"सारथी"
श्रीमद्
भगवत, पथ प्रदर्शक।
गीता के संदेश सार्थक॥
छूटें
जन्म-मरण के दुःख से।
बाणी
गीता, "श्री हरि" मुःख से॥
कृष्ण-भक्त, निर्भय
निरंतर,
फिर
क्यों भय, यम तुमसे करूँ मै।
पल
एक निश्चित, जब है तुम्हारा,
हरेक
पल क्यों तुमसे डरूँ मै॥
धर्म
पथ पर पग बढ़ाना,
मोह
के बंधन, टूटे है काफी॥
मानपमान
को परे तू हटाके,
भाव
समदर्शी दया और माफी॥
काम, क्रोध, मद-लोभ, मोह,
मानव!
ये शत्रु परम स्वार्थी
है।
उठा
गाँडीव अब प्रत्यंचा चढ़ाओ,
करो नाश अरि का,
बना सारथी मै॥
कुरुक्षेत्र के रण का जय घोष कर दो।
कर्तव्य पथ का गणकोष भर दो ॥
जब-जब होगी,
धर्म की यूँ हानि।
अधर्म आचरण जो करे मन की मानी॥
अभय श्रेष्ठ को,
भय दुर्जनों को,
संहार उनका करेगा
सुदर्शन।
हर युग मे आऊँगा अवतार लेकर,
करें वेशधारी "मुरारी" का दर्शन॥
योगेश्वर श्री कृष्ण जहां हैं।
धनुर्धर अर्जुन
वहाँ
है॥
गीता का ये सार गीत है।
विजय विभूति, अचल
नीति है॥
विजय सहगल

1 टिप्पणी:
अद्भुत अनुभव
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