शनिवार, 6 फ़रवरी 2021

श्री रामपुरी गोस्वामी (पुरी मास्साब)

 

"श्री रामपुरी गोस्वामी (पुरी मास्साब)"





1980-90 के दशक तक झाँसी का कोई गली  मोहल्ला ऐसा नहीं होगा जहां पर  हाई स्कूल, इंटर के विध्यार्थी पुरी मास्साब से परिचित न हो या उनका विध्यार्थी न रहे हों। हिन्दी माध्यम के विध्यार्थियों के लिये अँग्रेजी किसी "हऊआ" (अदृश्य भूत) से कम न होती थी। छठवि क्लास से एबीसी की शुरुआत कर दसवीं, बारहमी तक अँग्रेजी मे पारंगत होना कोई आसान काम न था। पर अँग्रेजी विषय का अध्यापन मे पुरी मास्साब का कोई शानी उन दिनों झाँसी मे न था, जिनके कारण अँग्रेजी विषय हम जैसे अनेकों विध्यार्थियों के लिये आसान बना दिया था। उनके पढ़ाने की आश्रम व्यवस्था ने उनके ऋषिकुल को  अन्य अध्यापकों से अलग रखा था। हाई स्कूल एवं इंटर की कक्षाओं के पाठ्यक्रम मे अँग्रेजी विषय की प्रोज़, पोएट्री हो या शॉर्ट स्टोरी अथवा गुरुदेव रवीद्र नाथ टैगोर द्वारा लिखित नाटक "sacrifice"। इन पुस्तकों का  ही अनुवाद एवं व्याकरण की चर्चा उनके नित्य कार्यक्रम का हिस्सा रहती थी। उनकी क्लासेस उनके घर के पिछवाड़े बने एक खुले आँगन अथवा आँगन के ही बगल मे बने एक बड़े हाल मे मौसम के हिसाब से होती थी। सर्दी की खुली धूप या गर्मी की शाम मे आँगन का उपयोग होता बाकी समय प्रायः हाल मे ही पढ़ाई होती।  सुबह 5-6 बजे से अध्यापन का कार्य शुरू होता जो रात्रि  7-8 बजे तक निरंतर चलता। एक बैच मे 40-45 तक बच्चे होते। उस समय के हिसाब से न के बराबर फीस 5-6 रूपये ली जाती थी, जिसमे आधे से अधिक बच्चे निशुल्क पढ़ते थे।

हाल के बीच मे लगे तखत पर योगासन या सुखासन  की मुद्रा मे बैठ कर  प्रातः से कक्षाओं की शुरुआत हो जाती। पढ़ाई के साथ साथ ही उनके नाश्ते, भोजन और रात्रि  भोजन का क्रम लगातार क्लास मे ही  चलता रहता। अल्पाहार और योग के कारण मैंने उनकी 80 वर्ष की काया को भी "पहला सुख  निरोगी काया" को चरितार्थ होते एवं सक्रिय रूप से बच्चों के अध्यापन कार्य करते देखा।   उनके पढ़ाने का एक अलग ही ढंग था जिसके कारण उनके अध्यापन मे छात्रों के बीच एक रोचकता एवं निरंतरता  बनी रहती। क्लास की शुरुआत मे अँग्रेजी मुहावरों का अर्थ एवं वाक्य प्रयोग का पाठन नित्य का क्रम था। श्री करमाकर द्वारा लिखित अँग्रेजी व्याकरण की पुस्तक का  उपयोग नित्य अध्यापन का हिस्सा थी। स्कूल के पाठ्यक्रम मे शामिल प्रोज़, पोएट्री, शॉर्ट स्टोरी एवं प्ले या नोबल का उपस्थित छात्रों से ही पहले हिन्दी अनुवाद कराया जाता और पुनः उसी हिन्दी गध्य के भावार्थ को अँग्रेजी मे सरल रूपांतर करा उत्तर के रूप मे संरक्षित कर दिया जाता।  जिसका  नित्य पठन पाठन  सारे विध्यार्थीयों को स्वतः ही कंठस्थ हो जाता। इस क्रम की सबसे बड़ी विशेषता ये थी कि हिन्दी से अँग्रेजी अनुवाद की प्रत्येक छात्र की कॉपी को पुरी मास्साब स्वयं देर रात तक अपने हाथों जाँचते एवं लाल स्याही के पेन से आवश्यक संशोधन के बाद उसी रूपांतर को अंतिम रूप दे देते। अनुवाद मे आवश्यक संशोधन के बाद अच्छे बुरे अलंकार या उपाधि  लिखना वे न भूलते। जिसकी न्यूनतम उपाधि "गधा" भी थी।  दिन भर मे आने वाले 300 से उपर छात्रों की कॉपी को हर दिन देर रात तक स्वयं  जाँचना कोई आसान काम न था। वास्तव मे ये एक बहुत बड़ी तपस्या, छात्रों के प्रति  उनका समर्पण एवं त्याग ही था जो झाँसी मे उनके  विध्यार्थीयों को उन्हे अपने जीवन के हिस्से के रूप मे आदर और सम्मान देकर याद करने मे नहीं चूकते।   

पुरी मास्साब ने अपनी आय का एक बहुत बड़ा हिस्सा  झाँसी के स्कूल और विध्यालयों और महाविध्यालयों मे दान किया, यही कारण था कि वे उन दिनों  झाँसी के छोटे-बड़े शिक्षा संस्थानों की संचालन समिति मे प्रमुख पदों पर निर्विवाद और निर्विरोध रूप से चुने जाते रहे। मै भी लगभग चार साल तक पुरी मास्साब के गुरुकुल का विध्यार्थी रहा। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि मेरी दोनों बहिने एवं चचेरे भाई हरी भैया भी पुरी मास्साब के विध्यार्थी तो थे ही, मेरे पिता जी भी उनके शिष्यगणो  मे शामिल थे। झाँसी के  ऐसे अनेक विध्यार्थी होंगे जिनकी दूसरी पीढ़ी को पुरी मास्साब ने पढ़ाया होगा लेकिन कोई शंका नहीं कि तीसरी पीढ़ी का भी कोई छात्र शायद  उनसे पढ़ा हुआ मिल जाये!

"सादा जीवन, उच्च विचार" मे आस्था और निष्ठा रखने वाले, योग का अनुसरण करने वाले एवं सदा साईकिल पर भ्रमण करने वाले पुरी मास्साब की एक खूबी और भी थी कि जब कोई विध्यार्थी परीक्षा उत्तीर्ण कर उन्हे खाने पर आमंत्रित करता तो रविवार की  दोपहर को वे आथित्य अवश्य स्वीकार करते पर उनकी बस एक ही शर्त होती कि उनके भोजन मे मिष्ठान के रूप मे "मालपुआ" आवश्यक रूप से शामिल हों। उन्हे मालपुआ वेहद पसंद था। इंटर की परीक्षा मे उत्तीर्ण होने पर उन्होने हमारा आथित्य भी स्वीकार किया था। वो पल मेरे जीवन के सुखद पल थे जब पुरी मास्साब का घर मे स्वागत करने का सौभाग्य  मुझे अपने पिता जी के साथ  उनके शिष्य के रूप एक साथ प्राप्त हुआ था।

पुरी मास्साब के घर रूपी आश्रम के तीर्थाटन की जिज्ञासा ने मुझे 3 जनवरी 2021 को उनके ऋषिकुल की ओर लगभग 45 वर्ष पश्चात चलने को प्रेरित किया। 45  साल मे आए विकास के  बदलाब से घर को ढूड्ने कुछ कठिनाई तो हुई लेकिन हैंडपम्प पर  पानी भर रहे एक सज्जन ने मार्ग दर्शन कर सहायता की, कि आप उनके घर के ही सामने खड़े है। घर की कॉल बेल बजाने पर जिन सज्जन ने औपचारिक परिचय हुआ वे उनके भतीजे श्री सुरेश गोस्वामी जी थे। अपने आशय को प्रकट करने के बाद श्री सुरेश एवं उनके पुत्र विकास गोस्वामी ने हमे अपनी बैठक मे आमंत्रित किया। स्वल्पाहार पर काफी देर उन दोनों से चर्चा हुई। 1992 मे उनके देहावसान के साथ ही शिक्षा के क्षेत्र मे समर्पित एक दैदीप्तिमान सितारे का अंत हो गया। पर उस तारे की कीर्ति एवं प्रकाश  झाँसी के शिक्षा जगत का मार्ग दर्शन शताब्दियों तक करता रहेगा। बैठक मे पुरी मास्साब एवं उनकी अर्धांग्नि के चित्र को देख वीते हुए दिनों की यादें आना स्वाभाविक था। सुखद दिनों की यादों मे अपने श्रद्धा सुमन, भावांजली अर्पित कर नमन किया। अविस्मरणीय सुखद पलों को एकबार पुनः स्मरण कर मैंने श्री सुरेश गोस्वामी एवं उनके पुत्र से बिदा ली।          

विजय सहगल


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