रविवार, 24 मार्च 2019

सैम पित्रोदा को प्रमाण


सैम पित्रोदा को प्रमाण

मेरे प्यारे अंकल सैम,

पिछले दिनों आपका वक्तव्य पुलवामा मे हुई आतंक पूर्ण घटना के जबाब मे हमारे वायु सेना द्वारा पाकिस्तान के विरुद्ध की गई एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाये थे और एयर स्ट्राइक  के सबूत एवं उसमे मारे गये अंतकियों की संख्या के सबूत  चाहे गये थे। आपके द्वारा ये भी चाहा गया था कि पुलवामा जैसी घटनाये तो होती रहती हैं इसके लिये सारे पाकिस्तान को दोषी ठहरना गलत हैं।

महोदय, पाकिस्तान जैसा  देश जो स्वतन्त्रता के 71 साल बाद भी  कश्मीर पर हमारे देश मे आतंक वाद फैला कर देश मे अस्थिरता और अशांति ला  रहा  हैं।   आखिर कब तक चुप रहा जा सकता हैं। मेरा द्रढ़ मत हैं कि यदि देश का विभाजन 1947 मे नहीं होता तो ये कश्मीर समस्या भी न होती। देश के  इस विभाजन के लिये तत्कालीन राजनैतिक व्यक्तियों की संकुचित  सोच,  मूर्खता पूर्ण नीति, पद लोलुपता और निजी स्वार्थ जिम्मेदार था। श्री जवाहर लाल नेहरू देश के विभाजन  और कश्मीर पर अदूरदर्शी नीति के लिये   सबसे अधिक जिम्मेदार थे। आज उस  निजी स्वार्थ पूर्ण नीति,  पद लोलुपता का नतीजा ही हैं जिसमे हमारे देश के बहादुर फौज के जवानों को अकारण अपना बलिदान देना पड़ रहा हैं और जिसके लिये एक मात्र पाकिस्तान की आतंकवादी गतिविधियां ही मुख्य रूप से  जिम्मेदार हैं जो बारबार आतंकवादियों को कश्मीर मे  हिंसा फैलाने  भेज रहा हैं। काश आप जैसा मूर्धन्य सलाहकार उस समय नेहरू जैसे नेताओं को देश का विभाजन को न स्वीकार  करने  के लिये सलाह देते।  नेहरू  ने भी ये देश का विभाजन क्यों कर स्वीकार किया समझ से परे हैं। सुना था वे तो बड़े होशियार, विद्वान  और गहन विचार  कुशल पुरुष थे। उन्हे तो भारतीय संस्कृति, परंपरा और   इतिहास का ज्ञान था। महाभारत का द्रष्टांत तो निश्चित ही उन्हे मालूम ही  होगा। उन्होने धर्मयुक्त युद्ध न लड़ कर विभाजन क्यों स्वीकार किया? अंग्रेज़ो के कुचक्र पूर्ण चालों के विरुद्ध निश्चित ही उन्हे महाभारत युद्ध की तरह संघर्ष करना चाहिये था, क्योंकि जिन्ना या उनके अनुयाई और पाकिस्तान मे रह रहे मुसलमान, आखिर  थे तो  कौरवों की तरह अपने ही भाई ही। यदि 1947 मे नेहरू जी प्रधानमंत्री पद रूपी मोह को त्याग कर श्रीमद्भगवत गीता मे अर्जुन को  भगवान कृष्ण के आदेशानुसार प्रेरित करते कि  :-

क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्तवय्युपपद्यते |
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप || गीता अध्याय 2, श्लोक 3||
(अर्थात :- हे अर्जुन नपुंसकता को मत प्रपट हो, तुझ मे यह उचित नहीं जान पड़ती, हे परंतप
ह्रदयकी तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिये खड़ा हो जा।)

यदि श्री नेहरू उस दिन कौरवों रूपी" जिन्ना" एवं उनके समर्थकों के विरुद्ध महाभारत का धर्मयुक्त युद्ध देश के विभाजन के खिलाफ़  लड़ते तो आज कश्मीर समस्या नासूर की तरह हमारे देश को लगातार कष्ट न देती। दुनिया मे तमाम देशों मे विभाजन हुए पर सारे देश अपने खुशहली और विकास मे लगे हुए हैं। सिर्फ पाकिस्तान ही एक ऐसा देश हैं जो हमारे देश के विरुद्ध  आतंकवादी गतिविधियों को पाल पोष कर बड़ा कर उन्हे पराश्रय दे रहा हैं इसलिए पाकिस्तान के विरुद्ध एयर स्ट्राइक की कार्यवाही आवश्यक हैं और जिसके लिये सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान जिम्मेदार हैं। यदि पूर्व की सरकारों द्वारा मुंबई पर हमले और संसद पर हुए हमले के विरुद्ध ये कार्यवाही पहले कर दी गयी होती  तो आज पाकिस्तान की ये हिम्मत न होती। यध्यपि हमारे शास्त्रानुसार हर जन्मे हुए कि मृत्यु निश्चित हैं, पर पुलवामा मे शहीद हुए हमारे बहादुर बलिदानियों को अकारण ही  पाकिस्तान की आतंकी, कायरना पूर्ण हरकत की बजह से शिकार न होना पड़ता।   यदि वे युद्ध लड़ते हुए दुश्मनों को मारकर शहीद होते तो हमारे लिये और भी फ़ख्र कि बात होती। इसलिये यूं ही अपने देश के लिये आतंकी गतिविधियों मे  बलिदान होने से अच्छा हैं युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त होना अथवा दुश्मनों  के घर मे घुस कर उनको  को मारकर देश-राज्य मे परिपूर्ण सुखों को भोग करना।  अतः   पाकिस्तान  के विरुद्ध कार्यवाही करना अवश्यसंभावी हैं।  

आप तो टेलीकॉम क्रांति के जनक कहे जाते हैं, ज्ञान आयोग के मुखिया भी आप हैं, बड़े ज्ञानी पुरुष हैं। आपने बर्फ से ढकी हिमालय कि चोटियों पर टेलीफ़ोन टावर का जाल क्यों नहीं फैलाया?,  अंडमान निकोबार के उन दीपों मे टावर का जाल क्यों नहीं फैलाया या उन रेगिस्तानी जगहों मे टेलीफ़ोन उपकरण नहीं लगाये, जहां कोई मानव मात्र नहीं रहता या जो पूरी तरह निर्जन हैं? निश्चित ही आप ज्ञानी-विज्ञानी सोच बाले महापुरुष हैं जो ये जानते हैं कि टेलीफ़ोन उपकरण, टावर या टेलीफ़ोन तार का निर्जन या मानव रहित जगहों मे लगाने से क्या फायदा या क्या उपयोग। श्रीमान यही सोच हमारी सेना, वायु सेना एवं अन्य वैज्ञानिकों की रही  कि निर्जन जगहों पर एयर स्ट्राइक करने का क्या उपयोग? सेना-वायु सेना के बहादुर सैनिक और अफ़सर जिन्होने अपनी सारी ज़िंदगी युद्ध कौशल करने और सीखने मे ही लगाई हैं, कुछ सोच समझ कर बालाकोट के आतंकी अड्डों को निशाना बनाया गया होगा। यध्यपि आप देश मे टेलीफ़ोन क्रांति के जनक कहे जाते हैं, पर याद रहे आप  दुनियाँ की टेलीफ़ोन क्रांति के जनक नहीं हैं? और ऐसा भी नहीं हैं कि आपके न रहते टेलीफ़ोन क्रांति या कम्प्युटर क्रांति अब बंद हो गई हैं? मेरा स्पष्ट मत हैं ये टेलीफ़ोन या कम्प्युटर तकनीकी   आपके समय से और प्रगतिशील एवं और उन्नतशील हो चुकी   हैं,  जो यह पता कर सक्ने मे सक्षम हैं कि बलाकोट मे कितने मोबाइल एयर स्ट्राइक बाले दिन  एक्टिव थे। अपने को योग्य या ज्ञानवान समझना श्रेष्ठ हैं पर दूसरों को नासमझ या मूर्ख समझना आपकी योग्यता पर सवालिया निशान हैं?? और जहां तक हताहतों कि संख्या का सवाल हैं तो  "हे कॉंग्रेस श्रेष्ठ" दुश्मन के घर मे घुस कर एयर स्ट्राइक करना तो संभव हैं पर उनके नष्ट किये गये आतंकी अड्डों और आतंकियों के हताहतो की संख्या का आकलन तकनीकी के उपयोग कर आप जैसे विशेषज्ञ आसानी से कर सकते हैं। आप  तनिक भारत और पाकिस्तान के अवाम के  बौद्धिक स्तर एवं लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर भी नज़र डाल लेते तो अच्छा रहता। न्यूयार्क टाइम्स पढ़ने के पूर्व थोड़ा पाकिस्तान का इतिहास भी पढ़ लेते। बोलने और लिखने की जो आज़ादी भारत देश मे हैं क्या पाकिस्तान मे ऐसा संभव हैं?? हमारे देश मे पढे-लिखे लोगो का बाहुल्य हैं, इसी  लिये (आपातकाल के 21 महीनों (25 जून 1975 से 21मार्च 1977 तक) को छोड़ कर) मतभिन्नता चारों ओर दिखाई देती हैं। श्रीमान यही फर्क है भेड़ों और शेरों के झुंड का जो हमे पाकिस्तान से अलग रखता हैं बर्ना क्या कारण हैं कि आप जैसा ज्ञानी और बौद्धजीवि दलों के झुंड के विपरीत पाकिस्तान कि इतनी बढ़ी आबादी मे से  एक भी व्यक्ति हताहतों की संख्या और आतंकी अड्डे के नुकसान का आंकड़ा भी नहीं देता?? इस सैनिक तानशाह मुल्क मे   क्या मजाल सेना की अनुमति के विरुद्ध इंसान तो क्या कोई परिंदा भी बालाकोट सीमा मे  गया हो?? ये तो हमारे देश के संविधान निर्माताओं का शुक्र मनायें कि आप जैसे अनेक लोगो को अपने देश की सेना की आलोचना करना या बहादुर सेना को "गली का गुंडा" कहने की आज़ादी मिली हैं।  पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान मे आप सेना या शासन के विरुद्ध ये बात करते तो  आप या आप जैसे लोगो को  वहाँ की सेना के सिपाहियों द्वारा  आप जैसे लोगो को लाठी, डंडों, जूतों और बंदूक की बटों से पीटा होता और आवश्यकता होने पर बंदूक की गोली से चिर निद्रा मे सुला दिया होता, जैसा कि हम टेलिविजन पर बलूचिस्तान और पाक अधिक्रत कश्मीर मे प्रायः देखा करते हैं।   मैं आपको चुनौती देता हूँ आप पाकिस्तान के बड़े हिमायती और शुभचिंतक हैं, हिंदुस्तान मे पाकिस्तान दिवस मनाने बाले  प्रवर्तक हैं कृपया पाकिस्तानी आकाओं से बीजा लेकर बालाकोट जाये  और इतने हफ्तों बाद भी बालाकोट की यथार्थ स्थिति को बयान करें?? आप जो कहेंगे और वर्णन करेंगे  हम और सारा देश उसे स्वीकार करेगा और हाँ निश्चिंत रहे  सबूत भी नहीं मांगेगा!!

अब रही बात सबूत की?
श्रीमान ये आस्था और विश्वास का विषय हैं जैसे माँ अपने नवजात बच्चे को पिता को दिखाते वास्ता देती हैं देखों पापा! या बोलो पापा।  यही वास्ता या विश्वास जो माँ, बच्चे के  पैदा होने से बाल्यकाल मे बच्चे के चलने या बोलने तक और  सारे रिश्तेदार जब बच्चे को माँ-पिता के  रिश्ते का बोध  कराते है तो सभी, बच्चे को कभी माँ को दिखा कर कहेंगे बोलो माँ, पिता को दिखा कर कहेंगे बोलो पिता जी या पापा तो बच्चा  इन्ही बातों का विश्वास कर  एक दिन  माँ को देख कर माँ और पिता को देख कर पापा बोलने लगता हैं  तो हम सभी तालियाँ बजा कर खिलखिला कर बच्चे की तोतली आबाज से खुश  होते हैं।  यही है वास्ता, आस्था या विश्वास जिसे मानकर बच्चा सारी ज़िंदगी माँ को  माँ और पिता को पापा मान लेता हैं इसके लिये किसी प्रमाण या कागजी शपथ-पत्र की आवश्यकता  नहीं पढ़ती।  इसलिये "हे पित्रोदा नन्दन" हमारी सेना और उसके जवान भी  हमारी धरती अर्थात हमारा देश कि तरह ही  हमारी माँ है जो हम देश वासियों की माँ  की तरह रक्षा करती हैं। इनकी वीरता और बहादुरी के लिये प्रमाण मत मांगे और इन के द्वारा आतंकवादियों के विरुद्ध की गयी  शूरवीरता की बातों पर उसी तरह विश्वास करें जैसे  माँ ने पिता को पिता कहने के वास्ते कही थी। हमे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है हमारी कुछ अनचाही कड़वी बातों को आप अन्यथा नहीं लेंगे।

आपका,

विजय सहगल                 





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