बटेश्वर मंदिर श्रंखला, मुरैना, म॰प्र॰
18 नवम्बर 2019 को ही शनीचरी मंदिर से प्रस्थान कर अब हमारा अगला पढ़ाव बटेश्वर मंदिर श्रंखला थी। दिशा सूचक बोर्ड के अनुसार बटेश्वर की दूरी यहाँ से 8 किमी थी। शनीचरी मंदिर से रास्ता पक्का लेकिन सिंगल सड़क थी जो निपट सुनसान जंगल के इलाके से होकर जा रही थी। रास्ते मे इक्का दुक्का व्यक्ति ही दिख रहे थे। इन कंटीले पेड़ो के जंगल के बीच आगे रास्ता दो भागों मे बंट गया। हमे किस रास्ते जाना था यहाँ कोई भी दिशसूचक बोर्ड या बताने बाला कोई आसपास न दिखा। अकड़-बकड़-बम्बे बोल........ कर बायें तरफ की रोड पकड़ ली, और जैसा होता है गलत रास्ता ही पकड़ हम उसी रास्ते पर बढ लिये। 4-5 किमी तक कोई भी व्यक्ति न मिला जिससे बटेश्वर का रास्ता पूंछते पर खुशी इस बात की थी रास्ता पक्का था इसलिये अपनी धुन मे मस्त उढ़ते पंछी की तरह बिलकुल शांत सुनसान सड़क पर आगे बढ़ते रहे। दूर दूर तक कंटीले पेड़ो के जंगल ऊंचे पहाड़ो मे नज़र आ रहे थे। एक दम सुनसान। तभी सड़क से हटके दूर एक व्यक्ति जो अपने जानवरों को चरा रहा था, ज़ोर से आवाज देकर बटेश्वर का रास्ता पूंछा? उसने बापस जाने का इशारा कर पीछे छूटे दोराहे पर दूसरी रास्ता पकड़ने को कहा जो गाँव से होकर जाती है। हम जिस रास्ते पर थे वो आगे एबी रोड पर स्थित बनमोर ग्राम जा रही थी। हमने मोटर साइकल को बापस यू टर्न लेकर पुनः4-5 किमी बापस दोराहे पर पहुँच कर सही रास्ते पहुंचे। अब गाँव मे कुछ आवादी नज़र आई। एक दो ग्रामीणों से पुनः सुनिश्चित किया कि हम सही रास्ते पर है। आगे अब खुला इलाका था दूर दूर तक खेत नज़र आये। खेतों मे सरसों की छोटी-छोटी पौध धरती को चीर कर बाहर निकल रही थी। पोरसा शाखा के प्रवास पर हमे मालूम था कि सरसों की खेती मे बीज रोपने के बाद बहुत मेहनत नहीं करनी पढ़ती। एकाध पानी देने के बाद सर्दी की नमी से फसल लहलहाने लगती है और जंगली जानवर भी सरसों की फसल को नहीं खाते इसका आजकल अंदेशा बहुत रहता है। इसी बीच रास्ते मे मधु मक्खियों का एक बड़ा झुंड सड़क से 15-20 फुट ऊंचे सड़क से गुजरता नज़र आया। जल्दी ही हेलमेट की स्क्रीन को नीचे कर तेज स्पीड से मोटर साइकल को वहाँ से निकाला। आगे इसी सरसों की फसल मे फरवरी माह मे खेतों मे दूर दूर तक सरसों के पीले-पीले फूल नज़र आयेंगे जो होली के त्योहार के आने की पूर्व सूचना देते है। बटेश्वर आने के कुछ किमी दूर सड़क के दोनों ओर पत्थरों की गहरी गहरी खदाने नज़र आ रही थी। खदान मे पत्थर का खनन होने के कारण काफी गहमा गहमी नज़र आ रही थी। बड़ी बड़ी जेसीबी मशीनों से पत्थरों को उठाया जा रहा था। जेनरेटर के माध्यम से पत्थरों मे ड्रिल मशीन की आवाज़े आ रही थी। मुरैना जिला दुर्भाग्य से अवैध रेत और पत्थर खनन के लिये कुख्यात रहा है। कुछ साल पूर्व इन्ही अवैध खदानों मे खनन के कारण एक आपराधिक घटना मे एक भारतीय पुलिस सेवा के एसपी की मौत हो गई थी। अब हमे उस व्यक्ति की याद आ रही थी जिसने शनीचरी मंदिर के रास्ता पूछने पर हमसे पूंछा था क्या कुछ जांच करने आये हो? जब हमने उसे बताया था कि हम दिल्ली से आये है। यहाँ अवैध पत्थर खनन के कारण आये दिन आपराधिक घटनायें घटती है जिनके कोर्ट कचहरी, जांच आदि करने अधिकारी आते रहते है और मामले चलते रहते है। इसीलिये हमने खदानों की फोटो लेने मे पूर्णतया: परहेज किया ताकि जांच अधिकारी होने की आशंका को निर्मूल सिद्ध करें क्योंकि मुखबिरी की कोई भी शंका रेत और पत्थर माफिया आपके लिये कोई भी मुसीबत ला सकते है।
गाँव से निकल कर 4-5 किमी आगे सड़क किनारे लोहे की जाली से घिरी बाउंड्री बाल नज़र आती है मुख्य गेट से 2-3 सौ मीटर आगे बढ़ने पर दाहिनी तरफ स्कूटर एवं कार पार्किंग की समुचित व्यवस्था की गई थी। इस 2-3 सौ मीटर रास्ते को देख कर ऐसा प्रतीत नहीं होता की अंदर पुरातात्विक दृष्टि से सम्पन्न बटेश्वर मंदिर श्रंखला भी हो सकती है। साफ सुथरा टॉइलेट भी उपलब्ध था जिसका हमने इस्तेमाल कर लाभ उठाया। पर इसके अलावा चाय पान की कोई व्यवस्था यहाँ उपलब्ध नहीं थी। प्रचार प्रसार के अभाव मे सिर्फ 4-5 पर्यटक ही नज़र आ रहे थे जो स्थानीय या आसपास के क्षेत्र के निवासी ही प्रतीत हो रहे थे। यहाँ से मंदिर श्रंखला दूर से ही दीख रही थी। प्रवेश करते ही हरी घास के मैदान के पार साफ सुथरे चबूतरे पर एक कतार मे सुंदर, सुव्यवस्थित, मंदिर की तीन-चार कतारें देखने मे बड़ी मनोहारी नज़र आ रही थी। सुंदर साफ हरे घास के मैदान इस सुंदरता मे चार चाँद लगा रहे थे। पहली दृष्टि मे ही इस मंदिर श्रंखला को देखकर अल्मोड़ा स्थित जागेश्वर धाम की याद हो आई। वहाँ भी ठीक इसी तरह एक ही परिसर मे अनेकों मंदिर इसी तर्ज़ पर बने है।
प्रवेश के रास्ते पर सबसे पहले लगभग 25-30 ऊंची सीढ़ियों के उपर विशाल चबूतरे पर एक मंदिर था जो नीचे से पूरी तरह नज़र नहीं आ रहा था। उपर चढ़ने पर विशाल चार वर्गाकार मंडप से घिरा मुख्य मंडप मंदिर खजराहों मंदिर की तरह लग रहा था। उक्त मंदिर के दर्शन और वास्तु निर्माण खुश नुमा मौसम मे आँखों को सुखद और सुंदर दिखा, इसे देखने के बाद सीढ़ियों से उतरकर हम मंदिर श्रंखला को देखने के लिये बढ़े। दो ऊंचे ऊंचे कलात्मक स्तम्भ रुपी प्रवेश द्वार की तरह प्रतीत हो रहे थे। पहाड़ी की ढलान पर सुंदर घास का बड़ा मैदान बनाया गया था। हल्की चढ़ाई के बाद एक विशाल समतल चबूतरे पर 7-8 मंदिर एक लाइन मे श्रंखलावद खड़े नज़र आ रहे थे। हर पंक्ति की श्रंखला मे चबूतरे के लगभग 2-3 फुट उपर चबूतरे पर मंदिरों की अगली श्रंखला बनी थी। इस तरह 4-5 मंदिरों की श्रंखला एक के उपर एक समतल चबूतरे पर बहुत ही नयनाभिराम लग रही थी। नीचे दूर बने घास के मैदान से हरे-भरे पेड़ों की पृष्ठभूमि मे मंदिर का दृश्य बड़ा मनोहारी था। रात मे मंदिर परिसर मे फ्लड लाइट की भी व्यवस्था दिखी जो निश्चित ही रात्रि मे देखने का एक अलग ही सुखद अहसास कराती होगी। मंदिर की व्यवस्था मे लगे जयबीर से मुलाक़ात हुई उसने अपनी जानकारी अनुसार मंदिर का विवरण बताया। उसने बताया की इस जगह पर मंदिर के अवशेष यहाँ वहाँ पड़े थे। जिनकी पुनर्स्थापना अयोध्या के राम मन्दिर मे अपनी पुरातत्विक राय देने से प्रसिद्ध हुए श्री के के मुहम्मद की देख रेख मे सम्पन्न हुयी है। कुछ मंदिरों की पुनर्स्थापना का कार्य अभी निर्माणाधीन है। एक मंदिर अपनी मूल अवस्था मे अधबना दिखाई देता है जिसकी तुलना मुरैना के ही ककनमठ के मंदिर से की जा सकती है जो अपने विशाल पत्थरों से अध बने मंदिर के रूप सैकड़ों साल से खड़ा है एवं यहाँ से 30-32 किमी दूर है। कई मंदिरों के मुख्य दरवाजे की उपर भगवान विष्णु के दशाव्तार को उकेरती मूर्तियों के दर्शन से होते है। इन मंदिरों का निर्माण काल 6-7 शदी ई पूर्व प्रतिहार काल के राजाओं द्वारा कराया गया बताया जाता है। एक छोटे मंदिर मे भगवान शिव अपने पंचमुखी रूप मे विराजमान है। अति प्राचीन मुख्य शिव मंदिर भूतेश्वर महादेव मे ग्रामीण मुख्य पर्वो मे पास मे ही स्थित कुंड का जल अर्पित कर अपनी श्रद्धा अर्पित करते है। उक्त मंदिर श्रंखला बहुत कुछ उत्तराखंड के अल्मोड़ा के पास स्थित जागेश्वर धाम की तरह प्रतीत होती है। ये बात अलग है कि जागेश्वर धाम जीवंत मंदिर, तीर्थ के रूप मे स्थापित है।
ऐसा बताते है इस स्थान पर छोटे बढ़े सैकड़ों मंदिर के अवशेष पड़े है जिनकी पुनर्स्थापना होना अभी बाकी है। मंदिर मे कुंड के किनारे एक हनुमान जी की मूर्ति भी रखी है जिसकी भी पूजा अर्चना आसपास के रहवासी करते है। दो विशाल स्तंभों के द्वार से पुनः निकल कर हम अपने अगले गंतव्य गढ़ी पढावली की ओर अग्रसर हुए।
लेकिन इस बात का उल्लेख करना मै अपना परम कर्तव्य समझता हूँ कि इस स्थान के रख रखाव के लिये पुरातत्व विभाग की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है। इस हेतु ये विभाग और जयबीर जैसे उनके कर्मठ कर्मचारी बाकई बधाई के पात्र है जिनकी कर्मठता के कारण पुरातत्व की इस अमूल्य धरोहर को सहज और सुंदर ढंग से संजोया और संवारा गया है। क्या ही अच्छा होता यदि म॰प्र॰ सरकार के सड़क विभाग और पर्यटन विभाग भी इसी समर्पण भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करते। (गढ़ी पढ़ावली और मितावली अगली पोस्ट मे)
विजय सहगल










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