"माँ"
तुम्हारे पास का अहसास,
सुखी हर पल बनाता हैं।
डर होकर भी मुझको,
निडर होना सिखाता हैं॥
गिरा जब राह मे चलके।
पड़े तब पाँव मे फलके॥
चुभा जब पांव मे काँटा,
जमी को आप ने डाँटा॥
सुखद हाथ का अहसास,
मुझे सर पर
कराता हैं।
तुम्हारे पास का अहसास।
सुखी हर पल .............. ॥
लगी जब भूख खाने की
कमी दाने उगाने की॥
न था दूर तक पानी।
प्यासे ओंठों ने तब ठानी॥
काट कर पेट जब
अपना,
प्यास मेरी बुझता हैं।
तुम्हारे पास का अहसास।
सुखी हर पल.............. ॥
हुए जब राह मे असफल।
सहारा दिला कर,
हर पल॥
राहें थी बड़ी दुश्वर,
था दुश्मन,
सारा-जहाँ मेरा।
जला कर रोशनी तूने,
किया था दूर अंधेरा॥
दिलासा देकर हमारी आश,
को फिर,
गिर कर उठाता हैं॥
तुम्हारे पास का अहसास ,
सुखी हर पल ................. ॥
मुश्किले जब कभी आयी,
दवा हर मर्ज़ की खाई॥
असर दिखाने की तब बारी थी।
साथ जब माँ हमारी थी॥
तेरा हर साथ मुझको खास,
देव दर्शन कराता हैं।
तुम्हारे पास का अहसास,
सुखी हर पल बनाता हैं॥
विजय सहगल
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