"होली"
आज
बहुत अर्से बाद ऐसी होली आई हैं जब एक मशीनी हक़ीक़त से हट कर होली के त्योहार की
उमंग और उत्साह को सहज ढंग से महसूस करेंगे। क्योंकि अभी तक नौकरी के दौरान हम
अपने मुख्य त्योहार जैसे होली, दिवाली, नया वर्ष एक मानव रूपी मशीन की तरह मानते आ
रहे थे, बही औपचारिकता, होली की बधाई, हैप्पी होली या होली मुबारक हो आदि।
अनौपचारिकता तो मानो इतने सालों मे कही खो गई थी,
होली का उत्साह-उमंग तो कही रह ही नहीं गया था। हमे याद हैं बचपन के बो दिन जब एक
महीने पहले से होली की तैयारियाँ शुरू हो जाती थी। पड़ौस मे एक टूटे खंडहर नुमा
भूतह मकान जिसे हम बच्चा पार्टी "सऊआ का खड़ेरा" कहा करते थे, मे होली के लिये ईधन एकत्रित किया जाना शुरू कर दिया करते थे। "सऊआ"
कौन थी हम नहीं जानते थे बड़े लोगो से सुन-सुन कर हम भी सभी बच्चे उसे "सऊआ का
खड़ेरा" कहते थे। खंडहर होने के पूर्व मकान निश्चित ही अपने वैभव और संपन्नता को
अपने आप मे समेटे होगा। हर साल होली के पूर्व मुहल्ले के सारे बच्चे इस भूतह हवेली के
मालिक हो जाया करते थे। उन दिनों आज की तरह गैस,
बिजली आदि की उपलब्धता तो थी नहीं, सभी लोग लकड़ियों और गोबर
के कंडे (उपले) को ही घर के ईधन के रूप मे
इस्तेमाल करते थे। होली पूर्व स्कूल की छुट्टियों मे होली मनाने की योजनाये बच्चों
द्वारा बनाई जाती थी। मुख्य कार्य होली के लिये लकड़ी-कंडे एकत्रित करना था।
ग्रामीण क्षेत्रों से सिर पर लकड़ियों और कंडे की ऊंची ऊंची डालियों को ले कर
ग्रामीण महिलाये-पुरुष बेचने के लिये शहर
आते थे। बच्चों के झुंड सविनय हर लकड़ी बाले से "एक लकड़ी" और कंडे बालों
से "एक कंडा" को "होली टैक्स" के रूप मे लेते थे। कई बार उक्त
ग्रामीण उक्त टैक्स को देने से मना कर देते थे। तब गुरिल्ला आक्रमण दस्ता हरकत मे
आ जाता था। जब ग्रामीण अपने ग्राहकों से लकड़ियों-कण्डों के मोल-भाव मे व्यस्त होता
उक्त बन्दर सेना के एक-दो सदस्य लकड़ियो या कण्डों पर झपट्टा मारकर एक-दो लकड़ी या कंडे
ले कर भाग जाते थे। लूटे गये लकड़ी या कण्डों को खंडहर मे फेक दिया जाता था। यदि
पकड़े गये तो सारी बच्चा सेना एक साथ खड़े होकर लड़ने तैयार रहती। बूड़े-बुजुर्ग भी
होली का बस्ता देकर मामला रफा-दफा करा देते थे। ये ईधन कलेक्शन होलिका दहन के दिन
तक चलता रहता था। होलिका दहन बाली रात मे कुछ बड़े युवकों द्वारा घूम-घूम कर कच्चे
छप्परों को या खंडहारों के दरवाजे या बंद पड़े घरों की उजड़ी चौखटों को होलिका दहन भी किया जाता था,
जिससे हम बच्चे हमेशा दूर रहते थे। कुछ ग्रामीण बैल गाड़ियों मे लकड़ियाँ और जानवरों
के लिये सूखे चारे का "पूरा" (सूखी
घास को एकसाथ बांध कर एक गटठे का रूप देना "पूरा" कहलाता हैं) बना कर भी
बाजार मे बेचने के लिये लाये जाते। होली पर इन बड़ी-बड़ी गाड़ियों मे पीछे से
"लकड़ी या घास के पूरे" को खीच
कर भाग जाना हम बच्चों की साधारण बात थी।
होली पर खाली लकड़ियों-कण्डों के अलावा अन्य खर्चों की पूर्ति के लिये कुछ नगदी की भी जरूरत पड़ती ताकि भांग की
ठंडाई और रंग-गुलाल का इंतजाम किया जा सके। इसके लिये टेलीफ़ोन के तारों पर धागे के
एक सिरे पर मछ्ली का कांटा लगा कर रास्ते से निकलने बाले शहरी/ग्रामीण की टोपी या
पगड़ी पर फंसा देते थे। दूसरा सिरे पर बैठा लड़का तुरंत ही धागे को खींच लेता जिससे
टोपी या पगड़ी हवा मे लटक जाती। नीचे खड़े बच्चों की टीम पैसे का मोल-भाव कर पैसे के
बदले टोपी/पगड़ी बापस कराने का काम करती। कुछ पैसा आसपास के दूकानदारों या
ठेले-खोमचे बालों से चंदे के रूप एकत्रित किया जाता था।
हमारे घर के पास ही मुरलीमनोहर का मंदिर हैं जिसकी
आज भी झाँसी मे बड़ी मान्यता हैं, कहा जाता हैं कि झाँसी कि
रानी लक्ष्मी बाई इस मंदिर मे दर्शन के लिये आती थी। झाँसी के राजपरिवार का
राज्याश्रय इस मंदिर को प्राप्त था। इसलिए इस मंदिर के पीछे घास मंडी मे जलाये
जाने बाली होली को झाँसी नगर मे मुख्य
होली का दर्जा प्राप्त था। इस होली को जलाने के लिये शहर कोतवाली के दरोगा ही
अधिकृत रहा करते थे। मंदिर की आरती से ही दरोगा जी होली का दहन किया करते थे। दहन
के आधा-एक घंटे पूर्व दरोगा जी झाँसी राज के लेखाधिकारी के मकान मे उन की आवभगत
पूरे मुहल्ले के लोग के साथ की जाती थी। इन
परिवारों के घर आज भी "लिखधारी" उपनाम लिखते हैं। होली हो और फाग के गीत और होरियारों द्वारा
छीटाकशी और गालियाँ दरोगा जी को न दी जाये ऐसा कैसे हो सकता था। पर होली के उल्लास
मे पुलिस मुखिया द्वारा इस हुड़दंग को बड़ी सहजता से लिया जाता था।
झाँसी
नगर मे होलिका दहन के अगले दिन रंग कि होली
नहीं खेली जाती क्योंकि होलिका दहन के अगले दिन झाँसी के राजा एवं रानी लक्ष्मी बाई के पति श्री
गंगाधर राव का देहावसान हुआ था अतः स्वर्गीय राजा के सम्मान मे होली का रंग एवं फाग का उत्सव होलिकादहन के दूसरे
दिन किया जाता था। हमने बचपन मे देखा था उस समय के बूढ़े-बुजुर्ग रंग कि होली, होलिका दहन के दूसरे दिन ही मनाते और खेलते थे। समय के लंबे अंतराल मे इतिहास की इस परंपरा को समय
के साथ भुला दिया गया। अब झाँसी मे भी होली होलिका दहन के अगले दिन भी खेली जाती हैं। झाँसी के राजा स्वर्गीय श्री गंगाधर धार राव की समाधि आज भी झाँसी मे लक्ष्मी
गेट बाहर लक्ष्मी तालाब के पास बनी हैं। कुछ माह पूर्व मुझे उनकी समाधि पर पुनः जाने
का सौभाग्य मिला था। प्रसन्नता हैं की पुरातत्व विभाग द्वारा समाधि की देख भाल अच्छी
तरह की जा रही हैं।
आज
नौकरी की आपाधापी से मुक्ति के बाद बचपन की होली खेल या माना तो नहीं
पाएंगे पर उन दिनों की होली को भरपूर याद तो कर ही सकते हैं। सोच कर हैरानी और खुशी होती हैं कि कितने महान और ज़िंदादिल, विशाल ह्रदय और विचार कुशल थे बे
लोग जो बचपन मे हमारे और हमारी मित्र मंडली
द्वारा होली मनाने के लिये सताये या परेशान किये गये और कितनी नादानियाँ और शैतानियाँ
हम और हमारे बाल साथियों ने की। उन त्रुटियों को आग्रह पूर्वक स्वीकार करते हुए झाँसी
के तत्कालीन राजा स्वर्गीय श्री गंगाधर राव
को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए प्रातः स्मरणीय झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई को नमन करते
हुए, अपने नगर के लोगो
को, शुभचिंतकों और ईष्ट मित्रों को होली के पावन पर्व की हार्दिक
बधाई और शुभ कामनाएँ प्रेषित करते हैं।
विजय
सहगल


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