मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

एक किसान से साक्षात्कार

#किसान से साक्षात्कार#






पिछले एक-दो महीने से किसानों के आंदोलन की तस्वीरें, विडियो, किसान नेताओं की बड़ी बड़ी बाते देख और सुन कर लगा क्यों न मुझे भी देश के किसान से मिल कर उसके दुःख को समझना चाहिए? पर ड्राइंग रूम मे लगे सोफ़े पर पैर फैलाकर, चाय की चुस्कीयों के बीच टीवी मे देख कर किसानों को पहचानना, जानना कठिन था। अतः मैंने दिनांक 02 दिसम्बर 2020 को किसान से रुबारू होने का निश्चय किया। अपने पटना प्रवास मे कालीघाट से गंगा नदी के पार छिछले पानी मे उतर, गंगा का आचमन कर, बाढ़ की  जमा बालू पर आगे बढ़ा।  पैंट को घुटनों तक मोढ़ बालू के रेगिस्तान पर जूते पहन कर चलना सुखद न लगा। सौ-दो सौ मीटर बालू के रेगिस्तान मे चलने मे असुविधा महसूस होने पर जूतों का सहारा लेने की अपेक्षा जूतों को ही सहारा देना श्रेयस्कर मान उनको हाथों मे ले खेतों की पगडंडी पर चलने लगा।  बालू के ऊंचे टीले पर चढ़ने पर दूर दूर तक खेतों मे हरियाली देख मन प्रफ़्फुलित हो गया।

कुछ किसान बीन्स की नन्ही नन्ही पौध को खाद  देते नज़र आये। कुछ खेतो मे निराई करते दिखे। चूंकि खेतों मे पानी दिया जा चुका था इसलिये मेड़ पर बनी  पगडंडी पर कीचड़ जमा था। पैर कीचड़ से सराबोर थे।   कुछ दूर खेतों के बीच दिखाई देने वाले एक किसान दंपति से मुलाक़ात करने का निश्चय कर अपनी पत्नी के साथ आगे बढ़ा। किसान की झोपड़ी के बाहर भोजन ग्रहण रहे दंपति से राम-राम कर अभिवादन किया। थोड़ी औपचारिकता के बाद मैंने अपना परिचय दे उनका नाम पूंछा। "कृषन सिंह नाम था", उस मेहनतकश किसान का। झोपड़ी के चारों ओर चना, सेम, मूली, तुरई, लौकी आदि की पौध निकल आई थी। बात चीत का सिलसिला चला तो कृष्ण सिंह की धर्मपत्नी ने बताया की इसी झोपड़ी मे कई दिनों रुकना होता है। टीवी पर आंदोलन के दौरान बंट रहे बादाम काजू को देख मुझे उम्मीद थी किसान दंपति मेरा स्वागत काजू बादाम से करेंगे, पर ऐसा हुआ नहीं। मुझे लगा शायद बादाम का कनस्तर किसान ने अपनी झोपड़ी मे छुपा कर रखा हो? लेकिन तमाम ताख-झाख के बाद मै गलत था। 12X10 फुट की झोपड़ी मे सिवाय आटे की बोरी और नमक की डली के कुछ न दिखा।

मै सोचने को मजबूर था कहीं तो कुछ गड़बड़ है या तो  किसान कृषन सिंह की वास्तविक धरातल रूपी कड़वी सच्चाई जिससे मै रु-बा-रु हो रहा था या तो टीवी पर आंदोलन मे दिखाई जा रहे बादाम वितरण और ठंडाई मे सूखे मेवे की घुटाई? मुझे कहते हुए कोई शंका नहीं की मुझे अपनी घटिया और गिरी हुई उस सोच पर अफसोस हुआ  था जब मैंने उस किसान की झोपड़ी मे बादाम और काजू के कनस्तर की तांख-झाँख की थी।  एक तरफ टीवी पर दिखाया जाने वाला तथाकथित सच ही सच था? या जो सच  मै साक्षात किसान की झोपड़ी मे देख रहा था? झोपड़ी के एक कोने मे चूल्हा और दूसरे कौने मे बांस की खप्पचियों को जमीन मे गाढ़ 3-4 फुट ऊंचे मचान की  तरह आकृति बना पलंग बनाया गया था जिस पर विस्तर विछा था। मचान के नीचे बोरी मे शायद आटा या चावल या दोनों ही थे। एक ओर दिल्ली के बार्डर पर ट्रक और ट्रैक्टर को परिवर्तित कर आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित स्नानालय, टॉइलेट, शयन कक्ष थे वही दूसरी ओर मेरे सामने कृषन सिंह की ये छोटी सी झोपड़ी रूपी शयनकक्ष था जिससे लगे खुले आसमान के नीचे ही उसका ड्राइंग रूम, और बाथरूम और हाँ लैट्रीन भी थी जो लंबाई चौड़ाई के मामले मे आंदोलनरत किसानों के ट्रैक्टर, ट्रक के परिवर्तित ढांचे से बड़ी ही नहीं बहुत बड़ा  थी, कुछ  कुछ कृषन सिंह के बुलंद और ऊंचे हौसलों की तरह।  

आंदोलनरत किसानों की कार, ट्रैक्टर एवं ट्रॉली, कहीं कहीं घोड़े एवं शानो-शौकत के अन्य वस्तुओं और मोबाइल जैसे आधुनिक  उपकरणों की संपन्नता देख प्रन्नता होना स्वाभाविक थी। किसानों के आर्थिक संपन्नता और विकास देश के आर्थिक विकास की कहानी स्पष्ट कर रहा था। पर कृष्ण सिंह के हुलिया और रहन सहन देख मुझे हिम्मत भी नहीं हुई कि कृष्ण सिंह से पूंछे कि उसके पास कौन सी कार या ट्रैक्टर है। मुझे लगा ये पूंछ कर मै जाने अनजाने उसका अपमान न कर बैठूँ और जाने अनजाने पाप का भागीदार भो बनूँ!! चना-चबैना से अपना नाश्ता करने वाले एवं मोटे सूखे टिक्कड़ और प्याज से अपना भोजन करने वाले कृषन सिंह से मै आँख मिला कर ये न पूंछ सका कि उसने काजू-किशमिश कहाँ छुपा कर रखे है और क्यों नहीं मुझे भी काजू-किशमिश खिला स्वागत सत्कार कर रहे हो? मै मन ही मन अपराध बोध से ग्रसित था कि आंदोलनरत किसानों या उनके  नेताओं मे एक भी किसान नेता का चेहरा/हुलिया किसान कृषन सिंह से मिलता जुलता क्यों  नहीं दिखा?

मै जनता हूँ और मानता भी हूँ कि बेशक मेरा खेतों मे भ्रमण या किसान से मिलना महज ड्रामा हो सकता हो? पर  इस मे लेश मात्र भी संशय नहीं कि किसान कृषन सिंह के जीवन मे मुझे अंश मात्र भी ड्रामा दिखाई दिया हो!! उसका अभावों और  कठिनाइयों से  भरा जीवन यथार्थ से परिपूर्ण और वास्तविकता के धरातल से जुड़ा था। यही अभावों की  कहानी देश के हर छोटे किसान, बटाईदार किसान और कृषि मजदूर की है जिससे इंकार नहीं किया जा सकता। क्या इस  भोले भाले किसानों कृषन सिंह या उन जैसे अन्य किसानों से अपेकक्षा  की जा सकती है कि अपनी खेती किसानी छोड़ कुछ दिन के लिये राजनैतिक आंदोलन मे शामिल हो सके?

विजय सहगल            

 


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