मंगलवार, 19 नवंबर 2019

"शनीचरी मंदिर-ऐंती (मुरैना- म॰प्र॰) "



"शनीचरी मंदिर-ऐंती (मुरैना- म॰प्र॰) "
चंबल क्षेत्र मे स्थित मुरैना जिला, पुरातत्व की दृष्टिकोण से काफी समृद्धशाली है, पर पर्यटन की दृष्टि से प्रचार प्रसार और रोड की जुड़ाव या रोड का टूटा-फूटा होने और पर्यटन स्थल पर सुविधाओं की कमी के कारण पर्यटक देश के अन्य पर्यटन स्थलों के मुक़ाबले बहुत कम आते है। ग्वालियर से दिल्ली नोएडा अनेकों बार सड़क के रास्ते गये, हर बार बनमोर के बाइपास पर पढ़ावली बटेश्वर मितावली का एक बोर्ड देख कर जाने का प्लान अनेकों बार बनाया पर परिवार और मित्रमंडली मे कभी कोई तैयार तो दूसरा तैयार न होता इसी तरह प्लान टलता रहा। आज 18 नवम्बर 2019 को मौसम अच्छा था धूप मे तीखा पन कम था, हल्की सर्दी थी। आज मैंने किसी से चलने का आग्रह न कर अकेला ही मोटर साइकल का रुख भिंड रोड से मुरैना बाईपास के ओर मोड़ दिया। लक्ष था ग्वालियर से लगभग 28 किमी दूर शनीचरी मंदिर और बाद मे पढ़ावली-बटेश्वर और मितावली की सैर करना। ये चारों जगह एक ही रास्ते पर आपस मे कुछ किमी की दूरी पर जुड़े है। बाईपास के उसी बोर्ड पर पहुँच कर बताई दिशा अनुसार मार्ग का अनुसरण कर आगे बढ़ा। रास्ता धूल भरा था कुछ काम चल रहा था सोचा आगे रास्ता अच्छा मिलेगा और मन मे ये ही ईक्षा रख कर आगे बढ़ता रहा। पर रास्ता अच्छे होने की कहीं कोई आशा नज़र न आई। तभी एक ग्रामीण शिव शंकर जी जो गाय, भैंस चरा रहे थे से मैंने पूंछा क्या शनिचरा का रास्ता ऐसा ही है तो उन्होने बताया अभी रास्ता ऐसा ही कच्चा है तब हमे बड़ी कोफ्त हुई पर उनके द्वारा उनके घर चल कर भोजन करने के निश्चल एवं प्रेम भरे आग्रह ने हमे लगातार आगे बढ्ने के लिये प्रेरित किया। मध्य प्रदेश सरकार पर जिसका पर्यटन विभाग तो अपना कार्य मुस्तैदी से करता है पर सड़क परिवहन विभाग अपनी मंथर और ढुलमुल गति से ही कार्य करने मे मस्त है। सड़क तो चौड़ी बनाई जा रही थी पर जिस गति से काम चल रहा था लगता ही 4-5 साल तो लग ही जाएंगे। मैंने अपने ब्लॉग "गढ़ कुडार का किला" की सड़क के बारे मे भी (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/12/blog-post_11.html) ऐसी ही प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। शनीचरा रेल्वे स्टेशन से आगे से 2-3 किमी आगे धूल धूसरित रोड पर पहला पढ़ाव शनीचरी मंदिर था। जब एक रहवासी से हमने मंदिर का रास्ता पूंछा तो रास्ता बताते हुए उसने मुझ से पूंछा कि कहाँ से आए है। मेरे दिल्ली बोलने पर उसने पुनः पूंछा कोई जांच बगैरह कों आये का? मैंने न मे सिर हिलाया। इस जांच का अर्थ मुझे बाद मे पता चला जिसका जिक्र मे आगे की यात्रा मे करूंगा।
मंदिर के 1 किमी पहले रास्ता कुछ ठीक मिला सिंगल रोड थी पर पक्की और अच्छी थी। शनीचरी मंदिर के आधा किमी पहले एक छोटे से किले नुमा गढ़ी थी जो राधा कृष्ण मंदिर के नाम से जानी जाती है। प्राचीन मंदिर था मंदिर के महंत जी काफी बुजुर्ग थे जिनको प्रणाम कर मंदिर के दर्शन किए। भगवान राधा कृष्ण की प्राचीन मूर्तियाँ विराजमान थी। मंदिर के बाहर एक बहुत बड़ी कड़ाही और दूसरी समतल विशाल कड़ाही रखी थी मंदिर के उपमहंत जी ने बाताया कि जब कभी किसी भक्त की मनौती पूरी होती है तो मंदिर मे कड़ाही मे खीर और समतल कड़ाही मे मालपूए का प्रसाद बनाये जाते है।
बमुश्किल आधा किमी आगे सीमेंटिड रोड से जुड़े शनीचरी मंदिर पहुंचे। शनीचरी मंदिर की मुरैना चंबल क्षेत्र मे बड़ी मान्यता है। ऐसी मान्यता है कि विश्व का ये एक मात्र प्राचीन शनि देव मंदिर है। ऐसा बताते है शिर्डी के पास स्थित शनि सिगनापुर से भी प्राचीन ही ये मंदिर। मान्यताओं और कथाओं के अनुसार ग्राम ऐँती जिला मुरैना के इस मंदिर मे प्रदर्शित पटल पर एक कहानी के अनुसार त्रेता युग मे हनुमान द्वारा लंका मे आग न लगने के निरर्थक प्रयास की तह मे जाने पर ज्ञात हुआ कि भगवान शनि देव को रावण ने अपने सिंहासन के पैरों तले आसन मे बंधक बना रखा है, जिनके रहते लंका मे आग नहीं लगेगी। हनुमान ने उन्हे मुक्त करा लंका छोड़ने को कहा किन्तु दुर्बल काया के कारण शनिदेव चलने मे असमर्थ थे। शनि देव की आज्ञा अनुसार हनुमान ने उन्हे लंका से आसमान मे उछाल कर फेंका तो वे लंका से निकल इस ग्राम ऐंती मे ही गिरे थे। इस लिये विश्व के एक मात्र इकलौते प्राचीन शनि देव का ये मंदिर पौराणिक मान्यताओं के कारण धार्मिक रूप से अति महत्वपूर्ण है।
दूर दूर से लोग इस प्राचीन मंदिर मे दर्शन हेतु आते है। मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार प्रशासन और भक्तों द्वारा बड़ा विशाल और भव्य बनाया गया है। मंदिर के बाहर दुकानों मे शनि देव पर चढ़ाया जाने बाला सरसों का तेल एवं पूजा की अन्य सामग्री मिलती है। मै ऐसे ही तुक्का लगा कर कह रहा हूँ शायद ये ही एक कारण हो कि देश मे मुरैना जिले मे ही सबसे ज्यादा सरसों की खेती और सरसों के तेल का उत्पादन होता है चूंकि मेरी पदस्थपना मुरैना जिले की पोरसा तहसील मे 4 साल तक रही है। जो व्यक्ति शनि के कोप से पीढ़ित है उनका दोष शांत और दोष दूर करने के लिये पंडित जोशी जी और अन्य पंडित जन पूजा पाठ कराते है। चूंकि आज शनिवार नहीं था अतः यहाँ भीड़ भाड़ न के बराबर थी। पर मंदिर प्रांगढ़ मे लगी लोहे की रेलिंग को देख कर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ शनिवार या अन्य पर्वों पर काफी भीड़ जुटती है। मंदिर परिसर मे तीन मंज़िला एक उपद्वार भी है जिसमे प्रवेश कर कुछ सीढ़ियाँ नीचे उतरकर शनिदेव के मंदिर मे जाया जाता है। शनिदेव की प्रतिमा काफी प्राचीन और भव्य है जिसके मुख मण्डल पर एक अलग ही प्रकार की आभा मण्डल से परिपूर्ण तेज प्रदर्शित होता है। मंदिर का मंडप छोटा है जिसमे एक ओर से श्रद्धालूँ प्रवेश कर शनिदेव को तेल अर्पण दर्शन कर दूसरे रास्ते से निकल जाते है। यध्यपि एक दो दर्शनार्थी के रहते हुए भी किसी विशेष यजमान की पूजा अर्चना मे व्यस्त होने के कारण मुख्य पुजारी जी से अनौपचारिक वार्तालाप न हो सका। विशेष पूजा अर्चना हेतु छोटा से स्थान दोनों रस्तों के बीच स्टील के पाइप से बनाया गया है जिसमे बमुश्किल 4-5 दर्शनार्थी ही बैठ सकते है। दीप जलाने हेतु दीप स्तम्भ मंदिर के बाहर बनाया गया है। मंदिर के पार दूर सामने दर्शनार्थियों को बैठ कर मंदिर के दर्शन और मंदिर मे भक्तों के नयनाभिराम द्रश्यों को देखने हेतु सीढ़िया बना कर दीर्घा बनाई गई है। मंदिर परिसर मे भगवान गणेश, राधा कृष्ण और हनुमान मंदिर भी बना है। रेलिंग द्वारा मंदिरों को इस तरह जोड़ा गया है कि आप दर्शन मार्ग मे प्रवेश कर समस्त मंदिरों के दर्शन कर ही बापस होंगे। मंदिर के आँगन मे दोनों ओर नीचे जल कुंड बने है जिनमे जल प्रवाहित होता रहता है।
मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के काफी पहले श्रद्धालुओं के स्नान के लिये कई स्थानों पर प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ने कई कई फब्बारे नुमा पाईप लाइन डाली गई है। सभी दर्शनार्थी स्नान के बाद अन्तः वस्त्रों मे ही दर्शन हेतु मंदिर मे प्रवेश कर पूजा अर्चना हेतु जाते है। इसे मान्यता कहे या टोटका या अंधविश्वास स्नान के बाद भक्त जन अपने पुराने कपड़े जैसे शर्ट, पैंट, पैजमा, जूता चप्पल आदि उसी स्थान पर हमेशा के लिये छोड़ देते है। ऐसा कहा जाता है कि शनिदेव के दर्शन के पूर्व दर्शनार्थी अपने वस्त्र और जूता चप्पल आदि अपने दुःख दारद्रिय के रूप मे छोड़ कर शनि दोष का निवारण करते है। श्रद्धालुओं का ये दारद्रिय मार्ग के दोनों ओर वस्त्रों के ढेर के रूप मे प्रशासन का दुःख जरूर बढ़ाता है। क्या ही अच्छा हो मंदिर प्रशासन या कोई स्वयं सेवी संस्था आगे आकार इन वस्त्रों और जूते चप्पलों का निपटान सम्मान जनक रूप मे कुछ इस तरह कर सके ताकि ये किसी के पुनः काम आ सके। श्री शनि देव महाराज की-जय! (पढ़ावली बटेश्वर मितावली का विवरण अगली पोस्ट मे)

विजय सहगल

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