"मादक पदार्थों की लत"
जैसे जैसे देश मे औध्योगीकरण और प्रगति हुई है देश
के लोगो का आर्थिक विकास भी उसी गति से हुआ है और इस प्रगति के साथ समाज मे कई तरह
की बुराइयों ने भी अपना घर बनाया है। इन बुराइयों मे तमाम तरह के नशे के साथ ड्रूग
के नशे की समस्या की गंभीरता का अहसास मैंने 2017-18 मे प्रायः लंच के समय एक बार
फिर अपने मित्रों, विनय मल्होत्रा, रमन कपूर, अतर सिंह तोमर, विनोद जैन आदि के साथ देश
की राजधानी नई दिल्ली के ह्रदय स्थल कनॉट प्लेस मे घूमते समय बाहरी सर्कल के
कोनों मे कचड़ा बीनने बाले एवं भिखारियों
द्वारा अफीम, गाँजा या ड्रूग के नशे के धुएँ के उठ रहे गुबार के रूप मे देखा था। हमे लगता है कनॉट प्लेस
के ये कोने ड्रूग या अन्य मादक पढ़ार्थों
को उपयोग करने बाले लोगो से आज भी गुलज़ार हो रहे होंगे। देश की राजधानी का जब ये
हाल है तो आप समझ सकते है इन मादक पदार्थों के व्यापारियों का जाल छोटे एवं मध्यम शहरों मे कितने मजबूती
से फैला होगा। ड्रग एवं अन्य मादक पदार्थों के सेवन मे बड़ी तादाद मे न केवल गरीब
परिवारों के बच्चे बल्कि संभ्रांत
परिवारों के छात्र, व्यापारी या सरकारी और
गैर सरकारी विभागों के कर्मचारियों , अधिकारियों तक को अपनी गिरफ्त मे लेते देखा जा सकता है।
आज के नवभारत टाइम्स मे मादक पदार्थों से नशे की लत के उपर एक पूरे परिशिष्ट को देख कर
एवं अपने कॉलेज जीवन मे रेडियो पर सुनी बहुत पुरानी वार्ता पुनः याद आ गई जिसमे
किसी भी प्रकार के नशे या डृग के नशे से पीढ़ित व्यक्ति को उसकी लत के लिये उसे प्रताड़ित
नहीं करने की नसीहत दी गई। उक्त परिचर्चा मे बताया गया था ड्रग के नशे से
प्रभावित व्यक्ति वास्तव मे इस लत से बीमार है और बीमारी का ईलाज डॉक्टर की
देख-रेख मे दबा से ही किया जाता है। ड्रग के नशे से प्रभावित व्यक्ति की ईक्षा
शक्ति का पूरी तरह अभाव होकर अपने आप पर नियंत्रण खो कर नशे की गिरफ्त मे आ जाता
है। उस पीढ़ित व्यक्ति को परिवार और समाज के नैतिक समर्थन एवं उसके फ़ैमिली या
फ्रेंड को यह समझना पड़ेगा कि यह एक बीमारी है, न कि उसकी गलती। इस लत या अडिक्ट का इलाज
साइकायट्रिस्ट द्वारा काउंसिलिंग और दवा से संभव है। मनोवैज्ञानिक, पीढ़ित को प्रेरित कर यह
काम बखूबी कर सकते हैं।
ऐसे ही एक शाखा मे शाखा प्रमुख रहते हुए ही एक ऐसे ड्रूग एडिक्ट स्टाफ के साथ कार्य करने का अप्रत्याशित मौका पड़ा। उनके कई तरह के नशे की बीमारी
के कारण शाखा के कार्यकलापों पर काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ा लेकिन इसके बाबजूद भी
नशे के दुष्परिणाम को ही हमने इन अप्रिय घटनाओं का कारण मान उन्हे या उनके व्यवहार
को कभी उक्त खेदजनक घटनाओं के लिये दोषारोपण नहीं किया। उन स्टाफ के नशे के कारण एक डॉक्टर जो उस शहर के बहुत बड़े शासकीय चिकित्सा संस्थान के न्यूरोलोज़ी विभाग के प्रमुख
थे, मेरे
पास मेरी कैबिन मे आये चूंकि मै उन्हे एक
सम्मानित नागरिक और ग्राहक के नाते अच्छी तरह पहले से ही जानता था, उन्हे आदर सहित बैठाया।
पर उनके चेहरे पर क्षोभ और नाराजी साफ देखी जा सकती थी। मैंने उनका कुशल क्षेम पूछने
के पश्चात शाखा मे पधारने के आशय का निवेदन किया, तो वे काफी दुःखी नज़र आये। उन्होने कहा कि मै आपके
बैंक का बहुत पुराना ग्राहक हूँ पर आज आपके स्टाफ के दुर्व्यवहार से काफी क्षुब्ध
हूँ। उनकी बात सुनकर मै स्तब्ध था मैंने हाथ जोड़ कर उनसे कहा सर मै आपको अच्छी तरह
जनता हूँ और आप जैसे ग्राहक हमारे संस्थान के लिये सम्मान के पात्र हैं। कृपया आप
बैठे और मुझे आपके साथ हुई धृष्टता के बारे मे बताये? उन्होने जब बताया कि
काउंटर पर बैठे ऑफिसर को जब मैंने पासबुक प्रिंट कर अपडेट करने को दी जो शायद जेब मे रखे होने के
कारण कुछ तुड़-मुड़ गई थी। उस ऑफिसर ने
छूटते ही कहा आप एक पास बुक तो सम्हाल नहीं सकते अपने मरीजों को कैसे सम्हालते होंगे? बैंक हाल मे समस्त ग्राहकों
के सामने ऐसे प्रत्युत्तर की अपेक्षा उनको भी नहीं रही होगी। अन्य ग्राहकों के
समक्ष यह सुनकर उन्हे काफी बुरा लगा और वे
मेरे पास उक्त अफसर की शिकायत लेकर दुःखी मन से मेरे पास आये। मुझे भी उक्त अप्रिय
घटना से काफी पीढ़ा हुई मैंने उनकी पास बुक
खुद अपडेट कराकर स्टाफ के कुक्रत्य के लिये क्षमा मांगी और भविष्य मे किसी भी सेवा
के लिये उन्हे सीधे मेरी कैबिन मे आने का निवेदन किया। मैंने सौजन्यता वश चाय आदि के लिये पूंछा पर
अनेपक्षित माहौल के कारण डॉक्टर साहब
पासबुक लेकर चले गये।
एक अन्य दिन एक व्यापारी ग्राहक उन्ही अफसर की
शिकायत लेकर हमारे पास आये और बताया कि जीवन बीमा निगम द्वारा जारी चैक उन्होने
समाशोधन के माध्यम से जमा करने हेतु उक्त ऑफिसर को दिया था लेकिन 3-4 दिन बाद भी न
तो चैक का भुगतान खाते मे आया और न ही चैक बापस उन्हे मिला। उनकी बैंक सील के साथ पावती स्लिप उन ग्राहक महोदय ने हमे दिखाई। चैक उन्होने इन अफसर के सुपुर्द
किया था। मै भी हैरान था कि जब चैक जमा हुआ है तो या तो उसका भुगतान आना चाहिये
या अनादरित चैक बापस मिलना चाहिये? हमने क्लियरिंग से संबन्धित स्टाफ से पूंछ-ताछ की, चैक को यहाँ-वहाँ खोजा पर
चैक नहीं मिला। अब समस्या खड़ी हो गई किया क्या जाये? संबन्धित ऑफिसर ने भी जो नशे से पीढ़ित होने के कारण इस संबंध मे कुछ
बताने से हाथ खड़े कर दिये। स्वाभाविक था
कि 90-92 हजार की रकम का चैक था ग्राहक भी शिकवे-शिकायत की धमकी दे रहा था। उत्तम
एवं त्वरित ग्राहक सेवा का उदाहरण के रूप मे अब केवल एक ही रास्ता था कि ग्राहक से निवेदन कर जीवन
बीमा निगम से दूसरा चैक बनाने का निवेदन किया जाये। इस हेतु मैंने ही ग्राहक से स्वयं ही कहा कि
हम जीबन बीमा निगम को इस आशय का पत्र लिख
देते है कि चैक बैंक मे गुम हो गया ताकि
इस पत्र के आधार पर जीबन बीमा निगम शीघ्र चैक जारी कर दे। संबन्धित व्यक्ति हमारे
बैंक का पुराना ग्राहक था, अतः हमने
उत्तम ग्राहक सेवा का परिचय एवं आपसी विश्वास के तहत ग्राहक को इस आशय का
पत्र दे दिया ताकि इसके आधार पर जीवन बीमा निगम शीघ्र डुप्लिकेट चैक ग्राहक
को जारी कर दे। ऐसा हुआ भी 3-4 दिन मे डुप्लिकेट चैक जारी होकर
समाशोधन के माध्यम से ग्राहक के खाते मे जमा भी हो गया।
बात आयी-गयी हो गई। मै समझा था मामला समाप्त हो गया, पर कुछ दिन बाद उक्त
ग्राहक ने अपने बकील के माध्यम से एक
नोटिस बैंक को भेजा, जिसमे बैंक द्वारा चैक को गुमाने से ग्राहक के व्यापारिक बिल
की बापसी से उपजी क्षति की प्रतिपूर्ति हेतु बैंक से 2 लाख रुपए की मांग की गई।
उक्त क्षतिपूर्ति के अभाव मे उपभोक्ता न्यायालय मे केस दर्ज कराने की बात कही गई। नोटिस
को पाकर मै भी हैरान परेशान हो गया कि बड़ी मुश्किल से तो चैक का झंझट निपटा था और
कहाँ से फिर एक नई मुसीबत गले पड़ गई। चूंकि चैक बैंक मे गुम होने का पत्र मैंने
पहले ही उक्त ग्राहक को दे दिया था जिसके आधार पर उसका पक्ष मजबूत था अतः उसने
उपभोक्ता न्यायालय मे हमारे विरुद्ध याचिका दाखिल कर दी।
मैंने शाम के उक्त ग्राहक से उनके बाज़ार स्थित
प्रतिष्ठान पर नोटिस के संबंध मे बात करने का निश्चय किया। एक-डेढ़ घंटे चली बैठक
मे हमने उनसे निवेदन किया कि हमने ही आपकी सुविधा हेतु ये स्वीकारते हुए कि चैक बैंक से खो गया है इस आशय
का पत्र दिया था। इस पत्र के आधार पर ही आपको डुप्लिकेट चैक प्राप्त हो गया। फिर
क्यों आपने ये नोटिस दे दिया? हमने आप पर पूर्ण विश्वास कर उक्त पत्र दिया था फिर आपको इस का
दुर्पयोग कर बैंक/हमारे विरुद्ध कार्यवाही
करना उचित नहीं? पर उक्त व्यापारी अब नये व्यापार पर उतार आया था। वह हमारी
गलती को ब्लैकमेल कर हमसे पैसा ऐठना चाहता था। मैंने कहा भी कि इस पूरी प्रिक्रिया
मे मुश्किल से 4-5 दिन लगे और आप को चैक का भुगतान मिल गया। जिस ऑफिसर ने आप का
चैक गुमाया उसको तो कुछ नहीं हुआ और हमने आपको चैक गुम होने का पत्र दे कर आपकी
सहायता की तो हम ही को आप सजा दे रहे है ये तो सरासर गलत हैं। पर उक्त व्यापारी
हमारी गलती का पूरा-पूरा फायदा उठाना चाहता था अतः उसने किसी भी तरह का सहयोग करने
से माना कर दिया। जब हमने बज़ार के अन्य अपने परिचित व्यापरियों से बात की तो किसी
व्यापारी ने उक्त व्यापारी के पिता से मिलने को कहा जो उस समय 80-85 साल से उपर के
रहे होंगे और बड़े धार्मिक प्रवृत्ति के थे। अगले दिन मै उनके घर उनका पता
पूंछते-पूंछते गया। सौभाग्य से वे घर पर मिल गये। काफी उम्रदराज बुजुर्ग थे। धोती
कुर्ता पहने माथे पर लंबा चौड़ा तिलक लगाये काफी सौम्य और धार्मिक सरल व्यक्तित्व
के लग रहे थे। मैंने चरण वंदन कर उनसे अपना परिचय दे कर सारी समस्या कह सुनाई।
उनका बेटा भी वही था। काफी बड़ा घर और संयुक्त परिवार लग रहा था। हमे पूरा विश्वास
था उक्त बुजुर्गबार हमारी सत्यनिष्ठा और मदद करने के भाव के मद्देनज़र हमारी मदद
करेंगे और अपने बेटे से उक्त कानूनी नोटिस को बापस लेने के लिये कहेंगे। घर पर
स्थित उनके सारे 5-6 भाईयों ने एक साथ बैठ कर चाय पिलाते हुए उक्त घटना की चर्चा भी की। उनके पिता श्री
की बातों से लगा कि उनके पुत्रों ने प्रकरण के बारे मे उन्हे पहले से बता रखा था।
जब हमने उनके पिता से सहायता की गुहार लगाई तो उन्होने जो जबाब दिया सुनकर मै
हतप्रभ था वे बोले "जिसने गलती की उसे सजा तो मिलनी ही चाहिये। पर मैंने
प्रतीकार करते हुए निवेदन किया जिसने गलती की उसे तो बिल्कुल सजा नहीं मिल रही
अपितु हमने सहायता की तो आप हमे ही दंडित कर रहे हैं? तब पता नहीं उन्होने
रामायण की कौन कौन सी चौपाई सुना कर और
महाभारत के द्रष्टांत सुनाकर, लंबे-चौड़े धार्मिक उपदेश देकर वे भी अपने पुत्रमोह मे उसी के पक्ष मे ही खड़े नज़र आये। हम जिस अनुमान के साथ आये थे वह पूर्णत: गलत
निकला। हमे लगा हमारे ड्रग लेने के अभयस्थ स्टाफ के साथ साथ इस परिवार को भी वरिष्ठ
चिकित्सकीय काउंसिलिंग कर इलाज की जरूरत थी।
उपभोक्ता न्यायालय मे केस चला हमारे बैंक के बकील
मिस्टर चौहान ने काफी मदद की अंततः केस मे
हमारे उपर 2000/- की क्षति पूर्ति उक्त व्यापारी को देने का निर्णय उपभोक्ता
न्यायालय ने दिया। उक्त हर्जाने का भुगतान कर हमने इस प्रकरण से पीछा छुड़ाया।
उक्त दोनों उदाहरणो के मद्देनज़र हमे काफी
परेशानियों और कष्टों के बाबजूद हमने संबन्धित अधिकारी को उक्त संबंध कभी कुछ नहीं कहा। क्योंकि मै मानता था कि ड्रग और अन्य
नशे से पीढ़ित उस अफसर को खुद ही नहीं पता था वे क्या कर रहे हैं। वे ड्रग के नशे
से प्रभावित अपनी ईक्षा शक्ति का पूरी तरह समाप्त कर अपने आप पर नियंत्रण खो कर नशे की गिरफ्त मे आ
चुके थे। उनको इस बात का भान नहीं था कि उनके इस कृत से संस्था या उनके साथियों को
कितना नुकसान हो रहा है? वो एक ऐसी बीमारी से
ग्रसित हो चुके थे जिसे "दवा" के साथ साथ चिकित्सकीय परामर्श और
पारवारिक/सामाजिक सहयोग की आवश्यकता थी।
विजय सहगल

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