शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

गोहद का किला (भाग-1)

 

"गोहद का किला" (भाग-1)

















दिनांक 19 फरवरी 2021 को मेरे सामने दो लक्ष्य थे। पहला गोहद का किला जो ग्वालियर से 46 किमी॰ था जबकि दूसरा अटेर का किला जो लगभग 100 किमी॰ था। दोनों ही किले मध्य प्रदेश भिंड जिले मे स्थित है।  अंततः कम दूरी की बजह से गोहद को वरीयता दे मैंने गोहद फोर्ट देखने का निर्णय लिया। दोपहर लगभग 12 बजे बसंती खुशनुमा मौसम मे मोटरसाइकल पर सवार राष्ट्रीय राजमार्ग 92 के दोनों ओर हरे भरे गेहूं और सरसों के खेतों से गुजरना एक  सुखद और यादगार पल थे। अब तक इस राष्ट्रीय राजमार्ग पर अनेकों बार निकलने पर मै गोहद चौराहे को ही गोहद कस्बा समझता था पर उस दिन हमे ज्ञात हुआ कि मूल गोहद छोटा सा शहर जो राष्ट्रीय राजमार्ग से 5 किमी॰ दूर है पर हाईवे से कस्बे तक पक्की चार लेन मार्ग से जुड़ा होने पर यात्रा सुगम थी।

कस्बे के अंतिम छोर पर स्थित गोहद के किले की ऊंची ऊंची दीवारों के मध्य एक पक्की सड़क को देख आभास हो रहा था कि सड़क के दोनों ओर जाट  राजाओं द्वारा निर्मित किले की आलीशान इमारते अपने वैभव की कहानी कह रही हों। सड़क के बाएँ तरफ लोहे के गेट के अंदर से हम लोगो गोहद किले मे प्रवेश किया। हम लोगो की हमारी इस यात्रा मे किले के प्रवेश द्वार पर  गोहद शहर के वरिष्ठ पत्रकार श्री भगवती प्रसाद कटारे जी मुलाक़ात सुखद संयोग थी। उन्होने किले के भ्रमण एवं इतिहास से परिचय करा हमारे भ्रमण को सुखद एवं यादगार बना दिया।   16वी 17वी ई॰ के  इस किले का निर्माण जाट राजा महा सिंह और भीम सिंह ने कराया था। किले परिसर के भग्नावशेष अपने वैभव की मौन कहानी कह रहे थे। "खंडहर बता रहे है इमारत बुलंद थी" के सूत्र वाक्य के आधार पर मेरा दृढ़ मत है कि किले का निर्माण जाट राजाओं की वीरता, बहदुरी  एवं राज्य के वैभवशाली गाथा उनके  अपने इतिहास मे समाहित  है। बड़े बड़े दालानों के बीच छोटे बड़े आँगन महल के राजाओं की पद और गरिमा के हिसाब से बनाई गयी थी। वरांडे एवं दालानों पर विभिन आकारों के खंबे जिन पर बहुत बारीक आकर्षक नक्काशी की गई थी। प्रवेश द्वारों पर वर्गाकर पत्थरों पर खूबसूरत ज्योमिति एवं पशु पक्षियों एवं पुष्पों की आकृति जहां तहां उकेरी गयी थी। इन आकृतियों को सफ़ेद समुद्री कौड़ी को पीस कर अन्य तत्वों को मिले पेस्ट से उकेरा/बनाया गया था। जो आज भी मौसम और समय के  धपेड़ों  के विरुद्ध सीना तान के किले की संपन्नता और वैभवता की कहानी कह रही हो।  लेकिन किले के अधिकतर महल खंडहर अवस्था मे थे। पुरातत्व विभाग यध्यपि किले के रख रखाव का प्रयास कर रहा है पर जो नाकाफी है! जौहर महल, सप्तवदी महल का रखरखाव साफ दिखाई दे रहा था पर अन्य महलों के पत्थर के  टूटे सहतीरे, दीवारे, दहलीज़, दरवाजे एवं छतरियाँ के रख रखाव की शीघ्र आवश्यकता है। किले की कुछ बुर्जे समय को चुनौती दे  अपने मूल रूप मे खड़ी थी पर कुछ दो तीन मंजिली इमारते समय से टक्कर ले हताशा और निराशा मे अपनी पराजय स्वीकार कर रुग्ण अवस्था मे खड़े हो अपने अवसान की राह देखती प्रतीत हो रही थी।

काली चरण बाथम जो कि इस पुरातन धरोहर की चौकीदारी कर रहे थे। यूं तो मध्यप्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा समुचित प्रचार प्रसार न होने के कारण पर्यटकों की आमद कम ही है। पर जो स्थानीय पर्यटक भी आते है उनके लापरवाह व्यवहार एवं समुचित स्टाफ के अभाव के कारण एवं  कचड़े का समुचित निष्पादन संभव न होने के कारण नाश्ते, खाने, कोल्ड ड्रिंक्स आदि के पैकेट यहाँ वहाँ दिखाई दे जाएंगे। लगभग डेढ़-दो घंटे श्री कटारे जी के सानिध्य एवं किले का भ्रमण समाप्त कर पुनः प्रवेश द्वार पर पहुँच यात्रा पूरी की। श्री कटारे जी की मातृ भूमि से प्रेम की तारीफ करनी होगी मेरे द्वारा किले के रखरखाव पर जब जब टिप्पड़ी की उन्होने बखूबी बचाव कर जहां तहां रख रखाब और इमारत की चूने मौरंम से की गई मरम्मत को दिखाया। पत्रकार से अधिक एक अच्छे शहरी से मुलाक़ात सुखद थी।

किले के सामने ही स्थित पाँच मंज़िला नया महल, दरबार हाल या रानी महल आज भी अपनी भव्यता, वैभवता एवं शानदार वास्तु निर्माण का अद्भुद नमूना देख  महल के लिये प्रस्थान किया। महल के प्रवेश द्वार पर ही जाट राजा श्री भीम सिंह की एक विशाल घुड़सवार प्रतिमा लगी थी जिसके चेहरे पर एक कपड़ा लपेटा गया था। पत्रकार श्री कटारे जी ने बताया ये मूर्ति दो साल से राजनैतिज्ञों द्वारा उद्घाटन की बाट जोह रही है। ये समय की बलिहारी ही कही जायेगी कि अपने समय मे शूरवीरता, पराक्रम, शौर्य  और साहस की प्रतिमूर्ति रहे राजा भीम सिंह की प्रतिमा आज मुंह छुपा अपनी बेबसी, विवशता, और लाचारी पर आँसू बहा रही होगी जो एक अदद ऐसे नेता के इंतज़ार मे उद्घाटन की आश मे दो साल से खड़ी है जिनकी हैसियत उनके राज दरबार मे एक अदने से "साईस" (घोड़े का सेवादार) से ज्यादा न रही हो।

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