बच्चों की कवितायें
चंद्रमा
चंदा मामा
पहन पजामा
चमके आधी रात को।
खाते दूध और भात को॥
कभी रात मे
छोटे होते।
कभी गोल और मोटे होते॥
हम जाते है जहां जहां।
साथ मे पहुंचे वहां वहां॥
सूरज
पूरब से सूरज का उगना।
चंदा से आकार मे दुगना॥
किरणों संग आकाश मे आता।
खोल आँख कर हमे जागता॥
विस्तर से हम झट उठ जाते।
बस्ता ले स्कूल को जाते॥
बादल
धवल सुनहरे
भूरे काले।
बादल छोटे-बड़े मतवाले॥
आसमान मे जिनका घर है।
उड़ते यहाँ वहाँ
न डर है॥
पानी बादल भर भर लाते।
प्यासी धरती प्यास बुझाते॥
हवा
ठंडी - ठंडी
चले हवा।
उड़ी पतंग चील कौवा॥
हिलती टहनी असर दिखाती।
फिर भी हवा नज़र न आती॥
आँधी बहन है भाई तूफान।
तोड़-फोड़
करता नुकसान॥
मेला -1
दौड़
दौड़ बच्चों का रेला।
चला
देखने गाँव का मेला॥
नंदू, मुन्ना, चुन्नू आगे।
देख
हिंडोला सरपट भागे॥
भालू
नाचा, बंदर आया।
मदारी
ने जब खेल दिखाया॥
शेर
दहाड़ा, ऊट भी जागा।
कड़दम-कड़दम
घोड़ा भागा॥
मेला -2
हाथों
मे थे रंग रँगीले।
लाल
हरे गुब्बारे पीले॥
गर्म
जलेबी, मुँह को आती।
बर्फ
की चुस्की, मुन्नी खाती॥
गुड़िया
के थे मीठे बाल।
बच्चों
ने भी किया धमाल॥
रेल गाड़ी
छुक छुक करती रेल गाड़ी।
शोर मचाती रेल गाड़ी॥
सफेद ड्रेस में गार्ड जी आते।
लाल-हरी
झंडी दिखलाते॥
काली ड्रेस में टी.सी. आता।
टिकट चैक कर अकड़ दिखाता॥
लाल ड्रेस के कुली बुलाते।
हम सब का सामान उठाते॥
"रिमझिम-बरसात"
जैसे
बूंदे नभ से आती।
धरती
हरी भरी हो जाती॥
कोयल
कूंके राग सुनाये।
मोर
"मेयो-मेयो" कर गाये॥
दादाजी
बच्चों को डांटे।
बच्चे
छोड़ वस्ता ओं छाते॥
भीग
रहे थे कर मनमानी।
रिमझिम-रिमझिम
बरसे पानी॥
विजय
सहगल


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