऊंचे हैंगिग ब्रिज (लटकने वाला रस्सी का झूला) पर
चलने की मेरी चुनौती पूर्ण अभिलाषा जिसमे हमारे युवा सहचर समीर को साथ देना था पर
ने जाने क्यों उक्त अभिलाषा अधूरी रह गई?
जिसको आगे फिर कभी पूरा करने का चेष्टा करूंगा।
रात्रि के भोजन उपरांत सर्दी अपनी चरम सीमा
पर थी। कार की छत्त और आगे की शीशों पर वर्फ की हल्की परत चढ़ना शुरू हो गई थी।
मौसम का -6 डिग्री तापमान भी ग्रुप के सदस्यों को "कैंप फायर" के कार्यक्रम मे शामिल
होने से न रोक सका। अग्नि स्थल पर जलती आग
के चारों ओर बैठ बच्चे, युवाओं ने बढ़ चढ़
कर हिस्सा लिया। मेरे सहित डॉ शल्य,
संधु जी एडवोकेट शर्मा जी जैसे वरिष्ठ नागरिक गलन वाली सर्दी के बावजूद भी गाने और
नृत्य के आयोजन मे सदस्यों के उत्साह और
आनंद मे लेश मात्र भी कमी न आने दी।
कटारिया जी यहाँ भी छुपे रुस्तम निकले अपनी प्यारी कशिश आवाज मे "मेरी नज़रों की तरफ देख जमाने पे
न जा, दिल की आवाज भी तू,
मेरे फँसाने पे न जा...... जैसे दर्द भरा
नगमा सुना खूब वाह वाही बटोरी। शुभा जी की
बच्ची का गायन "तेरी ये जमी, तेरा आसमां,
तू बड़ा मेरहरवां, तूँ बकशीश कर। तेरी ये
जमी................ । बहुत ही शानदार था। इन सबके उपर पुष्कर जी का डांन्स युवा बच्चों के साथ....वाह वाह! क्या कहने! अनमोल! शानदार!,
जानदार! था।
25 जनवरी के दिन की समाप्ती इतनी प्यारी
होगी जिसको शब्दों मे व्यां करना मुश्किल है। मै चाहता तो था 26 जनवरी को भी इसी
अंक मे समेट बुरान्सखंड की यात्रा का समापन करूँ लेकिन संभव नहीं हो पा रहा है
इसलिये इस अंक के शीर्षक मे संशोधन कर यात्रा का समापन अगले अंक के भाग 3 मे
करूंगा।
विजय सहगल







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