हल्का जलपान लेने के बाद पुनः सड़क पार कर गढ़ी पढ़ावली के परिसर मे प्रवेश किया और भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रति मन मे कृतज्ञता का भाव वहाँ कि सफाई और रखरखाव देख कर एक बार फिर जागा। इस सफाई व्यवस्था को बनाये रखने मे यहाँ के एक कर्मचारी द्वारा एक पर्यटक से हील-हुज्जत करते देखा बाद मे बात करने पर उसने बताया कि खाना खाकर बचे कचरे का यहाँ वहाँ घास के मैदान मे छोड़ने पर बहस हो रही थी। ऐसे छोटे कर्मचारियों को सफाई आदि बनाये रखने के लिये काफी मेहनत मशक्कत करनी पड़ती है।
इसी कर्मचारी श्री राजबीर ने फिर बाद मे हमे गाइड के रूप मे गढ़ी का इतिहास बताया। गढ़ी शब्द से तात्पर्य छोटे किले से है। जिसे राजशाही शासन मे छोटे ओहदेदार, जागीरदार (ग्राम स्तर) के निवास करते थे। पर यहाँ गढ़ी पढ़ावली एक प्राचीन शिव मंदिर है जो छोटे किले मे स्थापित है। पढ़ावली मे बाहर से निर्माण किले नुमा बुर्ज के आकार का है जो जमीन से लगभग 35-40 फुट ऊंचे चबूतरे पर 10वी शताब्दी का एक प्राचीन मंदिर का वर्गाकार मंडप बनाया गया था। हमे लगता है ये एक ऐसा मात्र मंदिर है जो गढ़ी मे बनाया गया है अन्यथा गढ़ी प्रायः पुराने समय मे छोटे राजे रजवाड़ों जागीरदारों का निवास हुआ करती थी। मंडप पर पहुँचने के लिए 35-40 सीढ़ियाँ बनाई गई है। पहली सीढी के दोनों ओर शेर की दो पैरों पर सजग मुद्रा मे बैठी मूर्ति दोनों ओर बनी है। सीढ़ियों के दोनों ओर किले के बुर्ज का आकार लेती ऊंची ऊंची बुर्ज बनी है।
श्री राजबीर ने मंडप मे पत्थरों पर उत्कीर्ण रामायण दुर्गा और शिव पूजा के प्रसंग के दर्शन कराये जो मंडप के चारों ओर अंदर की तरफ बनाये गये थे। इस मंडप के दूसरी ओर भी दूसरा मंडप प्रतीत होता था जिसके भग्नाव्शेष अंदर पड़े दिखे। अंदर प्रांगढ़ मे दाहिनी तरफ महल नुमाो 3 मंजिला भवन इस बात का प्रतीक लग रहा था कि शायद गढ़ी मे जागीरदारों या मंदिर के पुजारियों के निवास हों। छत्त पर चढ़ कर मंडप का द्रश्य काफी सुंदर दिख रहा था। गढ़ी की प्राचीर से गढ़ी के प्रवेश द्वार घास के मैदान और अन्य बुर्ज भी अपनी सुंदर छवि प्रादर्शित कर रही थी। गढ़ी पढ़ावली के छोटे और सुंदर पर पुरातात्विक द्रष्टि से महावपूर्ण पर्यटन स्थल को देख कर काफी प्रसन्नता का अनुभव हुआ। यात्रा दिनांक 18 नवम्बर 2019॰ (इस यात्रा के अंतिम पढ़ाव-64 योगिनी मंदिर मितावली अगली पोस्ट मे)
विजय सहगल








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